| दिंनाक: 06 Dec 2005 00:00:00 |
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अपनी बातप्रिय बन्धुओ,सप्रेम जय श्रीराम।प्रेम अधिकांशत: एकतरफा होता है और प्रत्यक्षत: बदले में दु:ख, पीड़ा, वेदना और मरणान्तक व्यथा मिलती है। आप कहेंगे मैं पुरानी फिल्मों का घिसा-पिटा संवाद लिख रहा हूं। … पर बात हिमालय की है। हिमालय आखिरकार चट्टानों, पत्थरों, जलधाराओं, जंगलों और रेत तथा बर्फ के अनन्त भण्डार का आगार है। फिर भी ऐसे लोगों की संख्या अनन्त होगी जो हिमालय से प्रेम करते हैं। उन्हें बदले में क्या मिलता है? जब वे हिमालय जाते हैं तो कष्ट ही होता है। यही प्रश्न अर्जुन ने स्वर्गारोहण के समय युधिष्ठिर से किया था और पूछा था कि आखिरकार इन पत्थरों में घूमकर आपको मिला क्या? आप क्यों हिमालय से इतना प्रेम करते हैं? युधिष्ठिर बोले, “मैं हिमालय से इसलिए प्रेम नहीं करता क्योंकि मुझे उससे कुछ प्राप्त होता है या होने की आशा होती है। यह जैसा है वैसा ही मुझे प्रिय है।”कुछ ऐसा ही हमें पिछले दिनों लगा जब गंगोत्री और गोमुख की यात्रा पर गए। घुमावदार चढ़ाई वाले रास्ते। उत्तरकाशी के आगे न तो मोबाइल चलता है और न सामान्यत: फोन मिलते हैं। गंगोत्री पहुंचने तक तो आदमी लस्त-पस्त हो जाता है। वहां न बिजली है, न मोबाइल और न आपातकालीन फोन सुविधा। आम आदमी के लिए कोई धर्मशाला तक नहीं है। होटल वाले जी-भर कर कमाते हैं, मनमाना वसूलते हैं। फिर भी सैकड़ों वर्षों से, जब इतनी सड़क भी नहीं थी जो आज है, हजारों-लाखों यात्री बिना किसी शिकायत के आते हैं। और आनन्द मग्न होकर जाते हैं। भगवती भागीरथी की जो अपूर्व सौन्दर्य सृष्टि यहां देखने को मिलती है वह अनुपम है। हम तो सिरफिरे घुमक्कड़ ठहरे। लगे हाथ अगले दिन गोमुख के दर्शन भी कर आए। जैसा कदाचित कैलास मानसरोवर के बारे में कहा जाता है, व्यक्ति को जीवन में एक बार तो यहां की यात्रा जरूर करनी चाहिए। दुसाध्य है, सामान्य यात्री की सांस फूलती है। पर करणीय है। मार्ग में प्राकृतिक सौन्दर्य का दर्शन और आनन्द वही ले सकता है जिसका स्वास्थ्य ठीक हो, वरना तो हाय-हाय करते ही यात्रा होती है। गोमुख हिमनद पर पहुंचकर थकान दूर होती है यह बात गारंटी के साथ कही जा सकती है। वहां भगवान शिव की विश्वव्यापी सत्ता का अहसास होता है। अपुन ने सब पुरखो, मित्रों-बांधवों का स्मरण करते हुए डुबकी भी लगाई। जल भरा। और लौटे तो चित्त में अनोखा आनन्द व्याप्त था। सच ही कहा है, यदि कोई ऐसी स्थिति प्राप्त हो सके कि न तो कोई अपना पता हो, न गन्तव्य, न मार्ग की प्रतीक्षा हो, न कहीं पहुंचने की उत्कण्ठा, न मन में प्रश्न उठे, न समाधान की इच्छा जगे, न मोबाइल पर किसी से बात करने का मन हो, न किसी का फोन सुनने की चाह बचे-यही तो उस सिरजनहार की सत्ता से लय होने वाली स्थिति है। पर अपुन तो उससे कोसों दूर ही रहे। नहा-धोकर भी।शेष अगली बारआपका अपनात. वि.NEWS