14 अगस्त आते ही हम विभाजन को याद करते हैं, और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि 1947 केवल भारत के राजनीतिक विभाजन का वर्ष नहीं था बल्कि वह करोड़ों मनुष्यों के जीवन में ऐसी हिंसक उथल-पुथल लेकर आया था जिसमें घर, परिवार, संपत्ति, स्मृतियाँ और कभी-कभी स्वयं जीवन तक एक राजनीतिक निर्णय के सामने असहाय हो गए थे; हम लाहौर और अमृतसर की रक्तरंजित गलियों को याद करते हैं। उन रेलगाड़ियों को याद करते हैं जो मनुष्यों को लेकर निकली थीं और लाशों को लेकर पहुँचीं, उन स्त्रियों को याद करते हैं जिनके शरीर को साम्प्रदायिक प्रतिशोध का मैदान बना दिया गया। उन बच्चों को याद करते हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया, लेकिन इसी स्मृति के भीतर एक ऐसी कहानी है जिसके बारे में हमने अपेक्षाकृत कम बात की है—सिन्ध की कहानी, उस हिन्दू समाज की कहानी जिसे किसी विभाजित गाँव या आधी बची हुई भूमि से नहीं, बल्कि पूरे के पूरे अपने प्राचीन भूगोल से विस्थापित होना पड़ा।
सिन्ध केवल नदी नहीं, सभ्यता की पहचान है
मैं इस इतिहास को केवल एक शोधकर्ता के रूप में नहीं देखता, बल्कि एक हिन्दू के रूप में देखता हूँ, और शायद इसी कारण सिन्ध का प्रश्न मेरे लिए केवल जनसंख्या का प्रश्न नहीं रह जाता, क्योंकि जिस सिन्धु नदी के नाम से मेरी सभ्यता का एक प्राचीन परिचय जुड़ा है, जिस भूभाग ने भारतीय सभ्यता की स्मृति में इतनी गहरी छाप छोड़ी है, उसी भूभाग से बीसवीं शताब्दी में हिन्दुओं को अपने घर छोड़कर उस भारत की ओर आना पड़ा जिसे वे अपना सुरक्षित आश्रय समझते थे; इसलिए जब मैं अपने सामने यह प्रश्न रखता हूँ कि “जिस सिन्धु के नाम से हमारा नाम पड़ा, उसी सिन्धु की भूमि हम क्यों नहीं बचा पाए?”, तो यह प्रश्न किसी एक समुदाय के विरुद्ध आरोप नहीं है, बल्कि हमारी अपनी ऐतिहासिक चेतना, हमारी राजनीतिक असफलताओं और हमारी सभ्यतागत दुर्बलताओं के सामने खड़ा किया गया एक असहज प्रश्न है, जिससे बच निकलना आसान नहीं होना चाहिए।
सिन्ध की त्रासदी को समझने के लिए सबसे पहले उस एक तथ्य को समझना होगा जिसे हम अक्सर सामान्य समझकर आगे निकल जाते हैं—सिन्ध पंजाब की तरह दो हिस्सों में नहीं बँटा था; पूरा सिन्ध पाकिस्तान में चला गया है, क्या उसे वापस ले पाएंगे? पंजाब के हिन्दू और सिखों के लिए विभाजन का अर्थ यह था कि सीमा उनके खेतों, गाँवों और शहरों के बीच से निकल गई और इस ओर उनका एक भूभाग बचा रहा, लेकिन सिन्ध के हिन्दू के सामने स्थिति कहीं अधिक कठोर थी, क्योंकि उसके सामने ऐसा कोई “भारतीय सिन्ध” नहीं था जहाँ वह अपने पुराने घर की निकटता में रह सके; उसका पूरा प्रान्त ही उस नए राष्ट्र का हिस्सा बन गया था जो धार्मिक आधार पर निर्मित हो रहा था, और इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं था कि “हमारा घर किस तरफ रह गया”, बल्कि प्रश्न यह था कि “अगर पूरा सिन्ध ही उस तरफ चला गया, तो हमारा अपना पक्ष आखिर कहाँ है?”
