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जिनके नाम पर भारतीय मजदूर संघ ने 28 अगस्त पर्यावरण दिवस घोषित किया

Written byArchiveArchive
Apr 9, 2005, 12:00 am IST
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दिंनाक: 09 Apr 2005 00:00:00

वीरांगना अमृता देवीशीश दिया, पर वृक्ष नहींवैश्विक स्तर पर 5 जून को “पर्यावरण दिवस” मनाने की रस्म अदायगी की जाती है। वैसे ही जैसे मजदूर दिवस, बाल दिवस, महिला दिवस, विकलांग दिवस… और भी न जाने कितने दिवस मनाए जाते हैं। परन्तु पर्यावरण दिवस इन सबसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इसीलिए भारतीय मजदूर संघ ने ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए तय किया है कि भारत में 28 अगस्त पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाए। यह केवल सांकेतिक या रस्म अदायगी भर न हो, बल्कि एक पौधे का रोपण कर वास्तव में पर्यावरण की रक्षा के लिए कार्य करें। 28 अगस्त इसलिए क्योंकि 275 वर्ष पूर्व इसी दिन चिपको आन्दोलन की जननी वीरांगना अमृता देवी ने शीश कटाकर वृक्ष की रक्षा की थी। उनके साथ 363 लोगों ने भी बलिदान दिया था, इनमें 294 पुरुष व 69 स्त्रियां थीं। इस वर्ष पर्यावरण दिवस पर वीरांगना अमृता देवी का स्मरण करते हुए भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री राम प्रकाश मिश्र ने जो आलेख लिखा, उसके सम्पादित अंश यहां प्रस्तुत हैं।रामप्रकाश मिश्रराष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भारतीय मजदूर संघकवि जिस माटी के गुण गाते थकते नहीं थे, आज वही माटी थक चली है। सुजला नदियों का जल अब प्रदूषित हो गया है। सुफला व शस्य श्यामला धरती ट्रेक्टर की जुताई, कीटनाशक दवाइयों के कारण बंजर हो रही है। रही-सही कमी रसायनिक खाद ने पूरी कर दी है। भूमि और वनों की रक्षा के लिए हुआ चिपको आंदोलन यदा-कदा, यत्र-तत्र दिखाई दे रहा है। भीमसागर जैसे आंदोलन यह बता रहे हैं कि पर्यावरण की समस्या का हल तकनीक या बेहतर प्रबंध में नहीं, अपितु अपनी पुरानी परम्पराओं में है।आज प्राय: किसी न किसी क्षेत्र में अकाल पड़ता है। अकाल से भी भयंकर है अकेले पड़ जाना। समाज में संकट के समय एक-दूसरे को सहयोग देने की परम्पराएं हमारे पूर्वजों ने बनायीं थीं, वह धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं। संवेदना की जिस पूंजी के सहारे समाज बड़े-बड़े संकट झेल लेता था, क्या उस पूंजी को हम बचा पाएंगे? खेत की जमीन, चारागाह की जमीन तथा जंगल की जमीन की बहुत उपेक्षा हुई है। जहां जंगल धरती पर कम से कम 30 प्रतिशत होना चाहिए, वहीं वह घटकर अब केवल 10 प्रतिशत रह गया है।हम पर्यावरण असंतुलन की भयंकर चपेट में हैं। क्या इस कलुषित चपेट से हम अपने को बचा पाएंगे? धरती का मिजाज जब तक सामान्य है तभी तक हम सुरक्षित हैं। सुरक्षा केवल मानव के लिए ही नहीं अपितु पशु, पक्षी, वनस्पति आदि की भी सुरक्षा। यदि धरती का मिजाज एकाएक गरम हो गया तो क्या ये सब सुरक्षित रह पाएंगे? इसलिए इस समया पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।