| दिंनाक: 01 Feb 2005 00:00:00 |
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काठमांडू-ल्हासा-कैलास!पिछले अंक में हमने इसी पृष्ठ पर संदीप गुप्त की पुस्तक कैलास मानसरोवर की अनुभूति के कथानक और विषयवस्तु की चर्चा की थी। इस बार हम उसी पुस्तक से कुछ ऐसे चुनिंदा अंशों को प्रकाशित कर रहे हैं जो कैलास-मानसरोवर यात्रा के रोमांच और दिव्यता की अनुभूति कराते हैं। संलग्न छायाचित्र भी लेखक ने लिए हैं। -सं.संदीप गुप्तकार्यकारी सम्पादक व निदेशक, दैनिक जागरणल्हासा स्थित पोटाला पैलेस में दलाई लामा की गद्दीमानसरोवर झील व गुरलामान्धाता पर्वतल्हासा शहर लगभग 3625 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। मानसरोवर की यात्रा के लिए पूज्य चिदानंद सरस्वती “मुनि जी” ने काठमांडू से ल्हासा जाने का मार्ग निश्चित किया था। उनका परामर्श था कि जो भक्तगण शहर से आए हैं उनको ल्हासा में दो दिन रोका जाए ताकि लोग अपने शरीर को वहां की हवा के कम दबाव वाली जलवायु के अनुकूल बना सकें। ल्हासा का हवाई अड्डा “गोगार” ल्हासा शहर से लगभग 82 किलोमीटर दूर है और इसके दोनों तरफ पर्वत श्रृंखलाएं हैं। यह दुनिया का सबसे ऊंचा कमर्शियल हवाई अड्डा कहा जाता है। इसे नई सुविधाओं के साथ चीन के अन्य हवाई अड्डों की तरह बनाया जा रहा है। इसकी हवाई पट्टी पर तीन हवाई जहाज एक साथ खड़े हो सकते हैं। चीनी हवाई अड्डे पर खड़ा मैं वहां के सैनिकों में उनकी संस्कृति की, उनकी सोच की झलक देख रहा था और मेरी आंखों में बार-बार इतिहास के पन्ने फड़फड़ा रहे थे, जिनमें तिब्बत कभी भारत का हिस्सा था और जो अब चीन के अधिकार क्षेत्र में है।हवाई अड्डे से ल्हासा तक जाने वाला सड़क मार्ग इतना साफ, सुन्दर और आरामदायक था कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक तरफ “ल्हासा” नदी बह रही थी और दूसरी तरफ था पहाड़ों को काट कर बनाया गया रास्ता। दूर-दूर से तमाम विदेशियों, विशेषकर भारतीय मूल के आस्थावान पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर चीन सरकार ने इस पर्यटन स्थल का विकास पिछले पांच-छह वर्षों में किया है। बसों में सवार यात्री जैसे-जैसे अपनी यात्रा के पड़ाव पूरे करते, उनमें एक आत्मसंतोष की झलक दिखती। हाइवे के दोनों ओर के सुन्दर दृश्य हमारी थकान कम कर रहे थे और हमारी जिज्ञासा को विस्तार दे रहे थे। लगभग डेढ़ घंटे बस का सफर तय करके हम ल्हासा शहर पहुंचे। जिस समय हम ल्हासा शहर के अपने पड़ाव में पहुंचे उस समय शाम के छह बजे थे। नेपाल से चीन का समय ढाई घंटा आगे है।