ऐसे ही अचानक नहीं हो गया था बंटवारा
और सबसे विचित्र बात यह थी कि यह सब 15 अगस्त 1947 की सुबह एक ही झटके में नहीं हुआ, क्योंकि सिन्ध का हिन्दू समाज उस समय अपने घरों में ही था, अपनी दुकानों में था, अपने व्यापार में था, अपने मंदिरों में था, अपने मोहल्लों में था और अपने पड़ोसियों के बीच रह रहा था। बहुत से लोगों ने शायद यही सोचा होगा कि राजनीतिक सत्ता बदल गई है, देश बदल गया है, लेकिन जीवन तो चलता रहेगा, क्योंकि मनुष्य अपने घर को तब तक छोड़ने की कल्पना नहीं करता जब तक परिस्थितियाँ उसे यह विश्वास करने के लिए मजबूर न कर दें कि घर अब सुरक्षित नहीं रहा, और शायद यही कारण है कि सिन्ध का पलायन हमें एक ऐसे क्रम के रूप में दिखाई देता है जिसमें पहले भरोसा टूटता है, फिर भय आता है, फिर हिंसा और लूट की घटनाएँ सामने आती हैं, फिर संपत्ति असुरक्षित होती है और अंततः वह क्षण आता है जब एक परिवार यह निर्णय करता है कि जमीन, दुकान और मकान बाद में देखे जाएँगे, पहले बच्चों को बचाना है।
भारत सरकार द्वारा प्रकाशित विभाजन-विभीषिका से संबंधित सामग्री में 6 जून 1947 के जैकोबाबाद, 17 दिसंबर 1947 के हैदराबाद और 6 जनवरी 1948 के कराची की साम्प्रदायिक हिंसा का उल्लेख मिलता है; हैदराबाद की घटना में 27 लोगों की मृत्यु और 16 लोगों के घायल होने तथा कराची की हिंसा में 122 लोगों के मारे जाने और 219 लोगों के घायल होने के समकालीन विवरण दिए गए हैं, जबकि इसी व्यापक असुरक्षा और हिंसक वातावरण के बीच सिन्ध से निकलने वालों की संख्या नवंबर 1947 तक लगभग ढाई लाख, जनवरी 1948 तक लगभग 4.78 लाख और जून 1948 तक दस लाख से अधिक पहुँच गई थी।
स्थानांतरण, प्रवास और पुनर्वास जैसे शब्द उचित नहीं
अब यहीं हमें एक बार रुककर सोचना चाहिए कि दस लाख का अर्थ वास्तव में क्या है, क्योंकि जनगणना की भाषा में दस लाख केवल एक संख्या है, जबकि जीवन की भाषा में दस लाख का अर्थ दस लाख ऐसे निर्णय हैं, जिनमें किसी ने अपना घर छोड़ा, अपनी संपत्ति छोड़ी, अपना परिचित संसार छोड़ा और उस भविष्य की ओर चला जिसके बारे में उसे स्वयं निश्चितता नहीं थी; हम इसे “प्रवास” कह सकते हैं, “स्थानांतरण” कह सकते हैं, “पुनर्वास” कह सकते हैं, लेकिन क्या इन शब्दों में उस भय की पूरी सच्चाई आती है जिसमें एक परिवार अपने बच्चों को लेकर निकलता है और पीछे वह घर छोड़ देता है जिसमें उसके पिता पैदा हुए थे, उसके दादा रहते थे और जिसकी दीवारों में उसके परिवार की कई पीढ़ियों की स्मृतियाँ बसी हुई थीं? और दूसरी बात, ये दस लाख ही केवल पोहोच पाए, बाकी कितने ही काटे गए, मारे गए, धर्मांतरित किए गए, इसकी यादें और इसका इतिहास कहा है ?
