| दिंनाक: 10 Mar 2004 00:00:00 |
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प्रगतिशील कम्युनिस्टों के राज्य पश्चिम बंगाल में”डायन” कहकर सैकड़ों महिलाओं कोमौत के घाट उतारा गया-अमरनाथ दत्ताप्रगतिशील माने जाने वाले कम्युनिस्टों द्वारा शासित प. बंगाल में रूढ़ियों और अंधविश्वासों की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह इसी तथ्य से जाना जा सकता है कि गांवों में सैकड़ों महिलाओं को “डायन” मानकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इनमें से 1120 महिलाएं सिर्फ मालदा जिले की हैं। वाममोर्चा सरकार इस सामाजिक त्रासदी को समाप्त करने में पूरी तरह नाकाम रही है। उल्लेखनीय है कि ये घटनाएं अक्सर जनजातीयबहुल क्षेत्रों- बांकुरा, पुरुलिया, मिदनापुर, मालदा, जलपाईगुड़ी और कूच बिहार में हो रही हैं। इन जनजातीयबहुल क्षेत्रों में जनजातीय पुरोहितों का वर्चस्व है, जिन्हें जांगुरु कहा जाता है। पिछले सप्ताह जलपाईगुड़ी के दुआर में दो महिलाओं को इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि जांगुरुओं ने उन्हें “डायन” घोषित कर दिया था। दो जनजातीय महिलाएं मणिका मुंडा और रोतोआ ओराम इसी तरह जांगुरुओं के षडंत्र का शिकार हुईं। क्षेत्र में फैल रहे बुखार और अन्य बीमारियों के लिए ये दोनों “डायनें” ही दोषी बतायी गईं। ऐसा माना गया कि उन्हें मार देने से ही ये बीमारियां खत्म होंगी। हाल ही में मालदा जिले के सुखनिधि गांव के एक जनजातीय परिवार के छह सदस्यों को मार डाला गया, क्योंकि उनके पड़ोस में कुछ बच्चों की मौत हो गई थी। कहा गया कि उन्होंने बच्चों पर जादू-टोना किया था। पन्द्रह दिन पहले ही पुरुलिया में लोगों ने कुछ जनजातीय महिलाओं पर हमला किया, क्योंकि वहां पानी की भीषण कमी हो गई थी और जांगुरुओं ने घोषणा की कि इस जल संकट के लिए ये “डायनें” ही दोषी हैं।यह सूची यहीं नहीं रुक जाती, राज्य जनजातीय मामलों के विभाग के अनुसार उत्तरी बंगाल के जनजातीयबहुल जिलों मालदा, जलपाईगुड़ी और कूच बिहार में ये घटनाएं दक्षिणी बंगाल के बांकुरा, पुरुलिया या मिदनापुर से कम नहीं है। राज्य के पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के अनुसार 1988 से 2003 तक सिर्फ मालदा जिले में 1102 महिलाओं को “डायन” कहकर मार डाला गया। इन सभी जनजातीयबहुल क्षेत्रों में हर साल इस तरह मारी जाने वाली महिलाओं की संख्या सैकड़ों में है। जिन्हें न केवल प्रशासन द्वारा अपितु मीडिया द्वारा भी नजरन्दाज कर दिया जाता है।डायन, भूत, चुड़ैल, जादू-टोना जैसे अंधविश्वास इन जनजातीय लोगों में इतने गहरे जमे हुए हैं कि लगता नहीं ये 21वीं शताब्दी में जी रहे हैं। जब हत्यारे पकड़े जाते हैं तो वे कहते हैं कि यह हत्या नहीं “डायन” को सजा देना है और यह सजा जांगुरु के कहने पर दी जाती है। उदाहरण के लिए मालदा के सुखनिधि गांव में नरसंहार के बाद जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया उन्होंने कहा कि जिन आदमियों और औरतों को मार डाला गया वे रात के अंधेरे में गांव के चक्कर लगाते हुए बिल्ली का रूप धारण कर बिल्ली की तरह गुरगुराते थे, वे इंसान के खून के प्यासे हो जाते थे। जनजातीय लोगों का मानना है कि उनकी ही कुदृष्टि के कारण गांव के कितने ही लोग बीमारी से मर गए। लेकिन रोचक बात यह है कि जब चिकित्सकों का दल गांव में पहुंचा और उन्होंने लोगों की जांच की तो पाया कि गांव के लोग पौष्टिक अल्सर और जिगर की बीमारी से ग्रसित थे। सुविख्यात बंगला लेखिका महाश्वेता देवी, जिन्होंने जनजातीय लोगों के बीच काम किया और उनके बारे में खूब लिखा है, ने इस समस्या पर भी लिखा। एक पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने इस समस्या को जनजातीय लोगों के आर्थिक अभावों और अशिक्षा से जोड़ा, जिसके चलते वे विकृत रूढ़ियों को ही अपनी पहचान मानते हैं और जिनके नाम पर वे किसी की जान लेने में तनिक भी संकोच नहीं करते। महाश्वेता देवी एक और बिन्दु की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं कि राज्य सरकार ने इन जनजातीय लोगों के साथ बहुत अन्याय किया है। एक ओर विकास परियोजनाओं के नाम पर इनकी जमीनों और जंगलों पर कब्जा कर लिया गया। दूसरी ओर उनकी पहचान खत्म करने की कोशिश की गई। महाश्वेता देवी लिखती हैं, उनकी भाषाओं की उपेक्षा की गई और उनकी भाषाओं के साहित्य को कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया।कोलकाता की एक स्वयंसेवी संगठन की अग्रणी कार्यकर्ता अनुराधा कपूर, जिन्होंने जनजातीय और पिछड़े लोगों के बीच लम्बे अरसे तक काम किया है, कहती हैं- प. बंगाल की वाममोर्चा और कांग्रेस सरकार इस खुशफहमी में है कि उसने पिछड़े और जनजातीय लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा है, लेकिन यह कैसा विकास है कि असंख्य जनजातीय लोग, विशेष रूप से महिलाएं प्रतिवर्ष इसलिए मारी जा रही हैं कि लोग उन्हें “डायन” और “जादू-टोना” करने वाले मानते हैं। प. बंगाल के 23 जिलों में यही स्थिति है। “हालांकि इन लोगों में जादू-टोना और भूत-चुड़ैल, डायन की मान्यता सदियों पुरानी है लेकिन प्रगतिवादी कहलाने वाली वाममोर्चा सरकार इन अंधविश्वासों को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने के लिए कोई गंभीर कदम क्यों नहीं उठाती? महाश्वेता देवी और अनुराधा कपूर दोनों सवाल खड़ा करती हैं। अनुराधा स्पष्ट रूप से कहती हैं, “सरकार ने इस ओर कभी गंभीरता से नहीं सोचा, न कोई प्रभावी अभियान चलाया, क्योंकि उसे डर है कि अगर ऐसा किया तो वह जनजातियों का राजनीतिक समर्थन खो सकती है। इसलिए उन्हें रूढ़ियों के इस अंधकार में ही रहने दिया जाए।” दूसरी ओर राज्य की पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री बिलासीबाला साहीस का दावा है कि सरकार ने इन क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार किया है, जिसके चलते इस तरह की घटनाओं में पिछले कुछ वर्षों में कमी आयी है। हालांकि वे स्वीकार करती हैं कि जनजातीय लोगों का जीवन स्तर सुधारने और उन्हें इस तरह के अंधविश्वासों से बाहर निकालने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।37