| दिंनाक: 07 Apr 2010 00:00:00 |
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मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लागू कर रहे हैंदेशद्रोहियों का एजेंडा”ऑटोनोमी”, घाटी से सेना की वापसी, आतंकियों का पुनर्वास और कश्मीर केन्द्रित मजहबी राजनीति का झंडा उठाए उमर अब्दुल्ला के शासन में “हिन्दुत्व” और “भारत” खतरे में।शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की पीठ पर हाथ रखकर जो भयंकर भूल जवाहर लाल नेहरू ने की थी, डा.मनमोहन सिंह उमर अब्दुल्ला के संबंध में वही इतिहास दोहरा रहे हैं।अपनी राजनीतिक विरासत “मुस्लिम तुष्टीकरण” को सहेज कर रखने वाली कांग्रेस देशद्रोही अलगाववादियों की नकेल कसने में असमर्थ।नरेन्द्र सहगलकश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से असम तक समस्त देश को अपनी चपेट में लेने वाली जाति/पंथ आधारित राजनीति का सबसे ज्यादा और भयानक असर जम्मू-कश्मीर प्रांत पर हुआ है। वास्तव में इसी राजनीति में से जम्मू-कश्मीर की वर्तमान समस्या का जन्म हुआ है। पाकिस्तान की सीमा के साथ सटा हुआ मुस्लिम बहुमत वाला यह प्रदेश न केवल स्वयं आतंकग्रस्त है, अपितु पूरे भारत में फैलाए जा रहे पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद का प्रवेश द्वार भी है। 26 अक्तूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय से आज तक, इस सीमावर्ती प्रदेश की सत्ता पर काबिज रहे सभी राजनीतिक दलों ने मुस्लिम वोट बैंक बनाने और उसे सुरक्षित रखने के लिए हिन्दू और भारत के हितों को आघात पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस काम में सबसे आगे निकल गए हैं जम्मू-कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला।उमर ने अपनाया अलगाववादी एजेंडापिछले 6 दशकों से जम्मू-कश्मीर की राजसत्ता संभालते आ रहे नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी जैसे दलों ने जिस कश्मीर केन्द्रित मुस्लिम परस्त राजनीति को बढ़ावा दिया है उसी का परिणाम है वर्तमान अलगाववाद और हिंसक आतंकवाद। दुर्भाग्य से जम्मू-कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कश्मीर केन्द्रित राजनीति का ही झंडा उठाए हुए हैं। कांग्रेस के समर्थन से चल रही नेशनल कांफ्रेंस की सरकार अलगाववादियों के एजेंडे को ही अपना वैचारिक आधार बनाकर योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। धीरे-धीरे कश्मीर घाटी की “मुकम्मल आजादी” के लिए सभी रास्ते तैयार किए जा रहे हैं। ऐसी परिस्थितियां बनाई जा रही हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। उमर अब्दुल्ला ने भारत सरकार के सहयोग से अपनी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के एजेंडे को लागू करना प्रारंभ कर दिया है। मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह के इशारे और “आशीर्वाद” से केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् द्वारा अलगाववादियों के साथ वार्ता की खामोश प्रक्रिया का कवच प्राप्त है।भीतर ही भीतर चल रही कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की इस संयुक्त रणनीति से कश्मीर घाटी में सक्रिय भारत विरोधी पृथकतावादियों का उत्साह बढ़ रहा है। हुर्रियत कांफ्रेंस, तहरीके हुर्रियत, जम्मू-कश्मीर फ्रीडम पार्टी और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट जैसे पाकिस्तान और “आजादी” समर्थक मुस्लिम संगठन सरेआम गांव-गांव जाकर आम लोगों को भड़का रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में तैनात भारतीय सुरक्षा बलों एवं ज.क.पुलिस पर मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के आरोपों का शोर मचाकर हड़ताल, बंद, पत्थरबाजी इत्यादि की घटनाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं। पाकिस्तान प्रेरित “जंगे आजादी” की जो लड़ाई कश्मीर घाटी के शहरों और बड़े कस्बों तक सीमित थी, वह अब गांवों में भी लड़ी जा रही है। नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकत्र्ताओं ने जम्मू-कश्मीर के लिए स्वायत्तता, पीडीपी के अनुयायियों ने स्वशासन, हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं ने आजादी, तहरीके हुर्रियत ने “कश्मीर बनेगा पाकिस्तान” का प्रचार अब बेरोकटोक शुरू कर दिया है।