
नाना पाटेकर का निधन।
शिवाजी पार्क में नाना पाटेकर जी (नाना साहेब) के घर पर बैठी थी। सुबह-सुबह फोन पर यह खबर फ्लैश हुई, मैं कैसे यकीन कर सकती थी, मुझे तो आज शाम को ही उनसे मिलना था। उनकी मां और परिवार यहीं रहते थे और सुबह उठते ही मैंने उन्हें यहां लगी उनके पूरे परिवार की फोटो प्यार से भेजी, यह बताने के लिए कि हम यहां उनके साथ हैं। दीवार पर राष्ट्रपति (प्रणब मुखर्जी) से नेशनल अवॉर्ड लेते हुए उनकी एक फोटो लगी थी, और कमरे में उनके माता-पिता, बेटे मल्हार और पत्नी नीलकंठी की फोटो थी। बाक़ी एक कमरा, एक रसोई और एक बैठक, हल्का फुलका सामान, बस इतना ही। एक युगांतकारी कलाकार का पुराना घर देखकर, सहज अंदाज लग ही जाता है कि उनके कहने, करने और रहने में कोई भेद नहीं रहा कभी। वो जो दिखते थे सच में उससे भी अधिक ही नहीं, गहरे थे बहुत।
उन्हें आज मुंबई आना था और कल माधुरी दीक्षित के साथ उनका शूट था। अभी हाल ही में वह कह रहे थे कि अब उन्होंने अपना काम कम कर दिया है और उन्हें खेत पर ही काम करने का मन करता है। खेत पुणे में था और उन्हें काम कहां छोड़ता था, सब पीछे-पीछे आता रहा। उन्होंने कई बार कहा कि उनका बेटा और नीलू साथ रहते हैं, इससे ज्यादा और क्या चाहिए। उनकी ये बात याद करते हुए कोविड के तुरंत बाद का वह दौर याद आ रहा है, जब वो कोविड से उबर रहे थे। कुछ तकलीफ तो थी लेकिन कुछ ही दिन में थोड़ा ख़ान-पान ठीक किया और रोज के जिम का रूटीन तो पक्का ही था। सेहत को लेकर बेहद सजग रहे उसके बाद से। मुझे कभी फ़िल्मों के बारे में अगर कहा तो दो बार एक ‘नट सम्राट’ देखने की सलाह दी तब हिंदी में बनाने का विचार था। और एक फ़िल्म ‘दिशा’। किसान और गांव की व्यथा पर बनी इस फ़िल्म में मानवीय व्यवहार के कई पहलू और कई पीड़ाएं एक साथ थीं। जब ‘वैक्सीन वॉर’ में और फिर ‘वनवास’ में बहुत उल्लास और तन्मयता से किया था काम। स्क्रीन प्ले साझा करते थे और शब्दों, डायलॉग्स और किरदारों पर चर्चा में शामिल करते थे। मुझसे कुछ कविताएं लिखवाईं और उन्हें बहुत भावुक अंदाज़ में पर्दे पर कहा। हमें हमेशा लगता था कि अभी एक और मुकाम हासिल करना बाकी है।
उनसे प्रगाढ़ता तो ‘जल-आंदोलन’ के बहाने से हुई। जल पर पाञ्चजन्य ने जो आंदोलन छेड़ा था, उसमें ये पक्ष तो आना ही था कि बड़ी शख़्सियत अगर कोई ऐसा गंभीर मुद्दा उठा ले तो कैसे समस्याएं हल होने लगें। इच्छा तो हमेशा से थी जब से किसानों के लिए काम के बारे में जाना था। जब पहली बार मैसेज किया था, अपना कुछ लिखा हुआ भेजा था, तो इतने खुश हुए कि ख़ुद ही फ़ोन लगाया, पूछा कि तुमने लिखा है? फिर तो सिलसिला चलता रहा। मैं लिखती, भेजती, वो पढ़ते, सराहते। मिलकर तो लगा ही नहीं कि पहली बार मिली, जैसे सदियों की पहचान थी। ऐसे ही वह सबको अपनापन महसूस कराते थे। जब काम के बारे में बात करती तो अनगिनत कहानियां होते हुए भी कहते, हम किसी और के लिए नहीं करते कुछ, हमें ख़ुशी मिलती है ये करने में इसलिए करते हैं बस। कोई बखान नहीं, कोई गुणगान नहीं। उनके लिए लिखे हुए पर कोई टिप्पणी भी नहीं। इतने निर्लिप्त रहे, आत्मश्लाघा से दूर रहे। यही बात मुझे बहुत आकर्षित करती रही। कम बोलना, काम में लगे रहना और अपने दुख को सहेज कर रख लेना। मेरी डायरी में उनके हाथ के बनाये चित्र भी हैं और उनके साथ की यात्राओं की यादें भी।
