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– राजेन्द्र निशेश
अपनी ही
परछाईं के पीछे भागता आदमी
तृष्णाओं की अंधी गली में
भटक जाता है अक्सर।
मरीचिकाओं का छलावा
सम्मोहन की जादुई छड़ी लिए
उसे अपनी उंगलियों पर
नचाता रहता है
उम्र भर।
सपनों के सौदागर पर
नींद में भी जागते हुए
आकांक्षाओं की बेड़ियां पहने
कभी गहरे में उतरते हैं
और कभी
आसमान में उड़ते हैं
कामनाओं की महायात्रा को
गति प्रदान करते हुए।
अविराम अपनी ही
परछाईं के पीछे भागना
आदमी की नियति है
शायद!
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