| दिंनाक: 07 Mar 2005 00:00:00 |
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सूखती धरती पंजाब कीराकेश सैनकल-कल बहती पांच नदियों के नाम पर “पंज-आब” यानी “पंजाब” का नामकरण हुआ था, पर पंजाब की धरती अब तेजी से पानी से रिक्त होती जा रही है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर पूरे उत्तर भारत में पानी का इसी तरह दोहन होता रहा तो आने वाले दो-तीन दशकों में देश का अन्न भण्डार कहे जाने वाले उत्तर भारत के क्षेत्र मरुस्थल बन जाएंगे। केन्द्रीय भू-जल बोर्ड द्वारा मानसून से पहले कराए गए सर्वेक्षण में काफी भयावह तथ्य सामने आए हैं। देश के 590 जिलों में से 250 जिलों में भू-जल स्तर तेजी से गिर रहा है। इनमें पंजाब के 15 जिले- अमृतसर, भटिंडा, फरीदकोट, फिरोजपुर, गुरुदासपुर, जालंधर, लुधियाना, मोेगा, पटियाला, होशियारपुर,कपूरथला, मानसा, नवांशहर, रोपड़ और संगरूर शामिल हैं। हरियाणा के 16 जिले-अंबाला, भिवानी, फतेहाबाद, गुड़गांव, हिसार, झज्जर, जींद, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, महेंन्द्रगढ़, पानीपत, रिवाड़ी, रोहतक, सिरसा और सोनीपत तथा हिमाचल प्रदेश के छह जिले- कांगड़ा, कुल्लु, मंडी, सिरमौर, सोलन तथा उना शामिल हैं। 1995 से 2004 तक के आंकड़े बताते हैं कि इन जिलों में प्रतिवर्ष 20 सेंटीमीटर पानी नीचे उतर रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि पानी के मामले में संवेदनशील होते इस इलाके में पंजाब का दोआबा क्षेत्र भी शामिल है, जहां वर्षा का अनुपात अधिक माना जाता है। राज्य में धान उत्पादन वाले जिलों-मोगा, भटिंडा, मानसा, फिरोजपुर शामिल हैं, को अतिसंवेदनशील वर्ग में शामिल किया गया है। पिछले 35 सालों के वर्षा के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह तथ्य सामने आता है कि मानसून भी पंजाब से रूठता जा रहा है। फिरोजपुर, भटिंडा, मोगा, संगरूर जिलों में भी वर्षा के घनत्व में कमी आई है, जबकि मुक्तसर, मानसा में बरसात का घनत्व कुछ सुधरा है। 1970 में पूरे राज्य में 672.30 मिली मीटर औसतन बरसात हुई जो 2003 आते-आते मात्र 459.05 मिली मीटर रह गई। इतना ही नहीं, राज्य में बरसात का मौसम भी सिकुड़ा है।राज्य में गिरते भू-जल स्तर के लिए कृषि में आई क्रान्ति व अंधाधुंध मशीनीकरण कम जिम्मेदार नहीं हैं। मशीनीकरण के चलते किसान अब अप्रैल महीने में ही गेहूं की फसल काट लेते हैं और तत्काल धान (चावल) की बुआई कर देते हैं। साठ दिनों में तैयार होने वाली यह फसल जून के अंत में काट ली जाती है और किसान धान की दूसरी बुआई भी साथ-साथ ही कर देते हैं। अर्थात् राज्य में अब एक साल में तीन फसलें (एक गेहंू व दो धान) लेने का प्रचलन बढ़ रहा है। पहले जब हाथों से गेहूं काटी जाती थी तो मई के अंत तक बुआई शुरू करने में ही एक महीना लग जाता था। मुख्य बात यह है कि गेहूं के तुरन्त बाद ली जाने वाली धान की फसल मई तथा जून के महीनों में खेतों में खड़ी रहती है। इन दो महीनों में गर्मी चरम सीमा पर होती है अत: फसल झुलस जाती है। किसान नलकूप चला कर पानी की कमी को पूरा करते हैं। इस प्रकार जमीन के पानी के अंधाधुंध हो रहे दोहन से साल-दर-साल स्थिति बद से बदतर हो रही है। राज्य में चल रही किसान राजनीति के चलते कोई भी सरकार किसानों से सख्ती बरतने को तैयार नहीं है, जिसके चलते “बिन पानी सब सून” की स्थिति पैदा हो रही है।राकेश सैनNEWS