| दिंनाक: 02 Jun 2005 00:00:00 |
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हर पखवाड़े स्त्रियों का अपना स्तम्भ”स्त्री” स्तम्भ के लिए सामग्री, टिप्पणियां इस पते पर भेजें-“स्त्री” स्तम्भद्वारा, सम्पादक, पाञ्चजन्य, संस्कृति भवन, देशबन्धु गुप्ता मार्ग, झण्डेवाला, नई दिल्ली-55अपनी सासू मां श्रीमती सरोजनी केसाथ श्रीमती मंजुश्री येवतीकरमेरी सास, मेरी मां, मेरी बहू, मेरी बेटीजब भी सासबहू की चर्चा होती है तो लगता है इन सम्बंधों में सिर्फ 36 का आंकड़ा है। सास द्वारा बहू को सताने, उसे दहेज के लिए जला डालने के प्रसंग एक टीस पैदा करते हैं। लेकिन सास-बहू सम्बंधों का एक यही पहलू नहीं है। हमारे बीच में ही ऐसी सासें भी हैं, जिन्होंने अपनी बहू को मां से भी बढ़कर स्नेह दिया, उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। और फिर पराये घर से आयी बेटी ने भी उनके लाड़-दुलार को आंचल में समेट सास को अपनी मां से बढ़कर मान दिया। क्या आपकी सास ऐसी ही ममतामयी हैं? क्या आपकी बहू सचमुच आपकी आंख का तारा है? पारिवारिक जीवन मूल्यों के ऐसे अनूठे उदाहरण प्रस्तुत करने वाले प्रसंग हमें 250 शब्दों में लिख भेजिए। अपना नाम और पता स्पष्ट शब्दों में लिखें। साथ में चित्र भी भेजें। प्रकाशनार्थ चुने गए श्रेष्ठ प्रसंग के लिए 200 रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा।वे हैं न!मेरी शादी सन् 1983 के मई माह में हुई। शादी के दो माह पश्चात् श्वसुर जी का निधन हुआ। 22 साल हो गए, अपनी सासू मां का सदा साथ मिला है। शादी के बाद शुरू-शुरू में मुझे उनसे काफी डर लगता था, लेकिन श्वसुर जी की बीमारी हमें पास ले आई। आरम्भ में किसी न किसी बहाने मैं मायके चली जाती थी। परन्तु जैसे-जैसे समय बीता, मेरा मायके जाना कम हुआ।हमारे बीच हर विषय पर खुलकर चर्चा होती है। उससे आपसी प्रेम बढ़ा और हम एक-दूसरे को समझने लगीं। विवाह के एक वर्ष बाद मेरे पुत्र आश्विन का जन्म हुआ। तब अहसास हुआ कि घर में बुजुर्गों का होना, विशेषकर सासूजी का होना कितना महत्वपूर्ण तथा आवश्यक है। बच्चा बड़ा हुआ, स्कूल जाने लगा। कई बार मेरी सासूजी उसे स्कूल छोड़ने और लेने जाती थीं। कभी मुझे और मेरे पति को शादी, किसी समारोह या काम से बाहर जाना पड़ता है तो हमें घर की चिंता नहीं रहती। उनके कारण निÏश्चतता रहती है।ऐसा नहीं कि हममें कभी नोंक-झोंक नहीं हुई। किसी गलती पर सासूजी टोक देती थीं तो मन को अच्छा नहीं लगता था। लेकिन सोचने पर लगता कि, अगर वे नहीं टोकतीं तो मुझसे गलती हो ही जाती। धीरे-धीरे उनके टोकने पर बुरा लगना कम होता गया। मैंने कभी अपनी सासूजी को पलट कर जवाब नहीं दिया था। आज मैं अपने पुत्र पर देखती हूं तो लगता है कि हमारे आपसी व्यवहार को देखकर ही अच्छे संस्कार उसे मिले हुए हैं। बुजुर्गों के साथ हमारे व्यवहार का आईना होता है बच्चों का हमारे साथ व्यवहार। इसीलिए मुझे लगता है कि कभी-कभार की नोंक-झोंक के बावजूद सास-बहू के बीच अच्छे संबंधों से पारिवारिक वातावरण सौहार्दपूर्ण रहता है। आज मेरी मां कभी-कभार हंसी-मजाक में मुझसे पूछती हैं कि क्या तुम्हें मेरी याद नहीं आती? सासूजी की तरफ देखकर मैं कहती हूं कि आती क्यों नहीं, पर यहां मेरी एक और मां भी हैं।मंजुश्री येवतीकर136-बी, राजेन्द्र नगर, इन्दौर (मध्य प्रदेश)NEWS