| दिंनाक: 02 Apr 2007 00:00:00 |
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सिल्वा क्यों, माशेलकर क्यों नहीं?गोवा की कांग्रेस सरकार और वहां राज्यपाल पद पर बैठे कांग्रेस के नेता एस.सी. जमीर से और अपेक्षा ही क्या की जा सकती थी। निर्लज्जता और जन भावनाओं के दमन की तमाम सीमाएं लांघते हुए उन्होंने जिस प्रकार आततायी पुर्तगालियों के प्रतिनिधि का सम्मान किया उससे गोवा का जन-मन बेहद व्यथित है। कौन भूला होगा करीब 497 वर्ष पूर्व गोवा में शुरू हुए पुर्तगालियों के अत्याचारों को, जब पुर्तगाली शासन ने हिन्दुओं पर भीषण अत्याचार किए, महिलाओं का अपमान किया। पर अंतत: गोवा मुक्त हुआ उस कालरात्रि से और धीरे-धीरे अपने को संजोने लगा। परन्तु 14 जनवरी, 2007 को पुर्तगाल के राष्ट्रपति अनिबाल कावासो सिल्वा का पणजी में अभिनंदन करके और गोवा विश्वविद्यालय से मानद उपाधि दिलाकर मानो गोवा की कांग्रेस सरकार ने लोगों की भावनाओं का उपहास उड़ाया था।हुआ यूं कि राज्यपाल एस.सी. जमीर, जो गोवा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं, ने पुर्तगाली राष्ट्रपति को गोवा विश्वविद्यालय से डी.लिट्. की मानद उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। विश्वविद्यालय की कार्यसमिति से इसे अनुमोदित करा लिया और 14 जनवरी को यह अलंकरण समारोह आयोजित कर दिया गया।इसका विरोध हुआ, और तीखा विरोध हुआ। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (अभाविप) ने प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती नीलांगी शिंदे के नेतृत्व में उस सभागार के बाहर प्रदर्शन किया जहां अलंकरण समारोह चल रहा था। बड़ी संख्या में छात्रों ने गिरफ्तारी दी। विद्यार्थी परिषद् ने इस पूरे आयोजन की भत्र्सना करते हुए कहा कि गोवा के मूल निवासी डा. रघुनाथ माशेलकर, डा. अनिल काकोडकर और स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जैसे ख्यातनाम लोगों को छोड़कर कुलाधिपति जमीर ने एक विदेशी और वह भी पुर्तगाली को डी. लिट् की उपाधि प्रदान करके अपनी औपनिवेशिक मानसिकता का परिचय दिया है। उन्होंने कहा कि जब से गोवा में कांग्रेस की सरकार बनी है तबसे ही वह दुनियाभर में गोवा की गैर-हिन्दू छवि बनाने का प्रयास कर रही है। विद्यार्थी परिषद् के इस विरोध प्रदर्शन को गोवा के विश्वविद्यालय और कालेज शिक्षक संघ का समर्थन प्राप्त था। गोवा के स्वत्रंतता सेनानियों के संगठन ने भी विद्यार्थी परिषद् के आंदोलन का साथ दिया।अ.भा. विद्यार्थी परिषद् की राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद् के सदस्य श्री दत्ता नाईक गोवा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के इस आयोजन से बेहद नाराज हैं। पाञ्चजन्य से बातचीत में उन्होंने साफ कहा कि राज्यपाल जमीर ने गुलाम मानसिकता का परिचय देते हुए इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई और इसे कार्यरूप दिया। उन्होंने कुलाधिपति पद का दुरुपयोग करते हुए विश्वविद्यालय के सीनेट और विद्वत परिषद् की सलाह तक नहीं ली, केवल कार्यकारी परिषद् से अनुमोदन करा लिया। श्री नाईक ने यह भी आशंका जताई कि “यह कांग्रेस सरकार 2010 में पुर्तगालियों के “आगमन” (आक्रमण) की 500वीं जयंती मनाने की हद तक जा सकती है। हम इसका विरोध करते हैं।” गोवा के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने एक प्रकार से पुर्तगाली राष्ट्रपति के सामने खुद को बौना साबित किया है। प्रतिनिधि34