
हर वर्ष 14 अक्तूबर को भारतीय मजदूर संघ द्वारा समरसता दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की पुण्यतिथि पर उनके आदर्शों को समाज के समक्ष रखता है। माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी कहते थे, ‘सामाजिक समरसता को समाज में मौजूद अलगाव की भावना को खत्म करके इंसानों के मन में एक साथ रहने और एक-दूसरे के प्रति अपनत्व के भाव को जगाकर ही प्राप्त किया जा सकता है।’ उनके अनुसार सामाजिक भेदभाव को दूर करने और प्रत्येक मनुष्य के मन में व्यापक राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करने के लिए समरसता की अत्यंत आवश्यकता है।
अक्सर देखा जाता है कि लोग समरसता को समानता समझ लेते हैं। यह समझना बहुत आवश्यक है कि समानता और समरसता दो अलग-अलग मायने रखने वाले शब्द हैं। समानता का मुख्य अर्थ यह है कि समाज के सभी वर्गों के लोगों को समान रूप से अधिकार, अवसर तथा सामाजिक परिवेश मिले। उनकी वर्गीय या सामाजिक पहचान के आधार पर उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव न हो। सामाजिक समरसता का सिद्धांत मानसिकता और सामाजिक संबंधों से जुड़ा हुआ है। सामाजिक समरसता यह प्रश्न उठाती है कि क्या हम वास्तव में दूसरे मनुष्यों को अपने समकक्ष मानते हैं? क्या हमारे किए व्यवहारों में उनके प्रति आत्मीयता और सम्मान नजर आता है? क्या विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच घृणा और दूरी की जगह सौहार्द, प्रेम और बंधुत्व की भावना मौजूद है? ठेंगड़ी जी ने भी अपने विचारों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि समाज में समता को स्थापित करने और स्थायी बनाए रखने के लिए समरसता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इसे ऐसे समझा जा सकता है। समता और समरसता, इन दोनों शब्दों के फर्क को इस प्रकार समझा जा सकता है कि किसी संस्थान के सभी कर्मचारियों को पदोन्नति के समान अवसर प्रदान करने का नियम बनाया गया है। यह समानता की दिशा में एक कदम है। लेकिन यदि व्यवहार में कुछ कर्मचारियों को उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण कम समझा जाए या उनके साथ काम करने और बैठने में दूरी रखी जाए, तो केवल नियम बनाने से समरसता स्थापित नहीं की जा सकती। सामाजिक समरसता तभी स्थापित हो सकती है, जब समान अवसर के साथ-साथ व्यवहार में भी बराबर सम्मान और अपनत्व मौजूद हो। इसी कारण से वास्तविक सामाजिक परिवर्तन केवल नियमों या घोषणाओं से संभव नहीं हो सकता और न ही समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संघर्ष पैदा करके स्थायी एकता स्थापित की जा सकती है। इसके लिए सामाजिक चेतना का विकास और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना अत्यंत आवश्यक है।
सामाजिक परिवर्तन के लिए क्यों आवश्यक है समरसता? समता और समरसता को सामाजिक परिवर्तन की एक-दूसरे से जुड़ी पूरक व्यवस्थाओं के रूप में समझना अधिक उचित होगा। समता यह सुनिश्चित करती है कि किसी व्यक्ति के अधिकार और अवसर उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर कम या ज्यादा न हों, वहीं समरसता का उद्देश्य है कि समान अधिकार प्राप्त लोगों के बीच घृणा, अलगाव और सामाजिक दूरी न रहे। इसी संदर्भ में सामाजिक समता की स्थापना और उसे स्थिर बनाए रखने के लिए समरसता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
समरसता के महत्वपूर्ण पक्षों में समाज के उपेक्षित तथा पिछड़े वर्गों को समानता और एकता का अनुभव कराना तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच आपसी सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना शामिल है। किसी भी समाज की महानता केवल इस बात से तय नहीं होती है कि वहां के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं या नहीं। इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि समाज के विभिन्न वर्ग एक-दूसरे को किस दृष्टि से देखते हैं? उनके बीच आत्मीयता, अपनत्व और सम्मान की भावना है या नहीं? क्या सामाजिक विभिन्नताओं के होते हुए भी लोगों को यह महसूस होता है कि वे एक ही समाज के अभिन्न अंग हैं? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में सामाजिक समरसता की अवधारणा सबके समक्ष आती है।
सामाजिक समरसता का अर्थ समाज के सभी लोगों को एक जैसा बना देना नहीं है और न ही इसका अर्थ यह है कि समाज में मौजूद विविधताओं और विभिन्न पहचानों को खत्म कर दिया जाए। अपितु इसका मूल अर्थ यह है कि अनेक विविधताओं के बावजूद लोगों के बीच एकता, सौहार्द, सम्मान और भ्रातृत्व की भावना हमेशा बनी रहे। इस दृष्टि से समरसता केवल एक विचार या सिद्धांत न होकर सामाजिक व्यवहार से जुड़ा हुआ एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
यदि समाज का कोई वर्ग दूसरे विभिन्न वर्गों के प्रति उपेक्षा का व्यवहार करता है, तो केवल कानून बनाने से इसका हल नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए समाज के संबंधों और व्यवहारों में भी सुधार लाना आवश्यक है। समाज के उपेक्षित और कमजोर वर्गों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार को खत्म करके अलग-अलग वर्गों के बीच सामंजस्य तथा सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना समरसता की दिशा में एक मुश्किल, परंतु महत्वपूर्ण कदम होगा।
एक मजबूत और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में केवल यह पूछना कि क्या सभी लोग बराबर हैं, पर्याप्त नहीं है। इसके साथ यह भी जानना आवश्यक है कि क्या हम लोग एक-दूसरे को बराबर मानते हैं और एक-दूसरे के संग समान भावना के साथ व्यवहार करते हैं? क्योंकि समरस समाज की बुनियाद पर ही एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण होता है। भारत जैसे विविधताओं में एकता ढूंढने वाले राष्ट्र में समरसता सबसे मूलभूत आवश्यकता के रूप में सामने आती है।