यही कारण है कि मुझे “प्रवास” शब्द कभी-कभी बहुत छोटा लगता है, क्योंकि प्रवास सुनते ही ऐसा लगता है कि किसी व्यक्ति ने अपनी सुविधा, अवसर या इच्छा के अनुसार स्थान बदला, जबकि विभाजन के समय सिन्धी हिन्दू के सामने जो परिस्थिति थी वह कहीं अधिक जटिल थी; वहाँ हिंसा थी, लूट थी, भय था, संपत्ति के असुरक्षित हो जाने का संकट था और धीरे-धीरे यह बोध पैदा हो रहा था कि जिस राजनीतिक व्यवस्था में वह अब रह रहा है उसमें उसके समुदाय का भविष्य सुरक्षित नहीं दिखाई दे रहा, इसलिए वह चला गया—अपना जीवन बेहतर बनाने के लिए नहीं, बल्कि अपने जीवन और अपने परिवार को बचाने के लिए।
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हिन्दू महिलाओं का अपहरण, बलात्कार और कन्वर्जन
और यहाँ इतिहास का एक और कठोर पक्ष सामने आता है, जिसे हमें भावनात्मकता के नाम पर बढ़ा-चढ़ाकर भी नहीं लिखना चाहिए और राजनीतिक सुविधा के कारण छिपाना भी नहीं चाहिए; विभाजन के पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दू, सिख और स्त्रियाँ अपहरण, बलात्कार, जबरन विवाह, हिंसा और जबरन धर्म परिवर्तन जैसी भयावह परिस्थितियों का शिकार हुईं, और सिन्ध में भी साम्प्रदायिक हिंसा, भय, लूट और विस्थापन ने हिन्दू समाज को इस स्थिति तक पहुँचा दिया जहाँ अपनी जन्मभूमि में बने रहना बहुत कठिन होता गया। इसलिए यदि हम सिन्ध की कहानी को केवल “लाखों हिन्दू भारत आ गए” कहकर समाप्त कर देते हैं, तो हम वास्तव में उस पूरी प्रक्रिया को छिपा देते हैं जिसने उन्हें वहाँ से निकलने के लिए मजबूर किया था। फिर एक वर्ग यह पढ़कर सामने आएगा – कि क्यूँ ये सब याद किया जाए? जिसका उत्तर आपको ढूंढना है।
यही वह जगह है जहाँ 1941 और 1951 की जनगणना मेरे लिए केवल आँकड़े नहीं रह जाती, क्योंकि एक शोधकर्ता की दृष्टि से दो जनगणनाओं के बीच का परिवर्तन केवल जनसंख्या का परिवर्तन नहीं है; वह हमें यह पूछने के लिए मजबूर करता है कि उन दस वर्षों के भीतर कौन-सी ऐतिहासिक शक्ति काम कर रही थी जिसने एक पूरे समुदाय को उसके पुराने भौगोलिक आधार से अलग कर दिया, और यदि हम जनगणना को केवल प्रतिशत, अनुपात और जनसंख्या वृद्धि की तालिकाओं के रूप में पढ़ेंगे तो हम उसके भीतर छिपी उस मानवीय कहानी को कभी नहीं देख पाएँगे जिसमें हर घटती संख्या के पीछे एक घर था, हर बढ़ती संख्या के पीछे एक विस्थापित परिवार था और हर बदली हुई जनसांख्यिकीय संरचना के पीछे कोई न कोई ऐसा व्यक्ति था जिसने अपनी जमीन को पीछे छोड़ दिया था।
इस अर्थ में जनगणना कभी-कभी मृत्यु प्रमाणपत्र की तरह भी होती है, केवल फर्क इतना है कि वह किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं बल्कि किसी पुराने सामाजिक भूगोल के समाप्त हो जाने का प्रमाण देती है; 1941 हमें बताती है कि लोग कहाँ रहते थे, 1951 हमें बताती है कि वे कहाँ दिखाई देने लगे, लेकिन उन दोनों के बीच जो कुछ हुआ उसे समझने के लिए हमें आँकड़ों के पीछे छिपे जीवन को पढ़ना पड़ेगा, क्योंकि कोई जनगणना यह नहीं लिखती कि किस माँ ने अपने घर की आखिरी चाबी किसे दी, किस पिता ने अपने बच्चे को यह कहकर चुप कराया कि “कुछ दिनों बाद लौटेंगे”, किस परिवार ने अपनी संपत्ति औने-पौने दाम पर छोड़ दी और किस बूढ़े ने यह जानते हुए यात्रा की कि जिस घर में उसने पूरी जिंदगी बिताई, वहाँ अब उसकी वापसी शायद कभी नहीं होगी।
और यहीं से मेरे लिए सिन्ध का प्रश्न और भी गहरा हो जाता है।
हम आखिर कौन हैं?
