| दिंनाक: 01 Feb 2005 00:00:00 |
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प्रभु की प्राप्ति आलीशान मंदिर बनवाने से नहीं,जन-जन की सेवा से होगीस्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज लीक से हटकर सोचते हैं और समाज के लिए कुछ करने वाले संन्यासी के रूप में प्रसिद्ध हैं। वे हिन्दू समाज को कुरीतियों और रूढ़ियों से मुक्त करने के पक्षधर हैं और उनका मानना है कि संकीर्णताओं से ऊपर उठकर ही हम धर्म की रक्षा कर सकते हैं। जैसे, यदि समुद्र पार करना पाप था तो हिन्दू हनुमान जी एवं राम जी की पूजा क्यों करते हैं? इसी प्रकार पूज्य शंकराचार्य जी की गिरफ्तारी के मामले में भी बहुत उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं। वे हमारे परम पूजनीय सन्त हैं। अन्तत: सत्य की ही विजय होगी, यह हमारा नि:संदिग्ध विश्वास है। हम चारों तरफ देख रहे हैं कि अनेक नेता जिनके ऊपर हत्याओं के आरोप हैं, बड़े-बड़े पदों पर हैं और शंकराचार्य जेल में। यह स्थिति किस बात का संकेत देती है, यह समझना चाहिए।स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज सत्य की खोज में विचरण करते हुए 1955 में युगपुरुष परमहंस स्वामी परमानन्द जी की शरण में आए थे। तब उनकी आयु तेईस वर्ष थी। स्वामी परमानन्द जी का आश्रम मध्य प्रदेश के सतना जिले में चित्रकूट अनुसुइया नामक स्थान पर था, जो उन दिनों बियावान जंगल था। स्वामी जी वहीं साधनारत थे। अपने गुरुदेव के सान्निध्य में स्वामी अड़गड़ानंद जी भी साधना करने लगे। उन्हें अड़गड़ानंद नाम भी गुरुदेव ने ही दिया। विलक्षण प्रतिभा के धनी स्वामी अड़गड़ानंद जी ने हालांकि प्रारंभिक स्कूली शिक्षा भी पूर्ण नहीं की परन्तु उन्हें श्रीमद्भगवद् गीता सहित अनेक शास्त्र और उनकी व्याख्याएं कंठस्थ है। लेखन में अभिरुचि न होते हुए भी उन्होंने अपनी वाणी के बहुमूल्य योगदान से अनेक ग्रंथों की रचना की। स्वामी अड़गड़ानंंद जी का केन्द्र, मीरजापुर (उ.प्र.) के नगरीय क्षेत्र से दूर शक्तेशगढ़ में श्री परमहंस आश्रम नाम से विख्यात है।पिछले दिनों तरुण विजय और जितेन्द्र तिवारी ने स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज से अनेक बिन्दुओं पर चर्चा की, जिसके मुख्यांश यहां प्रस्तुत हैं-अनादि काल से भारत का भाग्य विश्व गुरु पद ही है। विश्व ने सभ्यता, संस्कृति और धर्म का उपदेश भारत से ही प्राप्त किया था। परन्तु पिछले लगभग दो हजार वर्षों से यहां विकृतियों ने जन्म ले लिया है। ये विकृतियां धार्मिक हैं। सच्चे धर्मगुरुओं के अभाव और धर्म का कार्य अयोग्य लोगों द्वारा किए जाने के कारण ये विकृतियां आई हैं। उस समय राजा-महाराजाओं के दरबारों में ज्यादा चापलूसी कर जो लोग गुरु और सद्गुरु या राजगुरु की उपाधि प्राप्त कर गए और धर्म के नाम पर उन्होंने जो भी निर्णय ले लिया, उस राजा की सेना ने उसे जबरन क्रियान्वित किया। इससे ये विकृतियां रीति-रिवाज के रूप में जड़ें जमा गईं। यह वास्तव में धर्म नहीं है।