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बंगाल दिनांक-1<p style=font-weight:bold;text-align:

Written byArchiveArchive
Dec 2, 2006, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 02 Dec 2006 00:00:00

बंगाल दिनांक-1

बेहाल बंगाल

कम्युनिस्टों के शिकंजे से आजादी मांग रहा है बंगाल

क्या चुनाव आयोग यहां भी सच्चाई और ईमानदारी से चुनाव कराने में सफल होगा?

-कोलकाता से लौटकर आलोक गोस्वामी

कोलकाता स्थित प्रदेश सरकार का मुख्यालय-राइटर्स बिल्डिंग

ऊपरी तौर पर बंगाल भारत के अन्य राज्यों जैसा ही शहरी और ग्रामीण भिन्नताओं वाला एक राज्य लगता है। अन्य राज्यों की तरह यहां भी शहरी आधुनिकता दिखती है तो ग्रामीण क्षेत्रों में धान के खेत, झोंपड़ीनुमा कच्चे घरों के समूह और दूर क्षितिज पर ढलती शाम के साथ बैलगाड़ियों की कतार। यहां भी गांवों के युवाओं में शहरी चकाचौंध के प्रति आकर्षण और उसे पाने के लिए शहर जाने की कसक है। पर कोलकाता के तो हाल देखकर एकबारगी दिल धक् से रह जाता है। जहां देखो भीड़ ही भीड़, गाड़ियों-ट्रामों का शोर, कान के पर्दे लगभग फाड़ देने वाले गाड़ियों के हार्न, लोग भागमभाग में एक-दूसरे से लगभग टकराते हुए, कोई हाथ-रिक्शा ट्राम की पटरी पर अड़ा है तो कहीं कोई टैक्सी चालक चौराहे पर पुलिस वाले से कहा-सुनी में लगा है। एक अजीब-सा नजारा, जहां न कोई कायदा-कानून दिखता है, न कोई व्यवस्थित जीवन की रीत-नीत। कहते हैं बंगाल रैलियों, हड़तालों, बंद और धरना-प्रदर्शन का प्रदेश है। गांव-देहात हो या कोलकाता शहर, लाल झंडा उठा नहीं कि सब जहां का तहां जाम। 30 साल के माक्र्सवादी शासन में शायद बंगाल ने यही अर्जित किया है।

हावड़ा स्टेशन पर उतरते ही इस कड़वी सच्चाई से सामना होता है। प्लेटफार्म से बाहर निकलने से पहले ही लम्बे-चौड़े स्टेशन के किसी कोने से “कोरतो हौबे- कोरतो हौबे” (करना पड़ेगा- करना पड़ेगा) का नारा सुनाई दिया। नजर दौड़ाई तो देखा स्टेशन के भीतर ही एक चौहद्दी बांधे करीब 15-30 लोग हाथ उठा-उठाकर नारे लगा रहे थे। एक दुकान वाले से पूछा तो बड़ी निश्चिंतता से उसने कहा- “क्या पता, ये तो रोज का तमाशा है। किसको, क्या “करना पड़ेगा”, यह कोई नहीं जानता?” हमें अनजान भांपकर उसने पूछा- “आप नए हैं यहां? चिंता न करें, यह नजारा रोज हर गली-नुक्कड़ पर दिखता है।”

बाहर आकर फिर वैसा ही अटपटा दृश्य दिखा। टैक्सी स्टैंड पर टैक्सी चालक यातायात पुलिस वालों से अपनी बारी को लेकर झगड़ रहे थे और मुंह फेरकर दो-चार भद्दी गालियां तक लगे हाथ दे डालते थे। जैसे-तैसे एक टैक्सी ठीक की और पहुंचे अपने अस्थायी डेरे पर।

हाथ-मुंह धोकर सोचा कि क्यों न आज से ही कोलकाता-दर्शन-संधान शुरू कर दें सो निकल पड़े हाथ में अपने यंत्र-तंत्र (कलम, कागज, टेप रिकार्डर) थामे। माणिकतल्ला से विवेकानंद मार्ग, धर्मतल्ला से पार्क सर्कस, विधान सरणी से महात्मा गांधी रोड, सियालदह से कालेज स्ट्रीट, कोलकाता की शक्लोसूरत में बिल्डिंगों को छोड़ दें तो सब एक जैसा दिखा। दौड़ते-भागते लोग और उनकी भागमभाग से होड़ लेता यातायात। तीखे हार्न और हाथ-रिक्शा की टन्टन्।