तिब्बती पठार में लगभग 30 मील जाने पर पर्वतों से घिरे दो अत्यन्त विशिष्ट सरोवर मिलते हैं। मनुष्य के दोनों नेत्रों के समान वे स्थित हैं और उनके मध्य में नासिका के समान ऊपर उठी पर्वतीय भूमि है जो दोनों को पृथक करती है। इनमें एक है राक्षस ताल और दूसरा मानसरोवर ताल। राक्षस ताल विस्तार में बहुत बड़ा है, वह गोल या चौकोर नहीं है। उसकी कई भुजाएं मीलों दूर तक टेढ़ी-मेढ़ी होकर पर्वतों में चली गई हैं। इसकी ऊंचाई लगभग 14,900 फीट है। कहा जाता है कि किसी समय राक्षस राज रावण ने वहीं खड़े होकर देवाधिदेव भगवान शंकर की आराधना की थी। दूसरा है सुप्रसिद्ध मानसरोवर। मानसरोवर की ऊंचाई 14,950 फीट है। मानसरोवर का जल अत्यन्त स्वच्छ और नीलाभ है।कैलास मानसरोवर के चारों तरफ बर्फीले पहाड़ अपनी ऊंचाइयों का आभास दे तो रहे थे किन्तु बादलों ने उन सबको ढक रखा था इसलिए स्पष्ट रूप से उनके रंग-आकार को देख पाना कठिन हो रहा था। शाम को 6.30 बजे मौसम ने आखिर अपना रुख बदला।अचानक बादल छंटे और हमारे सम्मुख कैलास पर्वत साक्षात् उपस्थित था। मैं भावुक हो रहा था और एक-एक क्षण को अपने भीतर संजो लेना चाहता था। उस दुर्लभ दृश्य में इतना रम गया कि सरोवर के आचमन की उत्कंठा को रोक नहीं सका। मैंने वस्त्र उतारे और मानसरोवर में डुबकी लगाई। मानसरोवर की पवित्र झील में एक अद्भुत अनुभूति हुई जिसे शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए सम्भव ही नहीं। कैलास के दिव्य दर्शन और मानसरोवर के जल में स्नान करते हुए मुझे साक्षात् शिव की प्रतीति हो रही थी।ल्हासा में जोकहंग मंदिर के रास्ते से बरखोर बाजार से गुजरते मुनि जी, किशोर व्यास जी व भक्तगणपोटाला महल की छत से लिया गया ल्हासा का विहंगम चित्रपोटाला महल में स्थानीय लामाओं के साथ लेखक संदीप गुप्त व उनकी सहधर्मिणी मंजरी गुप्तसेरा मठ में कीर्तन के समय एक ताल वाद्य बजाते शिवमणि व भक्तगण(सद्य:प्रकाशित पुस्तक कैलास मानसरोवर की अनुभूति से )पाकिस्तान से संबंध सिर्फ सरकारी कवायद -जसवंत सिंह से खास बातचीत कौन बचाएगा बिहार?नरसिंह राव का निधनपिछले 12 महीनेभारतीय जीवन मूल्यों और श्रद्धा केन्द्रों परप्रतिशोधी आघात का वर्षभारतीयों का आत्मविश्वास डिगाहिन्दू जनसंख्या में गिरावटइस्लामी और कम्युनिस्ट आतंकवाद बढ़ा, उसे राजकीय संरक्षण भी मिलाकश्मीर पर किसी भी वार्ता से घाटी के हिन्दू “बाहर”सेकुलरों के तीखे आघातसभ्यतामूलक प्रतीकों पर चोटपूज्य शंकराचार्य गिरफ्तार, तस्लीमुद्दीन मंत्री!!दिल्ली में राष्ट्रीय स्वाभिमान मंच विदेशी षड्यंत्रों से सावधानअर्जुन सिंह को अदालत में पेश होने का सम्मन -प्रतिनिधिपामुलपर्ति वेंकट नरसिंह राव एक खुली किताब सा जीवनदक्षिण बंगाल प्रान्त संघचालक ग्रुप कै. मनोज घोष का अवसान पूर्व सैनिकों को संगठित करने वाले अभिनव भगीरथ -कुप्.सी. सुदर्शन, सरसंघचालक, रा.स्व.संघउफ! पिछले 12 महीने!! सं. प्रस्तुति : संध्या पेडणेकर व अरुण कुमार सिंहसन 2004 के बारह महीने साहित्य, कला, फिल्म, राजनीति आदि क्षेत्रों के लिए कैसे रहे?