| दिंनाक: 02 Apr 2007 00:00:00 |
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महात्मा गांधी भी परिवारवाद की गिरफ्त में?देवेन्द्र स्वरूपइस 11 जनवरी को मुम्बई के मणि भवन में महात्मा गांधी के कुछ वंशज एकत्र हुए। मणि भवन का नामकरण गांधीजी के दूसरे बेटे मणिलाल के नाम पर हुआ है। इस भवन में लगभग 50,000 पुस्तकों वाला एक विशाल पुस्तकालय है और ये सभी पुस्तकें गांधी की या गांधी पर हैं। गांधी की लोकप्रियता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है? मैं नहीं जानता कि 19वीं या 20वीं शताब्दी के किसी अन्य व्यक्तित्व पर इतना विशाल साहित्य रचा गया है। यह क्रम अभी भी बंद नहीं हुआ है। प्रतिमाह गांधी पर किसी न किसी नए प्रकाशन की समीक्षा आंखों के सामने आ जाती है। गांधी के जीवन और विचारों की प्रत्येक छोटी से छोटी बात का सूक्ष्मदर्शी वर्णन-विवेचन हमें उपलब्ध है। तब राजमोहन गांधी को एक नई जीवनी लिखने की क्या आवश्यकता थी? वे पहले ही “गुड बोटमैन” (अच्छा नाविक) शीर्षक से गांधी जी की एक जीवनी 1995 में प्रकाशित कर चुके थे। तब 2006 के अंत में गांधी जी के जीवन की ऐसी क्या बात उनकी पकड़ में आ गई, जिसको प्रकाश में लाना उन्हें आवश्यक लगा? राजमोहन की इस किताब की अखबारों में खूब चर्चा हुई। अंग्रेजी साप्ताहिक “आउटलुक” को उस किताब में सनसनीखेज कवर स्टोरी मिल गई, और वह है कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बहन स्वर्णलता की पुत्री सरला चौधुरानी के साथ 1919 से 1921 तक दो वर्ष लम्बा गांधी जी का प्रेम-प्रकरण। पुस्तक की व्यापक चर्चा के लिए दो कारण बन गए- एक प्रेम प्रसंग और दूसरा, उसका गांधीजी के अपने पौत्र द्वारा उद्घाटन। गांधी जैसे किसी महापुरुष की प्रेम कथा का चटखारे ले-लेकर वर्णन करना आज की नई पीढ़ी को खूब सुहाता है। शायद, रोमांस से जोड़े बिना आज किसी चीज के लिए बाजार मिलना कठिन हो गया है। इस दृष्टि से राजमोहन सफल रहे। जबकि इसके पहले उनकी लिखी छह पुस्तकें बाजार में पिट गर्इं, 650 रुपए कीमत की इस मोटी पुस्तक की 5000 प्रतियां केवल पन्द्रह दिन के भीतर ही हाथों-हाथ बिक गर्इं।कथा पुरानी हैसरला चौधुरानी के तथाकथित प्रेम प्रसंग की व्यापक चर्चा से चिन्तित होकर गांधी जी के एक प्रपौत्र तुषार गांधी ने लिख डाला कि राजमोहन काका को इस प्रसंग की चर्चा करनी ही नहीं चाहिए थी। शायद उन्होंने अपनी पुस्तक को लोकप्रिय बनाने के लिए इस प्रसंग का उल्लेख किया है। वैसे, गांधी के नाम पर लोकप्रियता कमाने में तुषार गांधी भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने भी अपनी पुस्तक का उत्तेजक शीर्षक दिया, “लैट अस किल गांधी” (हमें गांधी की हत्या करने दो) लेकिन, उन्होंने माना है “यह शीर्षक मैंने लोगों का ध्यान पुस्तक की ओर खींचने के लिए दिया है। मेरा मकसद बाजार को प्रभावित करना है।” (दैनिक भास्कर, 17 जनवरी) क्या सचमुच तुषार गांधी को यह पता नहीं कि सरला चौधुरानी के प्रति गांधी जी के आकर्षण की कहानी इसके पहले अनेक बार छप चुकी है। राजमोहन की पुस्तक बाजार में आने के लगभग एक साल पहले सप्रू हाउस और जे.एन.यू. में पुस्तकालयाध्यक्ष रहे गिरजा कुमार की 407 पृष्ठों की पुस्तक “ब्राह्मचर्य : गांधी एण्ड हिज वुमेन एसोशियेट्स” बाजार में आ चुकी थी, जिसमें सरला चौधुरानी के साथ गांधी जी के सम्बंधों पर दो अध्यायों को 26 पृष्ठ दिए गये हैं। मैंने दोनों पुस्तकों को पढ़ा है। गिरजा कुमार की पुस्तक में दी गई जानकारी राजमोहन की तुलना में कहीं अधिक और प्रमाण पर आधारित है। गिरजा कुमार ने इस प्रसंग को लिखने के लिए गांधी जी के पत्रों को आधार बनाया है और ये सभी पत्र संपूर्ण गांधी वाङ्मय के खंड 16,17,18 और 19 में साठ के दशक में ही प्रकाशित हो चुके थे।