धर्म की इन विकृतियों के कारण ही भारत का भाग्य भी विकृत हुआ। जात-पांत, छुआछूत भारत में थी ही नहीं। दरअसल, जातिगत आधार पर छुआछूत- भेदभाव पिछले दो हजार वर्षों में पनपा है। इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है।परिवर्तन हो रहा हैराजा-महाराजाओं के समय में बलपूर्वक प्रसारित किया गया धर्म का यह विकृत रूप स्वतंत्रता मिलने पर स्वत: ही धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। पहले कहा जाता था कि शूद्र कोई पद नहीं पा सकता, अब उस जाति के लोग बड़े-बड़े अधिकारी हो गए हैं। जिन्हें झोपड़ी में रहने और ठीकरों में खाने के लिए मजबूर किया जाता था, वे अब पांच सितारा होटलों में जाने लगे हैं। उस समय जो पद ब्राह्मणों के लिए आरक्षित हुआ करते थे अब उन पर ये लोग पहुंच गए हैं। पहले किसी ब्राह्मण को यदि कोई अपमानजनक शब्द कह देता तो उसे सजा होती थी। यहां तक कि गांव या देश से निकाल दिया जाता था। आज यदि अनुसूचित जाति के लोगों को जाति सूचक शब्द से बुलाया जाए तो तुरंत जेल हो जाती है और निचली अदालत से जमानत तक नहीं होती। इसके विरोध या इसपर बिगड़ने की बात नहीं है।धर्म की परिभाषासाथ ही साथ विशुद्ध धर्म-शास्त्र और उसकी वास्तविक व्याख्या के अभाव में यह विकृति बढ़ती गई। जब हम धर्म की वास्तविक परिभाषा को प्राप्त कर लेंगे तो समझ लेंगे, हम इस विकृति से अवश्य निकल जाएंगे। एक बात और समझ लेनी चाहिए कि यह संघर्ष किसी ने हम पर लादा नहीं है बल्कि धार्मिक भ्रांति के कारण यहीं जन्मा है। याद कीजिए उस समय को जब इस भूमि पर त्रिलोक विजयी, चक्रवर्ती सम्राट, दिग्विजयी और पराक्रमी राजा हुआ करते थे। उस समय खैबर दर्रे को पार करके सिन्धु घाटी से ऊंटों पर सवार होकर कुछ लुटेरे आए। उन्होंने न केवल मंदिर लूटे, अस्मत लूटी बल्कि दिल्ली पर भी अपना झण्डा गाड़ दिया। इस अनर्थ का कारण वे लुटेरे नहीं बल्कि हमारी धार्मिक भ्रांति थी। आखिर तब कहां गया था उन पराक्रमी चक्रवर्ती लोगों का बल? वे अपनी जगह थे पर धर्म के अज्ञान ने ही उन पर आघात किया। उनका धर्म कहता था कि केवल क्षत्रिय लड़ेगा, ब्राह्मण और वैश्य केवल तभी हथियार उठा सकते हैं जब दान दी हुई वस्तु कोई छीन ले अथवा गाय पर कोई विपत्ति आए। लेकिन शूद्र चाहे मर जाए, शस्त्र नहीं उठा सकता, अन्यथा नरक में जाएगा। यह था उनका तथाकथित भ्रांतिपूर्ण सनातन धर्म।इसी कारण जब विधर्मियों का आक्रमण हुआ तो यहां की जनता में लड़ने वाले 100 में से केवल 7 होते थे। इन 7 क्षत्रियों में भी स्त्री, बच्चे और वृद्ध होते थे, अर्थात् लड़ने वाले कुल 3 या 4। इन 3-4 पर कब्जा कर लिया तो बस, बाकी सब तमाशा देखते थे क्योंकि युद्ध करना उनका “धर्म” नहीं था इसलिए मुठ्ठी भर लोग चन्द क्षत्रियों पर कब्जा करके इन्हें भेड़-बकरियों की तरह उठा ले जाते और अपनी मण्डी में 2-2 रु. में बेच देते थे। यदि सम्पूर्ण समाज उन बर्बर आक्रांताओं से लड़ता तो कभी पराजित न होता। पर वह भीषण संकट इस तथाकथित धर्म भ्रांति की वजह से आया।