बंगाल, जिसने जन्म दिया विरले क्रांतिवीरों को, जिस धरती पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद की वाणी गूंजी, जहां राजा राम मोहन राय ने ब्राहृ समाज की नींव रखी। आज उस बंगाल की धरती पर सेकुलर और अभारतीय सोच के अवगाहक माक्र्सवादियों के राज को लगभग 30 साल हो गए हैं। 1977 तक वहां सिद्धार्थ शंकर रे के मुख्यमंत्रित्व में कांग्रेस की सरकार थी। सिद्धार्थ बाबू के कार्यकाल में ही बंगाल में “70 के दशक के पूर्वाद्र्ध में नक्सल विद्रोह का सूत्रपात हुआ था। नरसंहार के दौर चले, हिंसा चरम पर पहुंच गई। माओवादी हिंसक गुटों ने कानून-व्यवस्था की चूलें हिला दीं, बंगाल लगभग हिल गया था। ऐसे माहौल में माक्र्सवादी तत्व अपनी पैठ बढ़ाते गए और 1977 में स्थिति ऐसी बनी कि ज्योति बसु के नेतृत्व में बंगाल में कम्युनिस्टों का वाम मोर्चा सत्ता में आ गया। और उसके बाद से लगातार वाममोर्चा हर चुनाव में बहुमत हासिल करता रहा और शासन करता रहा।

क्या दिया इन 30 सालों में वाममोर्चे ने प. बंगाल को? मजदूर हितों के रक्षक होने का दावा करने वाले माक्र्सवादियों के राज में कितने हित सधे मजदूरों के? कितने उद्योग-धंधे नए बने, कितने कारखाने और मिलें स्थापित हुईं? कानून-व्यवस्था की क्या स्थिति है? भूखे को दो जून की रोटी मिल रही है या नहीं? गरीबी रेखा को कितनों ने पार किया? शासन में शुचिता और पारदर्शिता का कितना अंश बचा? कामकाजी लोगों की घर-गृहस्थी कितनी सुखमय है? विकास का कितना काम हुआ? खेत-खलिहानों की कितनी चिंता की गई? दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा जैसे 12 मास में 13 उत्सव-त्योहार मनाने वाले बंगला समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक- आर्थिक उन्नति ने कितने सोपान तय किए? टूटी पटरियों पर दौड़ती, उतरती ट्रामों और तपती धूप में ऊबड-खाबड़ सड़कों पर नंगे पैर हाथ से रिक्शा खींचते रोजी की आस में वर्षों से बंगाल को घर मानते आए रिक्शा वालों की गुजर-बसर कैसे होती है? अलीमुद्दीन स्ट्रीट से राइटर्स बिल्डिंग जाने वाली सड़क बस “वन वे” ही कैसे और क्यों कर बनी हुई है? वास्तव में माक्र्सवादी क्या इतने जनहित-रक्षक के रूप में देखे जाते हैं कि उनके सामने वाले को वोट ही नहीं मिलते या बात कुछ और है? 30 साल की काली रात की सुबह कब होगी? अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने हैं अत: चुनावों से ठीक पहले बंगाल का मन टटोलने और इन्हीं सब सवालों का जवाब तलाशने हम बंगाल पहुंचे थे। शुरुआत की राजधानी कोलकाता से।

य की दुकानों की बड़ी पूछ है कोलकाता में। हर दो कदम पर चाय की छोटी सी दुकान पर भांड (मिट्टी का छोटा सा कुल्हड़, जिसमें दो घूंट चाय आती है) में चाय की चुस्कियां लेते हुए चार-छह लोग जरूर दिख जाएंगे। एक जगह हम भी चाय के लिए रुके। भांड में चाय का आनंद ही अलग होता है। पास ही खड़े एक युवक से परिचय हुआ। 35 वर्षीय शांतनु राय नजदीक ही एक निजी कंपनी में लेखाकार था। हमने पूछा, “यहां इतनी अफरातफरी, हुल्लड़बाजी और बेतरतीबी का आलम क्यों है? कोई शिकायत क्यों नहीं करता? ट्रैफिक फंसा है और कहीं कोई पुलिस वाला नहीं दिखता?” शांतनु आवेश में बंगला में ही बोला, “एखाने सोब एरोकोमी चोले। केऊ कारो कोथा शोने ना। सरकार कोथाय आछे। सब तो कामरेड। कारो मुख खोलना जाए ना।” (यहां सब ऐसा ही चलता है। कोई किसी की नहीं सुनता। सरकार है कहां। सब तो कामरेड हैं। कोई मुंह नहीं खोल सकता।)