यह सत्य है कि गांधीजी और सरला चौधुरानी ने अपनी-अपनी आत्मकथाओं में इस सम्बंध का उल्लेख नहीं किया। किन्तु 1969 में नार्मन कजिन द्वारा सम्पादित “प्रोफाइल्स आफ गांधी” नामक पुस्तक में मार्गरेट सेंगर का एक लेख है जिसमें सेंगर ने बताया है कि गांधी जी से उसकी इस प्रसंग पर चर्चा हुई थी जिसमें गांधी जी ने यह भी बताया था कि उन्होंने इस प्रसंग का अपनी आत्मकथा में उल्लेख क्यों नहीं किया। गांधी जी के निकट सहयोगी महादेव देसाई की डायरियों में भी इस प्रसंग का उल्लेख है और वे डायरियां भी अनेक वर्ष पूर्व प्रकाशित हो चुकी हैं। 1993 में प्रकाशित मार्टिन ग्रीन की पुस्तक “गांधी : वायस आफ ए न्यू एज रिवोल्यूशन” तथा प्यारेलाल और सुशीला नैयर द्वारा लिखित गांधी जी की बहुखंडीय बृहत जीवनी के 1994 में प्रकाशित खंड 5 में भी यह प्रसंग दिया गया है। 2006 में कैथरीन टिडरिक द्वारा लिखित “गांधी-ए पोलिटिकल एण्ड स्प्रिचिअल लाइफ” में भी इसका उल्लेख है।सोनिया पार्टी के गांधीइस सबके बाद भी मीडिया ने राजमोहन गांधी की 750 पृष्ठों की विशाल पुस्तक में केवल छह पृष्ठों पर दिए गए इस प्रकरण को इस तरह उछाला मानो पहली बार गांधी के इस प्रेम प्रसंग पर से गांधी जी के एक वंशज द्वारा पर्दा हटाया गया है। आश्चर्य यह कि राजमोहन गांधी ने भी यह स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं समझी कि वे पहली बार इस घटना को प्रकाश में नहीं ला रहे हैं। और तुषार गांधी को लगा कि अगर राजमोहन जिक्र नहीं करते तो यह प्रसंग अनजाना रह जाता। यह स्पष्ट है कि इस पुस्तक को लिखने और प्रकाशित करने के पीछे राजमोहन की दृष्टि शुद्ध व्यावसायिक रही है अन्यथा वे इस पुस्तक का लोकार्पण सोनिया गांधी से न कराते। गांधी जी के बारे में सोनिया गांधी क्या जानती हैं, सिवाय इसके कि वे वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन की सूत्र संचालक हैं और अपनी वंशवादी राजनीति के लिए महात्मा जी के नाम को भुनाने की कोशिश में लगी हैं। पहले उन्होंने गुजरात जाकर गांधी जी के डांडी मार्च का रिहर्सल किया, अब वे 29 जनवरी को गांधी जी के सत्याग्रह की शताब्दी के नाम पर एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन बुला रही हैं, जिसमें 86 देशों के प्रतिनिधि बुलाए गए पर अपने देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को नहीं बुलाया। जब भाजपा ने इस पर आपत्ति की तो सोनिया पार्टी के प्रवक्ता ने बेशर्मी से कहा कि भाजपा गांधी धारा का और स्वाधीनता आंदोलन का अंग नहीं रही है। तब क्या सोनिया को वर्तमान वंशवादी पार्टी का गांधी से, स्वाधीनता आंदोलन से कोई रिश्ता रहा है? जिस दल ने गांधीवादी समाजवाद को अपनी विचारधारा के रूप में अपनाया, जिस दल के दार्शनिक संस्थापक पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रणीत एकात्म मानव दर्शन पूरी तरह गांधीजी के जीवन दर्शन से अनुप्राणित है, उसे नीचा दिखाने के लिए ऐसा टोला गांधी जी के नाम को भुनाने की कोशिश करे जिसकी दृष्टि एक वंश से आगे जाती ही नहीं, इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है?