धर्म-संस्कृति

आज का श्लोक : परिश्रम वह साधन है जो भाग्य को वास्तविकता में बदलता है

सुभाषितम् में पढ़ें आज का श्लोक

Published by
Panchjanya

यह श्लोक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नीति-ग्रंथ ‘हितोपदेश’ (मित्रलाभ प्रकरण) से लिया गया है। (कुछ संस्करणों में यह ‘पंचतंत्र’ या ‘चाणक्य नीति’ से भी संदर्भित मिलता है, लेकिन इसका मुख्य स्रोत हितोपदेश है।)

श्लोक :

न दैवमपि संचित्य त्यजेत् उद्योगमात्मानः।
अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति॥

भावार्थ :

भाग्य के भरोसे निश्चिन्त हो, उद्यम छोड़ बैठने से कार्य सफल नहीं होता। जैसे बिना उद्योग किये तिलों में से तेल प्राप्त नहीं होता, यद्यपि तेल तिलों में ही रहता है।

प्रासंगिकता :

कर्म की प्रधानता: यह श्लोक यह संदेश देता है कि केवल “भाग्य” में भरोसा करके आलसी हो जाना व्यर्थ है। परिश्रम ही वह साधन है जो भाग्य को वास्तविकता में बदलता है।

आधुनिक जीवन में उपयोगिता: छात्रों, प्रतियोगियों और कार्यक्षेत्र में कार्यरत लोगों के लिए यह श्लोक एक महान प्रेरणा स्रोत है। यदि अवसर (तिल) मौजूद हैं, तो भी उन्हें सफलता (तेल) में बदलने के लिए प्रयास (उद्योग) करना ही पड़ेगा।

सकारात्मक दृष्टिकोण: यह श्लोक भाग्यवादिता को नकारता है और मनुष्य को स्वावलंबी तथा आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देता है।

Share

Recent News