| दिंनाक: 07 Apr 2010 00:00:00 |
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डा. भरत झुनझुनवालावरिष्ठ अर्थ विश्लेषकब्रिटिश सरकार ने पिछले दिनों भारत में सर्व शिक्षा अभियान को दी जाने वाली आर्थिक मदद में व्याप्त भ्रष्टाचार की जांच के आदेश दिये हैं। देश के महालेखा निदेशक ने बताया था कि अभियान के लिये दस लाख रुपये के चार “लक्जरी बेड” खरीदे गये। बिहार के मुजफ्फरनगर में 6 करोड़ में से केवल 2.4 करोड़ रुपए विद्यालयों को वितरित किए गए थे। किसी दूसरे स्थान पर नब्बे लाख रुपए की रकम किसी अनजाने खाते में डाल दी गयी थी। 7,500 रंगीन टेलीविजन ऐसे विद्यालयों के लिये खरीदे गये जिनके यहां बिजली भी नहीं है। इसी प्रकार की धांधली रोजगार गारंटी योजना में चल रही है। यानी कुल मिलाकर पता चलता है कि परियोजनाओं का एक अंश ही लाभार्थी के पास पहुंचता है।विदेशी मदद का मकड़जालउल्लेखनीय बात यह है इन कल्याणकारी योजनाओं के लिये विदेशों से आर्थिक मदद मांगी जाती है जो हमारी अर्थव्यवस्था को ही पथ भ्रष्ट कर रही है। कुछ वर्ष पहले विश्व बैंक ने विश्व विकास रपट में बताया था कि आर्थिक मदद के दबाव में देश की अपनी रकम की दिशा बदल जाती है। उदाहरण के लिए, मददकर्ता द्वारा कभी-कभी कार्यक्रम के लिये केवल पूंजी खर्च उपलब्ध कराये जाते हैं। अपेक्षा की जाती है कि मेजबान देश चालू खर्चों को स्वयं वहन करेगा। जैसे, मान लीजिये, सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत सरकारी विद्यालयों के लिये विदेशी आर्थिक मदद से इमारतें बना दी गयी हैं तो सरकार ने अभियान में लगे अध्यापकों के वेतन अपने बजट से दिये। फलस्वरूप सरकार के पास ग्रामीण सड़कें बनाने को धन नहीं बचा। सड़क के अभाव में ग्रामवासी अपने माल को बाजार तक नहीं पहुंचा सके और नतीजा यह हुआ कि आय न होने से वे गरीब बने रहे। वे महंगे निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को नहीं भेज सके। इस प्रकार विदेशी आर्थिक मदद ने गरीब की अनायास ही हानि कर दी।विदेशी आर्थिक मदद के माध्यम से मेजबान देशों की आर्थिक नीतियों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा अक्सर शर्त लगाई जाती है कि मेजबान देश अपनी अर्थव्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये खोलेगा अथवा आयात शुल्क घटाएगा। तब ही मदद स्वीकृत की जायेगी। आर्थिक मदद प्राप्त करने की तृष्णा में गरीब देश इस शर्त को स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा करके वे अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देकर बढ़ाने का अवसर गंवा देते हैं।विदेशी आर्थिक मदद के माध्यम से देश के बुद्धिमान नागरिकों को भटका दिया जाता है। मददकर्ता द्वारा मेजबान देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं को मोटे वेतन पर किसी सेवा में नियुक्त कर दिया जाता है। मेरे एक मित्र ने अमरीका से परास्नातक की उपाधि हासिल की थी। भारत वापस आकर वे किसी वामपंथी पार्टी के राज्य सचिव बन गये। वे पार्टी का कार्य कर रहे थे। इसी बीच उन्हें किसी विदेशी आर्थिक मददकर्ता ने मोटे वेतन पर रख लिया। उनकी स्वतंत्र समाज सेवा बन्द हो गयी। कुछ वर्ष पूर्व तक मैं स्वयं विदेशी आर्थिक मददकर्ताओं के लिये ग्रामीण विकास सम्बन्धी अध्ययन करता था। मैंने पाया कि देश के लिये जो विषय जरूरी हैं, उनसे मैं भटकने लगा था।