| दिंनाक: 10 Oct 2004 00:00:00 |
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महाराष्ट्र चुनावधुंधली तस्वीर, किसकी खुलेगी तकदीरजिस समय वर्तमान रूस, सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स नामक कम्युनिस्ट तानाशाही का हिस्सा ही था, उस समय का एक चुटकुला याद आ रहा है। अन्य सत्ताओं की तरह ही माक्र्सवादी शासक भी वैसा ही आदर पाने को उतावले थे जो लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी गई सरकारों को दिया जाता था। इसी वजह से चुनाव कराने का अर्थहीन कर्मकाण्ड पूरी निष्ठा के साथ चलाया जाता था। उस समय का चुटकुला यह था कि चुनावी कसरत के ऐसे ही एक अवसर पर एक उद्दंड किस्म के-या नासमझ- मतदाता ने जानना चाहा कि आखिर वह अपना मत दे किसे रहा है। इस दु:साहस से खिन्नाए मतदान केन्द्र के प्रभारी ने उसे झकझोरा, “कामरेड, क्या तुम नहीं जानते कि यह एक गुप्त मतदान है?”क्या कम्युनिज्म के जनक ने ही एक बार खुद नहीं कहा था कि “इतिहास खुद को दोहराता है, पहले त्रासदी के रूप में और फिर एक ढोंग की तरह”? और आज भारत- जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकंतत्र माना जाता है- में जो कुछ भी हम घटता देख रहे हैं वह इतिहास का दूसरा वाला भाग है यानी कोरा ढोंग।…..आखिर महाराष्ट्र के मतदाता किसको अपना मुख्यमंत्री चुनने वाले हैं? किसी को भी नहीं पता। क्या वे अपना मत राज्य के बंटवारे के पक्ष में डाल रहे हैं। या इसे एकजुट बनाए रखने के लिए? कोई नहीं जानता। इन चुनावों में कथित दो बड़े मुद्दे कांग्रेस-राकांपा सरकार का कुशासन और अलग विदर्भ राज्य का गठन ही माने जा रहे हैं। लेकिन आप सत्तारूढ़ गठबंधन और उसके सामने खड़े भाजपा-शिवसेना मोर्चे, दोनों के घोषणापत्र देख डालिए, इन दोनों मुद्दों पर एक भी शब्द नहीं मिलेगा। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि महाराष्ट्र के मतदाताओं को उनके होने वाले नेता मूर्ख बना रहे हैं।जिस समय अगली सरकार की ताजपोशी की जाएगी उस वक्त इन बातों का असर दिखाई देगा। मुख्यमंत्री-चाहे किसी भी पक्ष का व्यक्ति गर्वीली महाराष्ट्र पगड़ी पहने- को जनता का समर्थन उसके हाथ मजबूत करने के लिए नहीं होगा। वह तो केवल एक कठपुतली होगा जिसे, अगर सत्तारूढ़ मोर्चा ही सत्ता बनाए रखता है तो, सोनिया गांधी और शरद पवार की विरोधाभासी धुनों पर नाचना होगा। (सोनिया गांधी को लेकर वरिष्ठ राकांपा नेता द्वारा हाल में व्यक्त विचार दो तरह की बातें दर्शाते हैं।) अगर शिवसेना-भाजपा मोर्चा सभी चुनौतियों का सामना करके सत्ता हासिल करता है तो नया मुख्यमंत्री जान जाएगा कि उसकी ताकत बाल ठाकरे और भाजपा नेतृत्व के बूते होगी। मुझे नहीं पता अगर भाग्य पलटी मार कर एक ऐसे व्यक्ति को कुर्सी पर बैठा देगा जो एक सशक्त और कारगर शासन देने के लिए इन अवरोधों का सामना कर पाएगा। लेकिन मैं यह जरूर जानता हूं कि जब विधायक नेतृत्व की तलाश में मुख्यमंत्री से परे देखते हों तो यह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध है। मैं यह भी यकीन के साथ जानता हूं कि कुछ अधिक महत्वाकांक्षी विधायक अपने मुख्यमंत्री की अनदेखी करेंगे और अपने झंझट पार्टी आलाकमान तक लेकर जाएंगे!शायद इस कारण से कोई भी मोर्चा इस मोड़ पर किसी को भी मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं कर रहा है। दोनों ही गठबंधनों में बागी उम्मीदवारों की समस्याएं देखते हुए, वे जानते हैं कि किसी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर दिया तो उनके कुछ बागी किस्म के लोग विरोधी पाले में जा सकते हैं। और कांटे की टक्कर के इस चुनाव में कोई भी मोर्चा एक भी मतदाता खोना गवारा नहीं कर सकता। यह रवैया समझ में आ सकता है पर इसे भी नकारा नहीं जा सकता कि यह थोड़ी कायरता है।इसी तरह की संकुचित सोच पूर्वी महाराष्ट्र से विदर्भ के निर्माण के सवाल को प्रभावित करती है। शिवसेना इस विचार के प्रति अपना मुखर विरोध जताती है। अगर और कुछ नहीं तो यह कम से कम इस मत पर दृढ़ता तो दिखा ही रही है। बहुत पहले की एक शिवसेना रैली की मुझे याद है जिसमें वक्ताओं ने बड़ी भावुकता से कहा था कि महाराष्ट्र में बेलगाम (उस समय भी और आज भी जो कर्नाटक में है) को भी मिलाकर उसका आकार बढ़ाना चाहिए। भाजपा इस विदर्भ के मुद्दे पर थोड़ा पक्ष में दिखती है और यह पार्टी के उस सिद्दान्त से मेल भी खाता है कि आमतौर पर छोटे-छोटे राज्य होना अच्छा होता है। लेकिन इन दोनों सहयोगियों ने घोषणा पत्र में इस मुद्दे को पूरी तरह अनछुआ रखा है, क्योंकि अलग-अलग विचारों में साम्यता का कोई बिन्दु ही नहीं है। लेकिन अगर यह मोर्चा चुनाव जीतता है और फिर विदर्भ का मुद्दा जोर-शोर से उछलता है तब क्या होगा?कांग्रेस और राकांपा के बारे में क्या ख्याल है? यहां भी, दोनों दलों में अपने भीतर ही कोई एकता नहीं है, आपस में एकता तो छोड़ दीजिए। इससे कहने वालों की बन आई है, जो चाहें सो बोलें। परिणाम यह है कि ये दोनों दल इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं, यह कोई नहीं जानता। मुझे लगता है कि पसोपेश बनाए रखना सोनिया गांधी और शरद पवार दोनों को सुभीता है; अगर मतदाता उलझे हों तो विपक्ष भी कोई ठोस रूख दिखाने से बचता है!समझदारी का तकाजा है कि विकराल रूप लेने से पहले ही समस्याएं सुलझा ली जाएं। लेकिन भारतीय राजनीति का समझदारी से सरोकार रहा ही कब है। (29.09.04)10