हम अपने आपको हिन्दू कहते हैं, और ‘हिन्दू’ शब्द की ऐतिहासिक व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में अनेक चर्चाएँ हैं, लेकिन सिन्धु के साथ इस नाम का संबंध हमारी सभ्यतागत स्मृति में इतना गहरा है कि इससे बचा नहीं जा सकता; सिन्धु केवल एक नदी नहीं है, वह उस भूगोल की स्मृति है जिसने भारत को बाहरी दुनिया के सामने पहचान देने में भूमिका निभाई, और इसलिए यह इतिहास का कितना विचित्र और कड़वा व्यंग्य है कि जिस सिन्धु के नाम से हमारी पहचान जुड़ी, उसी सिन्धु की भूमि से उसके हिन्दू निवासी अपने घर छोड़कर भारत आए और अपनी अगली पीढ़ियों को उस भूमि की कहानी सुनाते रहे जिसे वे स्वयं फिर कभी अपना नहीं कह सके।
क्या इससे बड़ा सभ्यतागत प्रश्न कोई हो सकता है?
हम हजारों वर्षों की सभ्यता पर गर्व करते हैं, अपनी सांस्कृतिक निरंतरता पर गर्व करते हैं, अपने इतिहास की प्राचीनता पर गर्व करते हैं और यह भी कहते हैं कि इतने आक्रमणों के बाद भी हमारी संस्कृति बची रही; और यह सब सत्य है, क्योंकि सिन्धी समाज ने भी अपनी भाषा, अपने देवता, अपने संस्कार, अपने व्यापार, अपनी पारिवारिक परंपराएँ और अपनी स्मृतियाँ बचाईं, लेकिन फिर भी इतिहास के सामने हमें यह प्रश्न स्वीकार करना होगा कि सिर्फ जीवित रह जाना पर्याप्त नहीं होता; किसी सभ्यता को अपनी रक्षा करने की राजनीतिक और सामाजिक क्षमता भी चाहिए। यहीं मेरा आक्रोश पैदा होता है।
इतिहास को सामूहिक अपराध में बदलना गलत है
मैं किसी आज के कोई एक वर्ग के विरुद्ध घृणा की बात नहीं कर रहा, क्योंकि इतिहास को सामूहिक अपराध की सरल भाषा में बदल देना उतना ही गलत होगा जितना पीड़ितों की पीड़ा को छिपाना; मेरा प्रश्न उस राजनीति से है जिसने धर्म के आधार पर देश को बाँटा, उस नेतृत्व से है जिसने करोड़ों मनुष्यों के भविष्य को ऐसी अनिश्चितता में धकेला, उस सामाजिक चेतना से है जिसने आने वाले संकट को पर्याप्त गंभीरता से नहीं समझा, और हमसे भी है कि क्या हमने अपने इतिहास से यह सीखा कि किसी सभ्यता के लिए जनसंख्या, भूमि, राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक निरंतरता अलग-अलग विषय नहीं होते, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए प्रश्न होते हैं।
क्योंकि धनवान होना पर्याप्त नहीं था, शिक्षित होना पर्याप्त नहीं था, व्यापार में सफल होना पर्याप्त नहीं था और अपनी संस्कृति से प्रेम करना भी पर्याप्त नहीं था; यदि एक समुदाय अपनी भूमि पर राजनीतिक रूप से असुरक्षित हो जाए और अंततः उसे अपने बच्चों को बचाने के लिए अपनी भूमि छोड़नी पड़े, तो उसकी सफलता की कहानी के भीतर भी एक गहरी विफलता छिपी होती है, और सिन्ध का इतिहास हमें इसी विफलता की ओर देखने के लिए मजबूर करता है।
सिन्धी समाज की पीड़ा