आई.-एम. की छाया में नागा शांति-वार्ता क्या शांति लौटेगी नागालैण्ड में? – आचार्य राधागोविन्द थोंङामअमृत महोत्सव में आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने कहा- जिन हाथों ने मुझे गढ़ा, वे हैं इस सम्मान के सही अधिकारी -प्रेमशंकर त्रिपाठीगुजरात दंगों पर “जस्टिस आन ट्रायल” की संगोष्ठी गुजरात दंगों में अदालतों की भूमिका कौन जांचेगा? -प्रतिनिधिराष्ट्रवादी मुस्लिम आन्दोलन ने की आतंकवाद पीड़ितों की चिंता -प्रतिनिधिस्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज कहते हैं- प्रभु की प्राप्ति आलीशान मंदिर बनवाने से नहीं,जन-जन की सेवा से होगीनई दिल्ली हिन्दुस्थान समाचार की राष्ट्रीय संगोष्ठी आतंकवाद और घुसपैठ परमीडिया की चुप्पी घातक -प्रतिनिधिगृहमंत्री शिवराज पाटिल द्वारा “संसद का इतिहास” पुस्तक लोकार्पित संसद सिर्फ “तू तू-मैं मैं” नहींदेवेन्द्र जी की पुस्तकों के बहाने देश और काल पर सामयिक चिंतन राष्ट्रीयता और संघ का प्रवाह -प्रतिनिधिअमन की बातें, सरहद खोलने की मुलाकातें जुल्म का शिकार हिन्दू फिर हाशिए पर -जम्मू प्रतिनिधिनिर्वासित तिब्बतियों ने टल्कु डेलेक के साथ न्याय किए जाने की गुहार की लोब्सेंग की कहानी क्या टल्कु के साथ दोहराई जाएगी? -प्रतिनिधि”आसियान” कार रैली दिल जुड़े -प्रतिनिधिश्रद्धाञ्जलि स्व. नरसिंह राव को रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री कुप्.सी.सुदर्शन की श्रद्धाञ्जलि कुशल नेता, विद्वान व्यक्तित्वसम्पादकीय वाह वाजपेयी!कही अनकही -दीनानाथ मिश्र अथ रोजगार गारंटी कथास्त्री हर पखवाड़े स्त्रियों का अपना स्तम्भतेजस्विनी मेरी सास, मेरी मां, मेरी बहू, मेरी बेटी बनी ठनीमंगलम्, शुभ मंगलम्पाठकीय एक गहरी सेकुलर साजिशटी.वी.आर. शेनाय यह बिहार है या लालू की बपौतीगहरे पानी पैठ “लाल राज” में पुलिस पर शिकंजामंथन कर्मयोग शास्त्र है भगवद्गीता -देवेन्द्र स्वरूपकोलकाता में शिक्षा व संस्कृति रक्षा मंच की संगोष्ठी नई पीढ़ी को अतीत से परिचित कराएं – वासुदेव पालकाशी में गोविन्दाचार्य के नेतृत्व में व्यवस्था परिवर्तन के लिए उठी आवाज -सुमीत कुमारNEWSप्रतिशोधी आघात का वर्षभारतीयों का आत्मविश्वास डिगा हिन्दू जनसंख्या में गिरावट इस्लामी और कम्युनिस्ट आतंकवाद बढ़ा, उसे राजकीय संरक्षण भी मिला कश्मीर पर किसी भी वार्ता से घाटी के हिन्दू “बाहर” सेकुलरों के तीखे आघात सभ्यतामूलक प्रतीकों पर चोट पूज्य शंकराचार्य गिरफ्तार, तस्लीमुद्दीन मंत्री!!