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संबंधों की बेलें
डा. तारादत्त 'निर्विरोध'
सूरज की किरणें तो
पहले से उजली थीं,
भीतर के कोहरे का
मैलापन छंटा नहीं।
सोते में साथ रहे कुछ गंधाते सपने,
जब आंख खुली पाया, हम रहे नहीं अपने।
संबंधों की बेलें
दीवारें लांघ गयीं,
आंगन के पौधे का
पीलापन मिटा नहीं।
आंखों पर टंगे रहे, अवचेतन के परदे,
यह सोच कि कोई फिर आकर चेतन कर दे।
छोटी सी दृष्टि मगर
पर्वत तक पहुंच गयी;
दुनिया की आंखों से
अपनापन हटा नहीं।
भावुकता से ज्यादा भोलापन छला गया,
लेकिन ऐसा होना अनुभव दे गया नया।
सौ बार गिरे संभले,
भीड़ से बच निकले;
आपस की गुपचुप का
कड़ुवापन घटा नहीं।