प्रधानमंत्री ने पीठ थपथपाईमुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भारत सरकार को यह समझाने में सफलता प्राप्त कर ली है कि कश्मीर के हालात सुधर रहे हैं, आतंकवादी बंदूक छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में प्रशिक्षण के लिए गए हजारों कश्मीरी युवक वापस आना चाहते हैं, जम्मू-कश्मीर में तैनात भारतीय सुरक्षा बलों का औचित्य समाप्त हो गया है, इन्हें वापस बुलाकर बैरकों में भेज देना चाहिए। उल्लेखनीय है कि उमर अब्दुल्ला की योजनानुसार, जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील स्थानों से भारतीय सुरक्षा बलों की पूरी तीन डिवीजनें वापस बुला ली गई हैं। जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह अलगाववादियों के हाथों में सौंपने की तैयारियां चल रही हैं। प्रतिपक्षी दल पीडीपी, सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस और प्राय: सभी अलगाववादी गुटों की एक ही राय है कि भारतीय सुरक्षा बलों को हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर में लागू “आम्र्ड फोर्सिस स्पेशल पावर्स एक्ट” को निरस्त कर दिया जाए।हाल ही में अपनी दो दिन की कश्मीर घाटी की यात्रा के समय प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने यह कहकर अलगाववाद को कथित सरकारी संरक्षण दे रहे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की पीठ थपथपा दी थी कि “उमर अब्दुल्ला देश के सबसे कम उम्र के सबसे योग्य मुख्यमंत्री हैं।” यह कहकर प्रधानमंत्री ने भारतीय सेनाधिकारियों, सुरक्षा विशेषज्ञों, गुप्तचर अधिकारियों और कश्मीर घाटी में व्याप्त वास्तविक परिस्थितियों के जानकारों की पूर्ण अनदेखी कर दी। जबकि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री के पास ये सूचनाएं निश्चित रूप से पहुंच रही हैं कि कश्मीर घाटी में आतंकवादी गुप्त रूप से मोर्चेबंदी कर रहे हैं। पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में कश्मीरी युवकों को आतंकवाद फैलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र घुसपैठ के प्रयास भी हो रहे हैं। अभी गत 21 जून को पाकिस्तान के सैनिकों ने जम्मू के निकट अब्दुल्लियां नामक भारतीय गांव समेत कई सैन्य चौकियों पर भारी गोलाबारी करके नवम्बर 2009 में हुए संघर्ष विराम समझौते को फिर तोड़ा है। इन सब घटनाओं और तथ्यों को देश और प्रदेश की सरकारें नजरअंदाज कर रही हैं। क्या यह देश को धोखे में रखना नहीं है?आतंकियों के हमदर्द मुख्यमंत्रीसभी जानते हैं कि अपने अब तक के एक वर्ष के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मुस्लिम मतों को बटोरने में जुटी कांग्रेस नीत केन्द्र सरकार से “ऑटोनोमी” एवं सेना वापसी के प्रस्तावों पर अंदरखाने मोहर लगवा ली है। विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, उमर अब्दुल्ला ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से वापस आने वाले प्रशिक्षित आतंकवादियों के पुनर्वास के लिए भी केन्द्र सरकार से हरी झंडी ले ली है। फरवरी 2010 में केन्द्र के साथ हुई बातचीत के बाद तैयार की गई इस योजना को शीघ्र ही गृह मंत्रालय की स्वीकृति के लिए भेजा जाने वाला है। इस योजना के तहत पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई के कश्मीर स्थित एजेंटों द्वारा पाकिस्तान भेजे गए और प्रशिक्षित किए गए दुर्दांत आतंकियों को वापस कश्मीर घाटी में लाया जाएगा।भारत की सरकार, सेना और जनता के विरुद्ध लड़ने वाले उन आतंकियों को भी पुनर्वास के लिए सरकारी खजाने से आर्थिक सहायता दी जाएगी जो हथियार छोड़कर समर्पण करेंगे। सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में मरने वाले आतंकियों के परिवारों को प्रति परिवार चार लाख रुपये की सहायता दी जाएगी। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के अनुसार, हिंसा छोड़ने वाले युवकों की शिकायतें दूर करने के लिए उनका आर्थिक पैकेज बढ़ाया जा रहा है। देशद्रोही आतंकवादियों की कौन सी शिकायतें और जरूरतें हैं, यह तो उमर अब्दुल्ला ही जानते हैं। परंतु इतना स्पष्ट है कि जम्मू- कश्मीर की सरकार द्वारा उठाया जा रहा यह कदम जम्मू-कश्मीर के उन लाखों देशभक्त युवकों का अपमान है जिन्होंने अलगाववाद का रास्ता नहीं अपनाया।देशद्रोही और देशभक्त एक समान!उल्लेखनीय है कि अभी तक जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा मुआवजा केवल उन सरकारी कर्मचारियों, सुरक्षा जवानों और नागरिकों के परिवारों को ही दिया जाता था जो आतंकी हमलों में मारे जाते थे। अब उमर सरकार ने मरने वाले पूर्व आतंकियों के परिवारों को भी इस श्रेणी में रखकर इन्हें भी “शहीद” मान लिया है। यह उन अलगाववादियों का एजेंडा ही तो है जो भारत विरोधी हिंसक आतंकियों को “स्वतंत्रता सेनानी” मानते हैं और सुरक्षा जवानों के हाथों मारे जाने पर उन्हें “शहीद” कहकर सम्मानित करते हैं। अभी तक पूर्व आतंकियों और उनके परिवार वालों को विदेश जाने के लिए प्रदेश सरकार पासपोर्ट लेने की अनुमति नहीं देती थी। लेकिन उमर अब्दुल्ला ने यह नियम भी बदल डाला है। अब पूर्व आतंकियों को पासपोर्ट बनवाने की सभी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। उमर अब्दुल्ला द्वारा दिखाई जा रही आतंकी युवकों के प्रति यह हमदर्दी वास्तव में उसी हिन्दुत्व और भारत विरोधी सरकारी रीति-नीति का हिस्सा है जिसे पिछले छह दशकों से जम्मू-कश्मीर में अपनाया जा रहा है।मुस्लिम आतंकियों की भलाई जम्मू-कश्मीर की “स्वायत्तता” और भारतीय सेना की वापसी के लिए उतावले हो रहे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को बौद्ध बहुमत वाले लद्दाख और हिन्दू बहुमत वाले जम्मू की चिंता नहीं सताती। कश्मीर घाटी से निर्वासित किए गए चार लाख कश्मीरी हिन्दुओं की घर वापसी, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से 1947 में जम्मू आकर बसे लाखों हिन्दुओं की नागरिकता, भारत-पाकिस्तान युद्धों के समय सीमांत क्षेत्रों से हटाए गए लोगों का पुनर्वास, आतंकियों की “जंगे आजादी” से पीड़ित लोगों की दशा, जम्मू संभाग के प्रति हो रहे घोर पक्षपात और लद्दाख की गरीबी इत्यादि समस्याओं पर मुख्यमंत्री का ध्यान नहीं जा रहा। उन्हें केवल “मुस्लिम कश्मीर” की चिंता है।दादा और पिता की राह पर उमरउमर अब्दुल्ला अपने पिता डा.फारुख अब्दुल्ला और दादा शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के पदचिन्हों पर ही चल रहे हैं। सर्वविदित है कि शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के ही प्रयासों से अनुच्छेद 370, प्रदेश का अलग संविधान और ध्वज, परमिट व्यवस्था, सदरे रियासत और प्रधानमंत्री जैसे पदनाम और कश्मीर केन्द्रित राजनीति अस्तित्व में आई थी। इसी तरह डा.फारुख अब्दुल्ला ने विभाजन के समय पाकिस्तान गए जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों को वापस बुलाने का विधेयक प्रस्तुत किया था, जिसे राज्यपाल ने स्वीकृति नहीं दी थी। फारुख अब्दुल्ला ने ही जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में स्वायत्तता संबंधी विधेयक को दो तिहाई बहुमत से पारित करवाकर केन्द्र सरकार के पास भेजा था। इस विधेयक को तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने स्वीकृति नहीं दी थी।अत: सन् 2008 में हुए विशाल एवं प्रचंड श्री अमरनाथ भूमि आंदोलन के समय हिन्दू विरोधियों का समर्थन करने और उसी समय भारतीय संसद में कश्मीर को “राष्ट्र” बताने वाले उमर अब्दुल्ला जैसे अलगाववादी सोच से ग्रस्त मुख्यमंत्री से हिन्दुत्व और भारत की रक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती। उमर अब्दुल्ला अपने दादा की तरह श्रीनगर में कट्टर मुसलमान, जम्मू में सेकुलर तो दिल्ली में भारतीय होते हैं। प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह अपने “प्रिय” मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की पीठ पर हाथ रखकर वही गलती कर रहे हैं जो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के संबंध में की थी।7