जर्जर सरकारी तंत्रविदेशी मददकर्ता देश द्वारा कभी-कभी जरूरी सेवाओं को सीधे उपलब्ध कराया जाता है। सरकार की तुलना में इनकी कार्यशैली साफ होती है जो स्वागत योग्य है। परन्तु इसका दुष्परिणाम यह होता है कि सरकारी तंत्र-पर दबाव समाप्त हो जाता है। समय के साथ मददकर्ता की योजना समाप्त हो जाती है। तब सर्वत्र वीराना छा जाता है। मददकर्ता द्वारा स्थापित तंत्र-धन के अभाव में सब काम बंद हो जाता है। तब तक चूंकि सरकारी तंत्र जर्जर हो चुका होता है अत: नाकाम हो जाता है।विदेशी आर्थिक मदद के इन दुष्प्रभावों के बावजूद हमारी सरकार पश्चिमी देशों से अधिकाधिक आर्थिक मदद के लिए हाथ पसारे रहती है। कारण यह कि बाहरी मदद से मिली रकम का रिसाव करना आसान होता है। उसकी तुलना में घरेलू करदाताओं से वसूले गये करों का गबन करना कठिन होता है। घरेलू धन के गबन की भरपायी के लिए करों की वसूली अधिक करनी पड़ती है, जिससे जनाक्रोश बढ़ता है। मदद में मिली रकम के गबन का घरेलू करदाताओं पर प्रभाव नहीं पड़ता है इसलिये सरकार ने युक्ति निकाली है कि मदद लेकर गबन करो।भ्रष्टाचार की समस्यामेरी समझ में सरकारी तंत्र में व्याप्त इस भ्रष्टाचार के नियंत्रण की मांग करना व्यर्थ है। इस समस्या को तो जड़ से दूर करना होगा। सरकार की यह दुर्नीति इस विचार पर टिकी है कि सरकारी तंत्र के माध्यम से जनहित हासिल किया जा सकता है। आज जनता आशा करती है कि सरकार शिक्षा देगी, अनाज देगी, दवा देगी, मकान देगी इत्यादि। जनता की इस आस का उपयोग सरकारी तंत्र द्वारा ढाल की तरह किया जाता है। इस ढाल के पीछे सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त रहता है, जैसा कि सर्व शिक्षा अभियान में पाया गया है।इस संदर्भ में हमें श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निर्देश को याद करना चाहिये। 1904 में उन्होंने लिखा था: “आज बंगालियों की चित्तधारा गांव से बिछुड़ गयी है। आज पानी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार की है। स्वास्थ्य सेवा की जिम्मेदारी सरकार की है। शिक्षा के लिये भी सरकार के दरवाजे पर दस्तक देनी होती है। समाज का वह वृक्ष, जो स्वयं फूलों की वर्षा करता था आज अपनी नंगी डालों से आकाश से पुष्पवर्षा की याचना कर रहा है।” समाज को समझना होगा कि सरकारी सेवाओं के आडम्बर के पीछे सरकारी तंत्र समाज को चूस रहा है।मंत्रियों का कहना है कि इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिये समाज को सरकारी कार्यों में पारदर्शिता की मांग करनी होगी। यह बात सही है, परन्तु यदि समाज को ही भ्रष्टाचार का निवारण करना है तो वह इन सेवाओं को प्रदान करने का कार्य भी स्वयं ही क्यों न करे? सरकारी विद्यालय की पारदर्शिता मांगने के स्थान पर स्वयं ही विद्यालय क्यों न चलाये? जब हम कल्याणकारी राज्य के मिथक से उबरेंगे तब ही इस प्रकार के भ्रष्टाचार पर कुछ नियंत्रण हो सकेगा।6