-तरुण विजयअपना भारतीय नया वर्ष तो आएगा मार्च में वर्ष प्रतिपदा के समय, जब हम विक्रम संवत् का स्वागत करेंगे। लेकिन पिछले बारह महीने का हिसाब-किताब, लेखा-जोखा लेने का तो चलन है ही, क्योंकि ईसवी सन् के अनुसार ही देश, सरकार एवं रोजमर्रा का कामकाज चलता है। और इस पर जब हम एक भारतीय के नाते नजर दौड़ाते हैं तो प्रथम दृष्ट्या लगता है कि इस दौरान हमारे जीवन मूल्यों, मान्यताओं और श्रद्धा के प्रतीकों पर कुछ ज्यादा ही चोट हुई। यह चोट कुछ इसलिए भी ज्यादा पीड़ा देती है क्योंकि आघात करने वाले हाथ हिन्दुओं के ही थे तथा हिन्दू एकजुटता का झीना दृश्य तक उपस्थित होने की तो बात ही दूर, हिन्दू आपस में ही लड़ते-झगड़ते और परस्पर विरोधी खेमों में बंटे दिखे। साल का पहला चतुर्थांश भारत चमकाने में बीता तो उसके बाद राजग सरकार की अनायास पराजय का सन्नाटा और भारत उदय के बजाय एक विदेशी मूल की महिला के उदय के समक्ष दण्डवत करते “प्रभावी, सम्पन्न और कर्तृत्ववान” भारतीय दिखे। और जो भारतीय देश की जमीन से जुड़े रहते हुए हिम्मत के साथ इस स्थिति के विरोध में सामने आए उन पर भारतीय अखबारों ने ही अपमानजनक टिप्पणियां कीं। एक नया दौर शुरू हुआ, जिसमें ऊंचे ओहदे पर जाने की कसौटी, अच्छाई नहीं बल्कि वोट और चोट की ताकत मान ली गई। राजनीति विषय केन्द्रित होने के बजाय विषय विभ्रमित दिखी और आम जनता मानने लगी कि सब एक जैसे ही हैं और किसी से कुछ खास आशा रखना व्यर्थ है। फिल्मों और अखबारों में कामुकता स्वीकार्य मुख्यधारा की बात मानना फैशन हुआ, विद्यालयों में संस्कार, पूर्वजों की परम्परा तथा अतीत के गौरव वाले पाठ भगवाकरण कहकर लांछित एवं बहिष्कृत किए गए और 100 करोड़ के देश ने ओलम्पिक निशानेबाजी में चांदी हासिल कर छाती फुलाने का बहाना ढूंढा। पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल और भारत में इस्लामी जिहादियों तथा कम्युनिस्टों की बंदूकों ने हिन्दुओं पर हमले जारी रखे। जनगणना के आंकड़ों में हिन्दुओं की जनसंख्या में गिरावट दिखी तो सेकुलर जिहादी खुश हुए और हिन्दुओं ने अपनी परम्परागत निश्चिन्तता बनाए रखते हुए इस पर चिन्तित हो उबलने की जरूरत नहीं समझी। पूज्य शंकराचार्य गिरफ्तार किए गए और पूरा देश कानून, संविधान वगैरह-वगैरह के शाब्दिक विलास की नौका में तैरता रहा।किसी भी देश को उठाने, बढ़ाने, गिराने या जिताने का सबसे महत्वपूर्ण अवयव होता है वहां का मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग। यही वह वर्ग है जो किसी क्रांति का हरावल दस्ता और परिवर्तन का असरदार उपकरण बनता है। सन् 2004 में यही वह वर्ग है जिसने आर्थिक क्षेत्र में मिला-जुला अनुभव किया, उच्च मध्यम वर्ग ज्यादा आगे बढ़ा और निम्न मध्यम वर्ग ठहराव की ठंडक में सिकुड़ा रहा। वहीं महंगाई ने हमारे भोजन और नाश्ते में स्वाद को कसैला किया और पौष्टिकता को घटाया। नौकरियां नहीं मिलीं और रोजगार के अवसर संसद में आश्वासनों की धूल खाते रहे। राष्ट्रीय तथा आंतरिक