सब कामरेड हैं! यानी सब एक ही रंग में रंगे हैं। यानी कोई किसी से कुछ कह नहीं सकता! या कहना चाहता है, पर किसी भय से चुप रहने को मजबूर है। मुंह खोलना चाहता है, पर लाल झंडे पर बना हंसिया-हथौड़ा ध्यान कर मुंह बंद ही रखता है।

बंगाल के एक वरिष्ठ पत्रकार ने 19 जनवरी के अंग्रेजी दैनिक “द टेलीग्राफ” में एक आलेख में लिखा- “पिछली गिनती के अनुसार माकपा के 2.84 लाख पूर्णकालिक सदस्य थे। पार्टी के अनेक संगठन जनता के बीच काम करते हैं जिसमें सबसे बड़ा है कृषक सभा यानी किसान प्रकोष्ठ, जिसके पूरे बंगाल में 1.4 करोड़ सदस्य हैं। इससे जुड़े युवा एवं विद्यार्थी संगठनों की सदस्य संख्या एक करोड़ के करीब है। मजदूर संगठन “सीटू” के 29 लाख सदस्य हैं। माकपा की महिला शाखा गणतांत्रिक महिला समिति की 32.62 लाख सदस्य संख्या है। स्कूली शिक्षकों की यूनियनों में 2.3 लाख से ज्यादा सदस्य हैं। माकपा संगठन को राज्य सरकार का संपूर्ण संरक्षण प्राप्त है और यही वजह है कि पार्टी बंगालवासियों को अपने पाले में चाहे-अनचाहे खड़े होने को मजबूर कर देती है। गांवों में माकपा नेता और पंचायतों में शामिल उनके समर्थक ही हर बात का फैसला करते हैं। किसान गरीब हो या प्रभावशाली, कृषक सभा के बिना कुछ नहीं कर सकता।”

टेलीग्राफ आगे लिखता है- “आज वाम संगठन अन्य निहित स्वार्थ के लिए दबाव समूह के रूप में काम करने वाले किन्हीं अन्य गुटों जैसे ही दिखते हैं। पर सवाल उठता है कि अगर लोग माकपा से इतने नाराज हैं तो क्या कारण है कि इसकी सदस्य संख्या बढ़ती जाती है। जवाब सीधा सा है- लोग उन्हें (कामरेडों को) चाहें या न चाहें, उनके बिना गुजारा नहीं है। … लोग नाराज हैं और अगर उनकी यह नाराजगी तीव्र आक्रोश में बदल गई तो माकपा साफ हो जाएगी।”