वायुमण्डल में गैस के जमाव का विधिवत अध्ययन वर्ष 1959 में प्रारम्भ हुआ और यह कार्य वर्ष 1988 में पूरा हुआ। अमरीकी अनुसंधान संस्थान नासा ने विगत 100 वर्षों के तापमान का अध्ययन किया है। इससे पता चला कि पृथ्वी का औसतन तापमान 0.6 से 1.2 डिग्री सेन्टीग्रेड बढ़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि लगभग एक खरब टन कार्बन डाईआक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में पहुंच रही है। भारत में यह मात्रा 47.6 करोड़ टन है। इस सृष्टि के संचालन में कार्बन डाईआक्साइड के अलावा मिथेन और कार्बन मोनोआक्साइड आदि गैसें भी हानिकारक हैं।पहले प्राकृतिक सम्पदा का संचालन समाज नियंत्रक प्रक्रिया से होता था। अब प्रकृति की सम्पदा को राज्य की सम्पत्ति में बदल दिए जाने की नीति ने इसे प्रशासनिक नियंत्रण के घेरे में ला दिया है। यही कारण है पर्यावरणीय समस्या उत्पन्न होने का। अगर पर्यावरण ठीक रखना है तो शहरों और गांवों के विकास का कोई और तरीका ढूंढना होगा। परस्पर सहजीवन के आधार पर शहरी और ग्रामीण विकास करना होगा। पर्यावरण में सुधार के लिए जहां अनेक उपाय हैं, वहीं पेड़-पौधे इसे सुरक्षित रखने में सहायक होंगे। इसके लिए ग्रामीण और शहरी जनता, सामाजिक संस्थाएं, श्रम संगठन एवं गैर-सरकारी संगठनों को आगे आना होगा। यद्यपि पूरे विश्व में 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन वृक्षारोपण करना एक पुनीत कार्य समझा जाता है। इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि बिगड़े पर्यावरण को ठीक करने में वृक्षों की बहुत बड़ी भूमिका है। वृक्ष विषैली गैस कार्बन डाईआक्साइड को पीकर हमें आक्सीजन देते हैं। इसलिए वृक्ष को “शंकर” कहा जाता है।कविवर रवीन्द्र नाथ ठाकुर हर वर्ष श्रावण मास की 22 तारीख को शान्ति निकेतन में एक बड़ा समारोह करते थे। फूलों से सजी पालकी में एक छोटे से पौधे (बाल तरु) को रखकर बड़ी धूमधाम से लाया जाता था। उसे प्रेमपूर्वक किसी स्थान पर रोपा जाता था। बाबा आमटे चन्द्रपुर से बरोरा तक 41 किलोमीटर की पैदल यात्रा करके सामूहिक रूप सेवृक्षारोपण करते थे। धीरे-धीरे वृक्षारोपण का महत्व जनता की समझ में आ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने एक निर्णय में वृक्षों की कटाई पर सख्त प्रतिबन्ध लगा दिया है। वृक्षारोपण की दृष्टि से अशोक भगत ने लोहरदगा विशनपुर (झारखण्ड) क्षेत्र में एक लाख वृक्षों का रोपण किया है। उन्हें वर्ष 1993 में राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया। नौरोबी की बांगरी मथाई ने ग्रीन बेल्ट मूवमेंट चलाया है और अब तक 3 करोड़ वृक्षारोपण कर चुकी हैं। उन्हें नोबुल शांति पुरस्कार 2004 दिए जाने की घोषणा हुई है। नौरोबी में 11 अक्तूबर, 2004 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित पर्यावरण सम्मेलन में वर्ष 1979 से चिपको आंदोलन से जुड़ी उत्तराञ्चल की बाली देवी ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उत्तराञ्चल में सुन्दरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन के जनक माने जाते हैं। उन्होंने पेड़ों से चिपक कर उनकी कटाई रुकवाई। यह बात ध्यान देने योग्य है कि वृक्षारोपण के साथ वृक्षों की कटाई रोकना भी आवश्यक है। बिना इसके वृक्षारोपण व्यर्थ ही सिद्ध होगा। दु:ख इस बात का है कि चिपको आंदोलन के जनक सुन्दरलाल बहुगुणा को सभी जानते हैं किन्तु जननी तो इतिहास के गर्भ में समा गई है। इतिहास पलटें तो एक बहुत बड़ी हृदय-विदारक घटना चिपको आन्दोलन की जननी अमृता देवी की मिलेगी।