सुरक्षा में मजबूती इस तरह दिखाई दी कि पहले फौजों को कश्मीर घाटी से वापस बुलाए जाने की घोषणा की गई, फिर पोटा हटाया गया और नागालैंड में शांति वार्ताएं उन लोगों से शुरू की गर्इं जो ईसा के नाम पर हिंसा और अलगाव की आग जलाए हुए हैं। एक ओर कम्युनिस्ट आतंकवादियों-जो नक्सलवादी, माओवादी जैसे तरह-तरह के नामों से कार्य कर रहे हैं- को मुक्त किया गया और उन्हें सरकारी ठाठ-बाट के साथ रखा गया, वहीं घृणित अपराधों में लीन राजनेता केंद्रीय मंत्री बनाए गए। जब उनके बारे में आवाज उठाई गई तो आवाज उठाने वालों के खिलाफ प्रतिशोधी कार्रवाइयां शुरू कर दी गर्इं। राज्यपाल हटाए, गोधरा की दुबारा जांच बिठाई, कश्मीरी हिन्दुओं को अलग-थलग महत्वहीन रखा गया, पोप की भारत में “फसल काटने” की नीति बढ़ाई गयी। सबसे ताजा हैं प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव पुलक चटर्जी, जो बरसों बरस तक सोनिया गांधी के खास सहायक रहे और सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय भेजे गए, ने सी.बी.आई. को पत्र लिखा जिसमें श्री लालकृष्ण आडवाणी के विरुद्ध बाबरी मामले में मुकदमे फिर से शुरू करने की बात कही गई है। इन लोगों की इतनी दुश्मनी पाकिस्तान के साथ नहीं होगी, जितनी भारतीय नागरिक परंतु वैचारिक प्रतिपक्षियों, के साथ निभा रहे हैं। फिर से गुजरात की बेस्ट बेकरी कांड में चर्चित जाहिरा शेख के मामले में तहलका का तथाकथित धमाका ठीक उसी वक्त आता है जब परेशान लालू की मुसीबतें सुर्खियों में होती हैं। इससे लालू को मानो तनिक राहत और राजनीतिक लाभ भी मिला। अब जासूसी पत्रकारिता (या विश्वासघाती?) भी नाम देखकर और पार्टी पहचान कर होने लगी है।पूरा मीडिया इतना भयभीत और सोनिया के सामने चरणस्पर्शी भूमिका में है कि उनके बारे में आलोचना का एक शब्द भी कहने-सुनने और बोलने से उसी तरह डरता है जैसे आपातकाल में वह बिछा-बिछा सा चला था। हां, अपवाद तब भी थे और आज भी हैं। तो जश्न मनाइए और भूल जाइए कि इस देश में हिन्दू बहुसंख्यक भी हैं या उनकी भी कुछ संवेदनाएं होती हैं। चाहे कश्मीर की बातचीत हो या पूर्वांचल में शांतिवार्ता, हिन्दुओं का कहीं भी महत्व, हिन्दू के नाते सहभागिता अथवा उनके अस्तित्व का अहसास तक कराना टाली जाने योग्य बात मानी गई है।बहुत कोशिश की जाए तब भी, महंगाई से मचा हाहाकार, घर में बैठे पढ़े-लिखे बेरोजगार बच्चों को देखकर मन में उठता दर्द, छोटे बच्चों की पढ़ाई का लगातार बढ़ता खर्च और सत्ता में बैठे तथा सत्ता के बाहर वाले नेताओं का विलास-वैभव, कहीं से भी आशा का सवेरा देखने का मौका नहीं दे रहा है।