
कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा दिल्ली में बिना अनुमति किए गए धरने-प्रदर्शन के संबंध में पुलिस द्वारा की गई आवश्यक कार्रवाई को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने जो चिंता व्यक्त की है, उसका कोई महत्व नहीं है। इसको लेकर भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सहित पूरी दुनिया को स्पष्ट और सही संदेश दे दिया है। भारत द्वारा इस संगठन की चिंताओं को खारिज करना जरूरी था। यह अच्छी बात है कि भारत ने स्पष्ट शब्दों में ऐसा किया और साथ ही उसे नसीहत भी दी कि वह अपने दोहरे रवैये को त्याग दे। इस संगठन ने कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की कार्रवाई पर जिस तरह चिंता व्यक्त की है, उससे यही पता चलता है कि वह भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रति किस तरह का रवैया अपना रहा है।
समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है। समस्या यह भी है कि यह संगठन इससे कहीं अधिक गंभीर घटनाओं और मानवाधिकारों के बेरहमी से हो रहे उल्लंघन पर चुप रहना पसंद करता है। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से लोगों का बेरहमी से दमन और शोषण किया जा रहा है। यह सब उस समय हो रहा है, जब वे अपने जायज अधिकारों की मांग कर रहे हैं। अपने अधिकार मांगने वाले लोगों पर बेरहमी से गोलियां चलाई गई हैं, जिनमें कई लोग मारे गए हैं। संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार कार्यालय पाकिस्तान के ही बलूचिस्तान में हो रही घटनाओं के बारे में भी चुप बैठा है। इसी तरह तीन साल से अधिक समय से जेल में बंद और वहां बुनियादी सुविधाओं से वंचित इमरान खान के मामले में भी यह संगठन कुछ कहने की जरूरत नहीं समझता।
बात सिर्फ पाकिस्तान की ही नहीं है। यूरोपीय देशों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा की जाने वाली इससे कहीं अधिक सख्त कार्रवाई में भी इस संगठन को कुछ भी आपत्तिजनक नज़र नहीं आता। यह समझना भी मुश्किल है कि अमेरिका और यूरोप में कानूनी तौर पर रह रहे प्रवासियों के खिलाफ नफरत का जो माहौल बनाया जा रहा है, उस बारे में भी यह संगठन चिंता प्रकट करने के लिए तैयार क्यों नहीं है। हाल ही में फ्रांस में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और स्कूलों तक को जला दिया गया, लेकिन इस संगठन ने कुछ भी नहीं कहा।
ऐसा प्रतीत होता है कि संयुक्त राष्ट्र के इस मानवाधिकार कार्यालय के कर्ता-धर्ताओं ने यह देखना-समझना भी जरूरी नहीं समझा कि भारत के जिस मामले को लेकर उन्होंने चिंता व्यक्त की है, उसका वास्तविक आधार क्या है। उन्हें इतनी जानकारी तो होनी ही चाहिए कि संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग मतदाता सूचियों को शुद्ध करने की एक व्यापक प्रक्रिया चला रहा है, जिसके विरोध में सड़कों पर उतरने वाले लोग गलत प्रचार का अभियान चला रहे हैं। यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि इस प्रक्रिया से संबंधित मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रहा है। इस संगठन ने इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया है कि भारत के बड़ी संख्या में पूर्व नौकरशाह और जज चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को जरूरी और उचित ठहराने में लगे हुए हैं। दुनिया को भारत ने कड़ा और सटीक संदेश दिया है कि किसी भी मुद्दे पर दोहरे मापदण्ड नहीं चल सकते।