गांधी एक परिवार नहीं, विचार हैगांधी जी केवल विचार के लिए जिए, उन्होंने आदर्शों की उपासना की, उसके लिए पहले स्वयं पर प्रयोग किए, इस प्रयोग साधना की कीमत उनके परिवार को भी चुकानी पड़ी। गांधी ने कब कहा कि वे ईश्वर के यहां से ही महानता लेकर धरती पर जन्मे थे। या उन्होंने जन्मते ही काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकारों पर विजय पा ली थी। बल्कि उनकी आत्मकथा ऐसे व्यक्ति का चित्र प्रस्तुत करती है जो बचपन में बहुत कामुक और भीरू था, जो पश्चिम की चकाचौंध से आकर्षित था। गांधी जी ने अपने जीवन में प्रत्येक परिवर्तन का जीवंत वर्णन किया है। संसार भर की आत्मकथाओं में शायद गांधी की ही ऐसी अकेली आत्मकथा है जो कमजोर से कमजोर व्यक्ति को भी अपनी कमजोरियों पर विजय पाने का विश्वास दिलाती है। 8 जनवरी, 1915 को भारत वापसी के क्षण से 30 जनवरी, 1948 को महाप्रयाण तक गांधी का जीवन एक खुली किताब की तरह देशवासियों के सामने रहा। उनके आश्रम जीवन में कोई भी कभी भी झांक सकता है। समझने की बात यह है कि गांधी में ऐसा क्या था कि अपनी सब दुर्बलताओं का ढिंढोरा पीटने के बाद भी उनका जादू राजगोपालाचारी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, जय प्रकाश और लोहिया, डा. राजेन्द्र प्रसाद और सुभाष बोस जैसे दिग्गजों की श्रद्धा को आपसी मतभेदों के बावजूद अपने प्रति बनाए रख सका? जरा कल्पना कीजिए, 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों द्वारा मनोनीत सरदार पटेल जैसे लौहपुरुष ने 1946 में, केवल गांधी की इच्छा का आदर करने के लिए उन जवाहरलाल नेहरू के पक्ष में कांग्रेस अध्यक्ष का पद ठुकरा दिया, जिनका नाम एक भी प्रान्तीय कमेटी ने प्रस्तावित नहीं किया था। आज जब सभी राजनैतिक दलों के भीतर सत्ता और पदों के लिए जो मार काट चल रही है उसे देखते हुए क्या यह चमत्कार नहीं है?जो बुद्धिजीवी अपने जीवन से एक व्यक्ति को भी आदर्श जीवन, नि:स्वार्थ राष्ट्र सेवा की प्रेरणा नहीं दे सकते वे अपनी बुद्धि की धुरी से गांधी की “शव परीक्षा” करने में लगे हैं। वे गांधी को काम-वासना का पुतला सिद्ध करने में लगे हैं। गिरजा कुमार की पुस्तक “ब्राह्मचर्य” और सुधीर कक्कड़ की “मीरा और महात्मा” जैसी पुस्तकों को गन्दगी ढूंढने वाले दिमागों की ही उपज कहा जा सकता है। गांधी का चरित्र हनन करके वे शायद किताब बेच सकते हैं पर लोकमानस पर गांधी की पकड़ को कम नहीं कर सकते। आज भी सभ्यता विषयक वैश्विक बहस में केवल गांधी को ही विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। विश्व के अनेक देशों में गांधी का अध्ययन हो रहा है। गांधी की प्रतिमाएं स्थापित की जा रही हैं। उनके विचार पर साहित्य प्रकाशित हो रहा है। गांधी का चिन्तन कालजयी है क्योंकि वह भारत की युगयुगीन दर्शन धारा की व्याख्या और प्रयोग मात्र था। गांधी ने भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों को व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन में जीने का ईमानदार प्रयास किया। कहीं वे सफल रहे, कहीं असफल भी।गांधी का चमत्कारिक व्यक्तित्वविचार के धरातल पर गांधी चिन्तन को पूरी तरह अस्वीकार करने वाले नेहरू ने भी यह माना कि गांधी के अलावा हममें से कोई भी व्यक्ति भारतीय जन-मन को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष और त्याग की प्रेरणा देने में सक्षम नहीं है। किन्तु उनके लिए यह प्रश्न ही बना रहा कि गांधी की इस लोकप्रियता का रहस्य क्या है? एक बार नेहरू ने स्वयं से पूछा कि गांधी न तो ओजस्वी वक्ता हैं, न ही उनके पास वैभव है, न सत्ता, फिर भी जन-मन पर उनकी पकड़ क्यों है? विभाजन के समय गांधी की लोकप्रियता घटने लगी थी, उजड़े विस्थापितों का आक्रोश उनकी कुटिया के बाहर प्रदर्शनों में