उनके काम के बारे में पाञ्चजन्य के मंच से कई बार साझा भी किया। इसलिए कि काम से बड़ी उनकी सोच थी, जिसकी साक्षी मैं ख़ुद थी। मैं कहती थी आत्मकथा लिखिए तो टाल देते थे। पुणे में उनके खेत पर ही 75वें जन्म दिवस पर पिछले साल तो जाकर ही आई थी। परिवार से बेहद लगाव, और बेटे मल्हार के लिए हमेशा फिक्र, जीवन भरा पूरा था। बेटे में उनकी पूरी झलक, अच्छाई की, लोगों की फ़िक्र की, दुनिया की हलचल की, किसानों की, ग़रीबों की, फौजियों की, उनके परिवारों की। अपनी संस्था में ट्रस्टी की तरह शामिल किया तो पूरे अधिकार से। कभी कुछ बात यूं छिड़ी तो हमेशा कहते थे, जाने वाले कहीं नहीं जाते। आस-पास ही रहते हैं, इसलिए यही सोचकर जीना होता है। मां के जाने के बाद कहते थे कि मुंबई में अब कुछ नहीं। अपने माता-पिता के नाम से एक ट्रस्ट (निर्मला गजानंद फाउंडेशन) अभी साल भर पहले ही बनाया। उनके कहे कि कभी अवहेलना संभव ही नहीं थी। निर्मला गजानंद फाउंडेशन का लोगो मेरी डायरी के पन्नों पर उतरा सबसे पहले।
ऑपरेशन सिंदूर में अपने सरहद पर परिवार को खोने वालों को राहत देने राजौरी गए थे। मल्हार की अगुवाई में हो रहा था सब। तब रास्ते भर बातें करते रहे। एक फ़िल्म लिख रहे थे, उसकी कहानी सुनाई। और लौटे तो ये कहकर, क्षिप्रा जरा देखना तू यहां और क्या कर सकते हैं महिलाओं के लिए ख़ास तौर से। आ जाना बाद में एक बार और। उसके बाद कुछ महीने पहले ही धौलपुर आए थे किसी शूट के लिए। फोन किया कि कितना दूर हो तुम, अगले ही दिन पहुंच गए। इतने खुश हुए, साथ बैठकर खाना खाया और फिरगानों का दौर जो शुरू हुआ टेबल पर उनकी थाप के साथ वो छाप तो कभी नहीं मिटेगी। बहुत शौक़ीन थे पुराने गीत के, अच्छा साहित्य, स्केच और खाना बनाने के शौक़ीन भी थे। कितनी ही बार उनके हाथ का बना खाया।
अपंग पशुओं के लिए जारी हमारे मिशन ‘कृष्णा लिंब’ के काम को बहुत पसंद करते थे। पूछताछ करते रहते थे हमेशा। पशु-पक्षियों-खेतों-पहाड़ों से बेहद लगाव वाले नाना साहेब की बातचीत में सेहत, खान-पान और आराम की सलाह शामिल रहती थी। माधुरी दीक्षित का मराठी KBC होना था, जिसके लिए हमें कृष्ण लिम्ब की यात्रा को कवर करने के लिए बुलाया गया था। इस काम को आगे लेकर जाने का मल्हार का मन बहुत था। उनके घर कई देसी डॉग्स, गैया सबको प्रेम से पाला हुआ था। आज और कल शूट था उनका यहां। हम यहीं प्रतीक्षा में थे उनकी।…इतना विशाल हृदय, इतना कोमल मन…समंदर की तरह थे वो…कहते थे मुझे बस एक ही से प्रेम है….वो है देश!