जोधपुर (राजस्थान) के राजस्व विभाग के अभिलेखों से पता चलता है कि एक बार जोधपुर रियासत के महाराजा को महल की मरम्मत हेतु लकड़ी की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने अपने कारिन्दों को आदेश दिया कि वे जोधपुर से 25 किलोमीटर दूर खेजड़ली गांव में खेजड़ी के जंगल से पेड़ों की कटाई करके लकड़ी की व्यवस्था करें। महाराजा के हुक्म का पालन करने कि लिए कुछ सिपाही मजदूरों के साथ कुल्हाड़ी लेकर उस गांव में पहुंचे, जहां खेजड़ी का विशाल घना जंगल है। वहां पेड़ों की कटाई शुरू हुई ही थी कि गांव के लोग इकट्ठा हो गए और वृक्षों को काटने का विरोध किया। किन्तु उनका विरोध मात्र मौखिक विरोध था। किसी में साहस नहीं था कि आगे बढ़कर समूह का नेतृत्व करें। अमृता देवी, जो घर में चक्की पीस रही थी, को जब पेड़ों की कटाई की खबर मिली तो उसने पेड़ काटने वालों को ललकारा और कहा कि हम प्राण देकर वृक्षों की कटाई रुकवाएंगे। उसने आगे कहा कि “जो सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जांण”। इतना कहकर वह पेड़ से चिपक गई। सिपाहियों ने राजाज्ञा उल्लंघन की दुहाई देते हुए उसका सर काट दिया। मां का अनुसरण करते हुए उसकी दो बेटियों ने भी पेड़ से चिपक कर अपना शीश कटवाया। अब क्या था, ग्रामीण लोग एक-एक पेड़ से चिपक गए। सिपाहियों के आदेश से मजदूरों ने पेड़ से चिपके लोगों को एक-एक करके काटना शुरू किया। अंतिम बलिदान मुकलावा ने अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ दिया। यह घटना 28 अगस्त, 1730 (भाद्रपद शुक्ल 10, सम्वत् 1787) की है। महाराजा जोधपुर को जब इस हृदय-विदारक घटना की जानकारी मिली तो वे घटनास्थल पर आए और जनता से क्षमा मांगते हुए पेड़ों की कटाई रोक दी। और घोषणा की कि अब भविष्य में इस क्षेत्र के जंगलों में कोई हरा पेड़ नहीं काटेगा। वह राजाज्ञा आज भी ज्यों की त्यों लागू है।पर्यावरण प्रदूषण रूपी जिस दानव से आज समूची मानव सभ्यता भयभीत है उसका आभास महान वीरांगना अमृता देवी को आज से 275 वर्ष पहले ही हो गया था। अमृता देवी एवं उनके गांव के साथियों का वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान देना पूरे विश्व के लिए प्रेरणा स्रोत एवं ज्योति पुञ्ज बन गया है। खेजड़ली गांव में उन अमर बलिदानियों का स्मारक बना है। बलिदान स्थल पर प्रतिवर्ष “वृक्ष शहीद मेला” लगता है। राजस्थान के अतिरिक्त गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के हजारों श्रद्धालु यहां इकट्ठा होते हैं और अमर शहीदों को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। 1997 से राज्य सरकार द्वारा घोषित अमृता देवी पुरस्कार प्रतिवर्ष अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने वालों को दिया जाता है। जयपुर स्थित विश्व वानकी उद्यान के निकट झालना क्षेत्र में वीरांगना अमृता देवी की स्मृति में राज्य सरकार द्वारा अमृता देवी उद्यान की स्थापना कर उनकी 275वीं पुण्य तिथि पर जन उपयोग के लिए अर्पित किया गया है। 35 हेक्टेयर में फैले इस वृक्ष उद्यान में दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधे भू-क्षरण को रोकते हैं। अमृता देवी बलिदान दिवस 28 अगस्त को भारत में पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। इस दिन अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना ही अमर बलिदानी वीरांगना अमृता देवी सहित 363 शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धाञ्जलि होगी।NEWS

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