| दिंनाक: 07 Mar 2005 00:00:00 |
|
पूर्वोत्तरराजनेताओं से भरोसा हटाअसम गण परिषद् के अध्यक्ष वृंदावन गोस्वामी हों या प्रख्यात गायक भूपेन हजारिका या फिर मेघालय के मुख्यमंत्री डी.डी. लापांग हों अथवा प्रतिष्ठित हांडीक कालेज, गुवाहाटी की प्रवक्ता श्रुतिमाला; इन सभी में एक बात समान है। ये सभी लोग इस एक बात पर एकमत हैं कि आज देश के राजनीतिक क्षेत्र में तेजी से गिरावट हो रही है। ऐसा कोई नेता नहीं है जो युवकों में प्रेरणा जगाने के काबिल हो। इनके अनुसार राजनीति का यह भद्दा रूप अवसरवादी राजनीतिज्ञों की बहुलता के कारण विकसित हुआ है। आज राजनीति का अर्थ सिर्फ चुनाव रह गया है, जिसमें विचारधारा का कोई स्थान नहीं है। इसी सोच ने राजनीतिक क्षेत्र में मूल्यविहीनता को उत्पन्न किया है। श्रुतिमाला इस संदर्भ में कहती हैं, “भारत की राजनीति में महात्मा गांधी अवश्य मूल्यों के पक्षधर थे, लेकिन उनके नेतृत्व के अतिरिक्त कांग्रेस में अन्य नेता, विशेषत: नेहरू जैसे लोग सत्ता की खातिर देश विभाजन तक के लिए सहमत हुए। जबकि गांधी जी ने विभाजन के पूर्व और बाद में भी भारत के बंटवारे को अपनी स्वीकृति नहीं दी थी। गांधी ही थे जिन्होंने चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन तत्काल वापस ले लिया क्योंकि अहिंसा उनका जीवन मूल्य था, जिसे वे हर कीमत पर बनाए रखना चाहते थे।असम की धरती के प्रख्यात गायक व संगीत निर्देशक भूपेन हजारिका का भी कुछ ऐसा ही मानना है। वह 2004 के लोकसभा चुनावों में राजनीति के मैदान में उतरने को अपनी एक भूल मानते हैं। वे कहते हैं, “आश्चर्य है कि लालू प्रसाद और तस्लीमुद्दीन जैसे नेता आपराधिक मामलों में लिप्त होते हुए भी राजनीति में कैसे सफल हैं? यह व्यवस्था की खामी है और इसी अवरोध के कारण शिक्षित युवा आज राजनीति से दूर हो रहे हैं। हजारिका वंशवाद को भी लोकतंत्र के लिए किसी रूप में अच्छा नहीं मानते।उधर असम गण परिषद् के अध्यक्ष वृंदावन गोस्वामी एक सक्रिय राजनेता होते हुए भी इस बात से सहमत दिखे कि आम जनता का राजनीतिज्ञों से भरोसा हटता जा रहा है। उनके अनुसार, “राजनीति आज चुनावी गणित बनकर रह गई है। यह चुनावी गणित ही आज राजनीति और भावी शासकीय नीतियों पर हावी होता जा रहा है। गोस्वामी इस बात पर अफसोस जाहिर करते हैं कि आजादी के सत्तावन वर्ष बीतने के बाद भी देश बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक जैसे मुद्दों से ऊपर नहीं उठ पाया है। देश की 50 प्रतिशत जनता आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है। लेकिन किसे चिंता है इनकी? हम जाति व्यवस्था के खात्मे के लिए कुछ भी न कर सके, पिछड़ों को उनकी सामाजिक, आर्थिक समस्याओं के प्रति हम जागृत नहीं कर सके। वैसे गोस्वामी स्वयं वर्तमान समस्याओं के लिए कोई समाधान नहीं बता सके सिवाय इसके कि नैतिकता को राजनीति में पुनस्स्थापित किया जाए। मेघालय के मुख्यमंत्री डी.डी.लापांग का कहना है कि यह कांग्रेस ही है जिसने आज भी गांधी जी की परंपरा को जीवित रखा है और इस विपरीत समय में भी कम मात्रा में सही, मूल्यों की राजनीति तो कर रही है। लापांग के अनुसार, “यह कांग्रेस की सेकुलर विचारधारा ही है जिसके कारण देश आज भी एक बना हुआ है।”चाहे भूपेन हजारिका हों या वृदावन गोस्वामी, सभी इस बात के समर्थक हैं कि साफ सुथरी छवि वाले लोग राजनीति में आगे आने चाहिए। फिर चाहे वे चिकित्सक हों, इंजीनियर, संगीतज्ञ या किसी अन्य क्षेत्र में काम करने वाले। आज जरूरत इस बात की है देश के युवा राजनीति की कमान उसी प्रकार अपने हाथों में लें जिस प्रकार वह अन्य क्षेत्रों में आगे आ रहे हैं।गुवाहाटी से विशेष संवाददाताNEWS