धार्मिक भ्रांति दूर करेंधार्मिक भ्रांतियां पैदा होने के अन्य कारण भी रहे। जैसे, श्रीमद्भगवद्गीता के रहते कोई अन्य सम्प्रदाय पनप ही नहीं सकता था क्योंकि वह सबसे समृद्ध ज्ञान है। पर षडंत्रपूर्वक श्रीमद्भगवद्गीता को लोगों के बीच से हटाया गया। प्रचारित किया गया कि महाभारत न पढ़ना, घर में न रखना अन्यथा झगड़ा हो जाएगा, महाभारत हो जाएगा। श्रद्धावश जब लोगों ने महाभारत के मर्म अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता को अलग निकाल लिया तो कहा जाने लगा कि इसे घर में मत रखना वरना बच्चे साधु हो जाएंगे, बैरागी हो जाएंगे, जबकि गीता में हमारे धर्म का सार तत्व है। वह श्रीमद् परमात्मा के मुख से निकली वाणी है। अनेकानेक ग्रन्थ होने के बावजूद भारत में सर्वाधिक प्रकाशित होने वाला ग्रंथ गीता ही है। इस गीता के माध्यम से जब हम अपने धर्म को धारण करेंगे तो वर्तमान समय में दिख रहे संकट के बादल छंट जाएंगे और यह देश पुन: विश्व गुरु के सिंहासन पर आसीन हो जाएगा।अपनों को अपनाएंपिछड़े कहे जाने वाले हिन्दू समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग अब स्वयं को अहिन्दू मत वाला कहने लगा है। और इतनी बड़ी संख्या में आज मुसलमान कहां से आए? ये वही हैं जिन्होंने कभी तुर्कों का छुआ खा लिया था, उनका पानी पी लिया या फिर 10 दिन उनकी कैद में रह गए। हिन्दुओं ने धर्म के नाम पर उन्हें निकाल दिया, अछूत मान लिया। उससे बड़ा दुर्भाग्य यह कि हिन्दू धर्म में पुन: प्रवेश के रास्ते को भी बन्द कर दिया। इस धार्मिक भ्रांति का लाभ उठाया मुसलमानों और ईसाईयों ने। आज भारत में जो बड़ी संख्या में मुसलमान और ईसाई दिखाई देते हैं, वे हमारे ही भाई हैं, एक ही पूर्वज की सन्तान हैं। अब इस बात की आवश्यकता है कि हमारे जो भाई किन्हीं कारणों से 100-200 वर्ष पहले बिछुड़ गए थे, उन्हें अपने साथ लाएं। यदि वे पुन: अपने वैदिक हिन्दू धर्म में आना चाहें तो उनका स्वागत करें।धर्मशास्त्र का पालन करेंयदि हम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना न करें बल्कि उनके कहे पर चलें, धर्मशास्त्र में उनकी वाणी का पालन करें, तो भावी भारत का स्वरूप भी वही होगा जो युगों पूर्व था। भारत पुन: वैभवशाली, पराक्रमी और दिग्विजयी होगा। वास्तविक धर्म की स्थापना और धर्मशास्त्र के ज्ञान के लिए साधु-संतों की बहुत बड़ी भूमिका है, परन्तु तब जब वे गिरिवासी, वनवासी के बीच में जाकर उन्हें दीक्षित करें। जो शहरों में रहकर किसी देवी-देवता का बड़ा मंदिर बनवाकर अथवा कथा-प्रवचन कर रहे हैं, वे वास्तव में धर्म का कोई कार्य नहीं कर रहे हैं। समाज का कोई भला नहीं कर रहे हैं। उनकी तो वास्तविक आवश्यकता गांव, देहात और वनों में है, जहां हमारे भोले-भाले हिन्दू बन्धुओं को सात समन्दर पार से आए मिशनरी के लोग ईसाई बना रहे हैं।NEWS