| दिंनाक: 07 Dec 2009 00:00:00 |
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भारत का वार्षिक अर्थ संकल्प (बजट) 6 जुलाई को देश के वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी प्रस्तुत करेंगे। नई लोकसभा के गठन के बाद यह उनका पहला अर्थ संकल्प होगा। इसलिए इससे लोगों को बहुत आशा है, अपेक्षा है, लेकिन उससे कहीं अधिक आशंका थी। निकट भविष्य में न तो प्रमुख राज्यों में चुनाव हैं और न ही कोई चुनौती, इसलिए माना जा रहा है कि बजट से आम आदमी को राहत नहीं मिलेगी। कुछ का कहना है कि कृषि क्षेत्र की उपेक्षा और औद्योगिक जगत पर विशेष कृपा से भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक लाभ नहीं होगा। मंदी के दौर से गुजर रहे देश और महंगाई से जूझते आम आदमी के लिए यह अर्थ संकल्प क्या कुछ सुकून पहुंचा पाएगा, इस विषय पर हमने प्रतिनिधि स्वरूप आम सरोकारों से जुड़े कुछ जागरूक नागरिकों से बात की। यहां प्रस्तुत है बजट से पूर्व उनकी आशा, अपेक्षा और आशंका की एक झलक। -सं. द जितेन्द्र तिवारीअर्थ मंत्री, दु:ख-दर्द दूर करो!आसान नहीं है बाबू मोशायडा. अश्विनी महाजनएसोसिएट प्रोफेसर, पी.जी.डी.ए.वी. कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय1990-91 में करों से कुल प्राप्ति जहां 68,500 करोड़ रुपए थी, वह बढ़कर 2008-09 के अनुमानों के अनुसार 6,27,949 करोड़ रु. तक पहुंच चुकी है। यानी इस कालखंड में करों से प्राप्ति लगभग 10 गुणा हो चुकी थी। बढ़ते राजस्व से उत्साहित होकर सरकारी खर्च भी लगातार बढ़ता गया और वर्ष 2008-09 में यह बढ़कर 9,00,953 करोड़ रु. हो चुका है। दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारियों के लिए छठे वेतन आयोग का लागू होना और 70,000 करोड़ रुपए से भी अधिक के किसान ऋण माफी ने सरकारी खर्च का संतुलन बिगाड़ दिया है। राजकोषीय घाटा 3,26,515 करोड़ तक पहुंच गया है। वित्तमंत्री के सामने एक चुनौती यह होगी कि घटते राजस्वों और लगातार बढ़ते सरकारी खर्च के बीच बढ़ती खाई का क्या समाधान खोजें। मंदी का असर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा, जिसके चलते वित्तमंत्री कर बढ़ाने का जोखिम भी नहीं उठा सकते। यह भी मांग जोर पकड़ रही है कि करमुक्त आय की सीमा 1.5 लाख से बढ़ाकर तीन लाख कर दी जाए। यदि यह बात मानी जाती है तो राजस्व में और भी नुकसान हो सकता है। वित्तमंत्री के सामने यह भी चुनौती है कि देश में रोजगार के अवसर बढ़ने की बजाय घट रहे हैं। मंदी की मार के कारण बीपीओ क्षेत्र भी आज उस स्थिति में नहीं है कि और अधिक रोजगार दे सके, बल्कि लोगों की नौकरियां छूटती जा रही हैं। निर्यात क्षेत्र में भी लोगों के रोजगार कम हो रहे हैं। उधर कृषि क्षेत्र भारी संकट से गुजर रहा है। किसानों की लगातार घटती आमदनी उन्हें कृषि से बाहर धकेलने का काम कर रही है। वे आत्महत्या भी कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र में ढांचागत विकास समय की मांग है। लोक जन-स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य प्रकार की सामाजिक सेवाओं पर भी सरकारी खर्च बढ़ाने की तुरंत आवश्यकता है। लेकिन देखना होगा कि वित्त मंत्री इन सेवाओं के लिए आमदनी को बढ़ाने के कैसे उपाय अपनाते हैं। सार्वजनिक उद्यमों को बेचकर धन जुटाना एक आसान तरीका है। लेकिन परिसंपत्तियों को बेचकर रोजमर्रा का खर्च चलाना यह कोई समझदारी की बात नहीं होगी।द10