| दिंनाक: 02 Apr 2007 00:00:00 |
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दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने कियाडा. श्याम त्रिपाठी और श्री देवेन्द्र प्रताप सिंह का अभिनंदनदिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने गत 23 जनवरी को अपने कार्यालय में साहित्य गोष्ठी का आयोजन किया। सम्मेलन के अध्यक्ष श्री महेश चन्द्र शर्मा ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की। साहित्य गोष्ठी में “हिन्दू चेतना” के प्रधान संपादक डा. श्याम त्रिपाठी तथा अमरीका से आए हिन्दी प्रेमी श्री देवेन्द्र प्रताप सिंह का अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर श्रीमती इन्दिरा मोहन, श्री श्याम सुन्दर गुप्ता, श्री नाहर सिंह वर्मा, एवं श्रीमती मीरा शलम आदि वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार उपस्थित थे। -प्रतिनिधिऐसे लोगों से मिलकर आनंद आता है जो हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान की चिंता विदेशी धरती पर करते हैं। ये उन लोगों से तो कहीं अच्छे हैं जो भारत में तो रहते हैं पर न हिन्दी की चिंता करते हैं, न हिन्दू की, जिनके रोम-रोम में बसी है तो सिर्फ अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी। कनाडा में रह रहे डा. श्याम त्रिपाठी और अमरीका के न्यू जर्सी शहर में रहने वाले श्री देवेन्द्र प्रताप सिंह की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। पिछले दिनों ये दोनों हिन्दी प्रेमी दिल्ली आए थे। उन्होंने यहां हिन्दी साहित्य अकादमी और अक्षरम् द्वारा आयोजित हिन्दी उत्सव में भाग लिया तथा हिन्दी के साहित्यकारों, मनीषियों से भेंट की। वे पांचजन्य के कार्यालय में भी आए और हमने उनसे विदेशी धरती पर हिन्दी के प्रति रूझान की चर्चा की।कनाडा से आए डा. त्रिपाठी ने बताया कि अब समय बदल रहा है और विदेशी लोग हिन्दी के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने जब से हिन्दी सीखने की लालसा प्रकट की है तब से तो विदेशी धरती पर हिन्दी प्रेम देखते ही बनता है। डा. त्रिपाठी पिछले 10 साल से हिन्दी चेतना पत्रिका निकाल रहे हैं और इसके चाहने वालों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। उनकी कोशिश है कि वे हिन्दी प्रेमी लेखकों, कवियों का एक अन्तरराष्ट्रीय मंच तैयार करें। डा. त्रिपाठी इस बात से खिन्न हैं कि भारत में हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। शायद इसी रौ में उन्होंने ये दो पंक्तियां गुनगुनाईं-हम कौन थे, क्या हो गयेऔर क्या होंगे अभीश्री देवेन्द्र प्रताप सिंह तो 27 वर्ष से अमरीका में रह रहे हैं और हिन्दी यू.एस.ए. नामक एक संगठन से जुड़े हैं। देवेन्द्र जी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में पूरी तरह से रमे हुए हैं। उनकी एक ही साध है कि हिन्दी के माध्यम से पश्चिम और पूरब के बीच दूरियां कम हों। हिन्दी का स्थान सभी भाषाओं में ऊंचा है और वह बना रहना चाहिए। इसी तरह है अपना हिन्दू धर्म, जिसके मूल्यों पर चलते हुए हमें विदेशी धरती पर एक प्रभाव स्थापित करना है। प्रतिनिधि16