आज हम गर्व से कहते हैं कि सिन्धी समाज ने भारत में आकर सब कुछ फिर से खड़ा कर लिया, और यह गर्व बिल्कुल उचित है, क्योंकि जिन लोगों ने लगभग शून्य से व्यापार खड़ा किया, बच्चों को शिक्षित किया, नए नगर बसाए, मंदिर बनाए और अपनी सामाजिक पहचान को जीवित रखा, उन्होंने वास्तव में असाधारण जीवट दिखाया; लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि हमने उनकी सफलता को इतना जोर देकर बताया कि उनकी पीड़ा कहीं पीछे छूट गई, जबकि हमें दोनों बातें एक साथ कहनी चाहिए—हाँ, उन्होंने फिर से सब बनाया, लेकिन यह भी याद रखो कि उन्हें सब कुछ फिर से बनाना क्यों पड़ा।
जिस आदमी के पास घर था, उसे नया घर क्यों बनाना पड़ा? जिसके पास दुकान थी, उसे फिर से दुकान क्यों खोलनी पड़ी? जिसके पूर्वजों की भूमि थी, उसे दूसरी भूमि पर अपना भविष्य क्यों बनाना पड़ा? जिस बच्चे का जन्म सिन्ध में हुआ था, उसे अपनी जन्मभूमि की तस्वीरें देखकर बड़ा क्यों होना पड़ा? और जिस समुदाय के लिए सिन्ध केवल एक प्रान्त नहीं बल्कि उसकी स्मृति का हिस्सा था, उसे अपनी ही जन्मभूमि का नाम अगली पीढ़ियों को कहानी की तरह क्यों सुनाना पड़ा? इन प्रश्नों से भागकर हम विभाजन को समझ नहीं सकते।
सिन्ध की कहानी का सबसे दुखद हिस्सा शायद यह नहीं है कि हिन्दू सिन्धी भारत आ गए; सबसे दुखद हिस्सा यह है कि उनके बाद की पीढ़ियाँ धीरे-धीरे उस भूमि से इतनी दूर होती गईं कि पहली पीढ़ी को जहाँ अपना घर याद था, दूसरी पीढ़ी को केवल घर की कहानी मिली, तीसरी पीढ़ी को केवल शहर का नाम मिला और चौथी पीढ़ी शायद किसी दिन अपने दादा से पूछती है—“हमारा घर सिन्ध में आखिर कहाँ था?”
यही किसी सभ्यता की स्मृति के क्षीण होने की शुरुआत है। पहले भूमि छूटती है, फिर घर छूटता है, फिर भाषा कमजोर पड़ती है, फिर स्थानों के नाम स्मृति में बदल जाते हैं और अंततः एक दिन मनुष्य अपने ही पूर्वजों की भूमि को मानचित्र पर खोजता है; इसलिए सिन्ध की स्मृति को बचाना केवल अतीत के प्रति भावुकता नहीं है, बल्कि यह समझना है कि सभ्यताएँ केवल पुस्तकों में नहीं रहतीं, वे भूमि, भाषा, परिवार, स्मृति और पीढ़ियों के बीच चलने वाली निरंतरता में जीवित रहती हैं।
14 अगस्त केवल शोक नहीं, आत्मपरीक्षण का दिन है
और इसीलिए 14 अगस्त मेरे लिए केवल शोक का दिन नहीं है। यह आत्मपरीक्षण का दिन है। यह पूछने का दिन है कि हम कहाँ चूके थे। यह पूछने का दिन है कि हमने खतरे को कब पहचाना। यह पूछने का दिन है कि क्या हम अपनी जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को समय पर समझते हैं। यह पूछने का दिन है कि क्या हम भूमि और संस्कृति के बीच के संबंध को केवल भावनात्मक विषय मानते हैं या राजनीतिक वास्तविकता भी समझते हैं। और सबसे बढ़कर, यह पूछने का दिन है कि क्या हम इतिहास को इसलिए याद कर रहे हैं कि हमें किसी से घृणा करनी है, या इसलिए कि हमें अपने भविष्य के लिए कुछ सीखना है।