यह साल रहा इस बात की याद दिलाने वाला कि हिन्दुओं ने जब भी अपने दु:ख-दर्द, संवेदनाओं, आस्थाओं के बारे में सवाल उठाने चाहे तो उन्हें दबा दिया गया, तिरस्कृत किया गया तथा उन्हें हाशिए पर धकेला गया। पुराने हिन्दू साम्राज्य, जैसे-हम्पी सिर्फ इस कारण से चर्चित हुए कि वहां कपड़ा उतार अभिनेत्री मल्लिका जैकी चान के साथ पहुंची। देश एक विदेशी प्रधानमंत्री पाने से बाल-बाल बचा पर चारों ओर हाशिए पर हतबल हिन्दुओं का दृश्य दिखा। एक हिन्दू मुख्यमंत्री ने ही हिन्दू पुलिस अधिकारियों के माध्यम से हिन्दुओं के प्रतीक महान सन्त को अपमानित किया और हिन्दू सिर्फ अखबारों में लेख लिखते रह गए। जैसे नाजी हिटलर ने यहूदियों का पीछा किया था वैसे ही सेकुलरों ने शान्ति और स्वतंत्रता के नाम पर हिन्दुओं पर लेबल चिपका-चिपकाकर उनका प्रतिशोधी पीछा किया।यह दौर आत्ममंथन और आत्मपरीक्षण का उत्प्रेरक रहा और हमें इस बात की भी याद दिलाता रहा कि अगर हिन्दू समाज परस्पर आघात करने में ही अपने बड़प्पन का भ्रम मानने वाला नहीं होता तो रा.स्व.संघ की स्थापना की भी कोई आवश्यकता नहीं थी।लेकिन यह सब शिकायती दौर की बातें हैं–हम बहुत महान थे लेकिन आज जो हमारे साथ हो रहा है वह सब गलत, अन्यायपूर्ण है तथा सब हमारे खिलाफ हैं और हमें सबसे लड़ना पड़ रहा है–अपनों से भी और उनसे भी जो अपने नहीं हैं– क्या यह सब एक हारे हुए मन की ठण्डी उबासियां नहीं प्रतीत होतीं? अगर डा.हेडगेवार यह सोचते तो कभी बिना किसी साधन के विश्व का बड़ा जनान्दोलन नहीं खड़ा कर सकते थे। दुनिया का ऐसा कौन सा समाज है जिसने कभी अन्याय का सामना न किया हो, वह कौन सा देश है जहां के पुरातन जीवन मूल्य समय के साथ बदले न हों। और उस बदलाव के दौर में पुरानी पीढ़ी ने बदलाव की वाहक नई पीढ़ी पर पतित होने, संस्कार विरोधी बात करने, बड़ों के प्रति असम्मानजनक होने का आरोप न लगाया हो। इसलिए यदि हमारी भाषा, वेश और खानपान में परिवर्तन आया है या संस्कार बदल रहे हैं या नौकरियों की परम्परागत लाइनों के बजाय कुछ नए रास्ते खोजने पड़ रहे हैं तो चलिए इस वक्त का भी सामना करें। उस पर कुंठित हो हाय-हाय करने के बजाय अगले बीस-तीस और पचास साल का खाका तैयार कर जमाने की रफ्तार को पकड़कर चलने की वह ताजगी भरी हिम्मत दिखानी चाहिए जो हमारे पूर्वजों आदिशंकराचार्य, रामानुजाचार्य, गांधी, विवेकानन्द, सावरकर और श्री गुरुजी ने दिखाई थी। इनमें से कोई भी रुढ़िवादी परम्परा के ठहरे और गंदलाए ताल का समर्थक नहीं था, वरन् गंगा की धारा के समान नित्य नूतन और चिर सनातन भारतीयता का पक्षधर था। यह समझें तो 2004 से 2005 बेहतर होगा और वर्ष प्रतिपदा पर उदित होने वाला सूर्योदय आशा का सवेरा लाएगा। महाभारत से लेकर आज तक संघर्ष किए ही हैं। पर जब तक भरोसा है गीता के श्रीकृष्ण का कि धर्म का साथ देंगे तो कोई हमें हरा ही नहीं सकता, जीत सिर्फ हमारी ही होगी, तब तक दु:ख में भी सुमन खिलाएं।NEWS