प्रकट होने लगा था, पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने के लिए जब उन्होंने भूख हड़ताल के हथियार का इस्तेमाल किया तो सरदार पटेल जैसे निष्ठावान साथी भी विचलित हो उठे थे। यहां तक कि गांधी के सबसे छोटे पुत्र देवराज ने भी उन्हें पत्र लिखकर अनशन न करने की सलाह दी थी। कुछ लोगों को लगता था कि अब गांधी का जादू खत्म हो रहा है। पर 30 जनवरी, 1948 को हत्या के बाद गांधी के प्रति लोक श्रद्धा पुनरुज्जीवित हो गई, उन्माद का रूप धारण कर गई। यहां तक कहा जाने लगा कि मृत गांधी जीवित गांधी से अधिक बलवान निकले।गांधी जी के जीवन में यौन-कथाएं ढूंढने वाले मस्तिष्क गिरिजा कमार और सुधीर कक्कड़ की पुस्तक के बजाय मीरा बहन की आत्मकथा क्यों नहीं पढ़ते? यह क्यों नहीं ढूंढते कि गांधी जी स्वतंत्रता आंदोलन में नारी शक्ति को इतनी बड़ी मात्रा में क्यों उतार पाये? समझ में नहीं आता कि क्यों हम अपने महापुरुषों को बौना बनाने में लगे हैं? क्यों भूल जाते हैं कि भारतीय दर्शन ने केवल “परब्राह्म” को ही दोषमुक्त व पूर्ण माना है। हम महापुरुषों की कमियां ढूंढने की बजाय उनके शक्ति-बिन्दुओं को क्यों नहीं ढूंढते? उनके आदर्शों पर चलने का प्रयास क्यों नहीं करते?परिवारवाद की कसौटी पर गांधीपर भारत आज वोट-बैंक राजनीति का पूरी तरह बन्दी बन गया है। वोट बैंक राजनीति के कारण ही अब भारत विभाजन भी गांधी के मत्थे ही मढ़ा जा रहा है और जिन्ना का गुणगान हो रहा है। गांधी के बहाने हिन्दू समाज को विभाजन का अपराधी बताया जा रहा है। भारत के इस वातावरण से ही शक्ति पाकर एक पाकिस्तानी लेखक शाहिद कामरान ने लाहौर से एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसमें गांधी की हिन्दू-निष्ठा को ही भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। और बंगलौर का ब्राह्मण विरोधी “दलित वायस” पाक्षिक इस पुस्तक की फोटोकापी खुलेआम सस्ते में बेच रहा है।पीड़ा यह है कि गांधी के इस चरित्र हनन के व्यापार में अब गांधी के वंशज भी सम्मिलित हो गए हैं। एक ओर तो वे अपने को गांधी की बौद्धिक विरासत का उत्तराधिकारी दिखाना चाहते हैं, दूसरी ओर वे गांधी का मूल्यांकन परिवारवाद की कसौटी पर करना चाहते हैं। पूरी दुनिया उन्हें श्रद्धा के साथ महात्मा, बापू या गांधी जी कहती है, पर राजमोहन ने अपनी पुस्तक का नाम “मोहनदास” रखा है। शायद गांधी भक्ति से अपनी मुक्ति का प्रदर्शन करने के लिए गांधी जी की एक प्रपौत्री उमा धूपालिया मेस्त्री, जो दक्षिण अफ्रीका में प्राध्यापक हैं, ने अपने दादा, गांधी जी के बेटे मणिलाल के जीवन चरित्र को शीर्षक दिया है “गांधी का बंदी”। इसमें शक नहीं कि गांधी ने अपने आदर्शों का प्रयोग अपनी पत्नी कस्तूरबा और चारों बेटों पर निर्ममता के साथ किया। उन्होंने नेहरू वंश के समान अपने पुत्रों के लौकिक भविष्य की चिन्ता नहीं की। जिस रात उनके पुत्र का तेज ज्वर और तेज होता जा रहा था उस समय भी वे प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति अपनी निष्ठा पर अडिग खड़े थे। यदि उन्हें लगा कि स्कूली शिक्षा की अपेक्षा चरित्र और कर्म की शिक्षा अधिक श्रेयस्कर है तो उन्होंने उसका प्रयोग अपने चारों बेटों पर किया। गांधी जी के जीवन के ऐसे मार्मिक प्रसंगों में छिपी उनकी अन्तवेर्दना को समझना आवश्यक है। किन्तु यदि मुम्बई के मणि भवन में एकत्र गांधी कुनबा यदि टाइम्स आफ इंडिया (12 जनवरी) में शीर्षक बनाये कि “अब हरिलाल काका ही हमारे आदर्श हैं”, तो इसे गांधी की दूसरी हत्या के अलावा क्या कहें? (24 जनवरी, 2007)33