गुजारा नहीं है का अर्थ क्या? कोलकाता पुलिस में कांस्टेबल रहे अभिजीत दत्ता मिल गए। पहले तो इधर-उधर करते रहे, फिर बताने लगे- “क्या करेगा पुलिस वाला। नहीं मानेगा उन्हें तो भुगतेगा। जितना (वेतन) मिलता है उतना ही मिलता रहेगा, बढ़ेगा नहीं। एकठो प्रमोशन भी होने नहीं सकेगा। क्या करेगा? डाल देगा किसी जंगल में जहां कोई पानी नहीं पूछेगा। क्या कोई ऐसा होने देगा। की बोलबो तूमी दादा। मुंह पर अंगुली रखकर बस काम करो।” अभिजीत दत्ता ने कामरेड तंत्र की एक छोटी से झलक से परिचित कराया था। ध्यान आया कि अभी कुछ दिन पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बाबू ने कोलकाता में गैर राजपत्रित पुलिसकर्मियों की एक सभा में उनको धन्यवाद देते हुए कहा था- “आपने हमारा बहुत सहयोग किया। आगे भी आप इसी तरह मदद करें तो हम (चुनाव में) जरूर सफल होंगे।” एक मशहूर बंगला दैनिक में काम कर चुके और अब जल्दी ही शुरू होने जा रहे बांग्ला समाचार चैनल से जुड़े युवा पत्रकार तीर्थों भट्टाचार्य प्रशासन के इस राजनीतिकरण को एक पुरानी कहानी बताते हैं। यह तो कब से हो रहा है और अब तो हालत यह हो गई है कि शायद ही कोई सरकारी महकमा हो जहां लगभग पूरा कार्यालय लाल प्रभाव में न हो। उसकी वह बात सुनकर हाल ही में दिल्ली में एक संगोष्ठी में विधायक और बंगाल विधान परिषद के उपाध्यक्ष दीपक घोष से हुई मुलाकात ध्यान आ गई। श्री घोष ने बहुत पीड़ा भरे स्वर में कहा था- “किसको अपना दर्द सुनाएं। वरिष्ठ नौकरशाह माक्र्सवादी नेताओं के हुक्म बजाने को मजबूर हैं। कोई बोलने की हिम्मत करता है तो उसको गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। माकपा को वोट न देने की सजा में हाथ काट दिए जाते हैं। आतंक बरपाया हुआ है माकपा ने। चुनाव पर्यवेक्षक राव आए थे। कुछ उम्मीद जगी है। अब तो चुनाव आयोग का ही आसरा है कि धांधली के बिना इलैक्शन कराए।” दीपक घोष तो तृणमूल कांग्रेस के विधायक हैं। लेकिन ये बातें तो आज बंगाल से किसी भी तरह जुड़ा हर व्यक्ति बोल रहा है। बेशक, कुछ तो दबी जुबान में। राजनीतिक हत्याएं, हफ्ता वसूली और मुंह सिले रखने की “हिदायत”। बस लोग सह रहे हैं और जी रहे हैं। शांतनु ने भी बड़ी वेदनापूर्ण आवाज में कहा था- “आपके नेशनल मीडिया को बंगाल में ये सब गड़बड़ी क्यों नहीं दिखती?” कुछ को दिखती है पर सभी को नहीं दिखती। कोई इने-गिने हैं उदयन जैसे। द पायनियर के वरिष्ठ पत्रकार उदय नम्बूदिरी ने तो बंगाल में व्याप्त कुशासन का तथ्यात्मक विश्लेषण अपनी नयी पुस्तक “बंगाल्स नाइट विदाउट एण्ड” में किया है।

गली के उस पार सूरज ढलता जा रहा था। हावड़ा पुल को शाम के समय दूर से निहारना बड़ा रोमांचक होता है। हावड़ा पुल की अफरातफरी देखते-देखते सोचा कि क्यों न इस कम्युनिस्ट शासन से ठीक पहले जिनका शासन था उन सिद्धार्थ शंकर रे से मिला जाए और उनसे ही बंगाल की आज की स्थिति पूछी जाए। तुरंत एम.जी. रोड के मुहाने पर मौजूद एस.टी.डी./पी.सी.ओ. से उन्हें फोन मिलाया। परिचय दिया। पहले तो उन्होंने कहा कि “अब मैं सक्रिय राजनीति से दूर हूं। भई, मुझसे क्या बात करोगे।” फिर हमारी उत्कंठा भांपकर बोले, “ठीक है, कल शाम चले आइए। घर तो मालूम है न? वो भवानीपुर पुलिस चौकी के सामने गली में।” हमने कहा, “जी, हम कल मिल रहे हैं।” अगले दिन यहां शाम के ठीक 6 बजे और वहां हम लाल चारदीवारी से घिरे सिद्धार्थ बाबू के बंगले 3, बेलतला रोड के भीतर। उनसे लंबी बातचीत हुई। आज की हालत बताते-बताते वे पुराने दिनों की ओर भी लौट गए जब कम्युनिस्टों ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोल रखा था। उनसे हुई वार्ता के संपादित अंश पृष्ठ 5 पर दिए जा रहे हैं। चलने से पहले सिद्धार्थ बाबू ने घर के बने समौसे और नाड़ू (नारियल और खजूर के गुड़ का बना मीठा पकवान, शक्ल में हमारे मथुरा के पेड़े जैसा) आग्रहपूर्वक खिलाये।

कोलकाता में हम कई अन्य लोगों से मिले और बंगाल के वर्तमान हालात पर चर्चा की। दक्षिणेश्वर से बेलूर तक, हुगली के उस पार भी गए। उस सबके बारे में अगली बार।

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