मुझे दूसरे उत्तर की आवश्यकता है। क्योंकि अपने पूर्वजों के दुःख को याद करने का अर्थ केवल आँसू बहाना नहीं है; उसका अर्थ यह समझना भी है कि वे किन परिस्थितियों में टूटे, किन परिस्थितियों में बचे, किन परिस्थितियों में फिर खड़े हुए और हमें अपने पीछे कौन-सी चेतावनी देकर गए।
आज सिन्ध पाकिस्तान में है। सिन्धु वहीं बहती है। मोहनजोदड़ो वहीं है। कराची वहीं है। हैदराबाद वहीं है। शिकारपुर और सुक्कुर वहीं हैं। वे सड़कें, वे बाजार, वे पुराने मकान और वे मंदिरों के अवशेष भी उस भूमि में आज तक इतिहास की तरह मौजूद हैं, लेकिन जिन लोगों के लिए वह सब केवल पुरातत्व नहीं बल्कि जीवित स्मृति था, उनमें से लाखों लोग अब वहाँ नहीं हैं; उन्होंने उस भूमि को अपने साथ नहीं ला सकते थे, इसलिए उन्होंने उसे अपनी भाषा में, अपने संस्कारों में, अपनी पूजा में, अपने भोजन में, अपने व्यापार में और अपनी संतानों की स्मृति में बचाने की कोशिश की।
यही सिन्धी हिन्दू की महानता है और यही उसकी पीड़ा भी है। उसने सिन्ध खोया, लेकिन सिन्धी होना नहीं खोया। लेकिन क्या हमें केवल इस बात पर संतोष कर लेना चाहिए? नहीं। क्योंकि यदि हम केवल यह कहकर आगे बढ़ जाएँ कि “देखिए, वे बच गए”, तो हम उस इतिहास के सबसे कठिन प्रश्न से बच जाएँगे कि वे वहाँ क्यों नहीं बच सके। और शायद यही वह प्रश्न है जिसे हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों से छिपाना नहीं चाहिए। क्योंकि इतिहास की सबसे बड़ी भूल केवल यह नहीं होती कि हम क्या भूल गए; कभी-कभी सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हमने उस प्रश्न को पूछना ही बंद कर दिया जिससे हमारी अपनी कमजोरी दिखाई देती है।
सिन्ध खोया, सिन्धी होना नहीं
इसलिए इस 14 अगस्त को, जब हम विभाजन की विभीषिका को याद करें, तो सिन्ध को भी याद करें—उस भूमि को नहीं केवल जो आज एक दूसरे देश के भीतर है, बल्कि उस स्मृति को जिसमें लाखों हिन्दू परिवारों के घर, देवालय, दुकानें, खेत, गलियाँ, रिश्ते और पूर्वजों की यादें आज भी जीवित हैं। और फिर एक क्षण के लिए स्वयं से पूछें— जिस सिन्धु के नाम से हमारी पहचान बनी, उसकी भूमि को हम क्यों नहीं बचा पाए? इस प्रश्न का उत्तर शायद आसान नहीं है। शायद हमारे पास इसका पूरा उत्तर आज भी नहीं है।
लेकिन इस प्रश्न को जीवित रखना जरूरी है, क्योंकि जिस समाज में अपने पराजयों को स्वीकार करने का साहस नहीं होता, वह अपनी विजय से भी कुछ नहीं सीखता। और सिन्ध की स्मृति हमें यही सिखाती है कि सभ्यता केवल हजारों वर्षों तक जीवित रहने का नाम नहीं है; सभ्यता का अर्थ यह भी है कि वह अपनी स्मृति, अपनी भूमि, अपने समाज और अपने भविष्य की रक्षा करने की क्षमता रखे।
सिन्ध हमारे लिए इसलिए केवल अतीत नहीं है। वह एक प्रश्न है। और 14 अगस्त को उस प्रश्न से आँख मिलानी चाहिए।
(लेखक डॉ. समीर पाण्डे राजनीतिक विज्ञान एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता, शोधकर्ता और शिक्षक हैं।)











