भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएं हैं। चुनाव आयोग, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास के प्रहरी माने जाते हैं। इसलिए जब इन संस्थाओं की निष्पक्षता पर राजनीतिक सवाल उठते हैं, तो केवल वर्तमान को देखकर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है। इतिहास में सत्ता और संस्थाओं के बीच बने संबंधों को भी उसी कसौटी पर देखना चाहिए।
आज चुनाव आयोग की नियुक्तियों और उसकी स्वतंत्रता को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठाती है। लेकिन कांग्रेस के लंबे शासनकाल का इतिहास यह देखने का अवसर देता है कि उसके दौर में संवैधानिक एवं जांच संस्थाओं के शीर्ष पदों पर रहे कुछ अधिकारियों को बाद में कौन-कौन से सार्वजनिक, राजनीतिक अथवा संवैधानिक पद मिले।
यहां सवाल किसी व्यक्ति की योग्यता या ईमानदारी का फैसला करना नहीं है। सवाल है—क्या संवैधानिक और जांच संस्थाओं के शीर्ष पदों पर रहे अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक व्यवस्था में नियुक्तियां या सक्रिय राजनीति में प्रवेश संस्थाओं की सार्वजनिक धारणा को प्रभावित कर सकता है?
टी.एन. शेषन: चुनाव आयोग से कांग्रेस के चुनाव मैदान तक
भारत के चुनावी इतिहास में टी.एन. शेषन का नाम महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वे 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका कार्यकाल दर्ज है। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में शेषन ने चुनावी आचार और प्रशासन को लेकर कठोर रुख अपनाया और चुनाव आयोग की भूमिका को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया।
लेकिन, उनके कार्यकाल के समाप्त होने के कुछ वर्ष बाद तस्वीर बदल गई। 1999 के लोकसभा चुनाव में शेषन कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में गांधीनगर से चुनाव लड़े, जहां उनका मुकाबला भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से हुआ। समकालीन रिपोर्टों में उनके कांग्रेस उम्मीदवार बनने का स्पष्ट उल्लेख है। यह घटना किसी भी तरह उनके पूरे कार्यकाल को स्वतः संदिग्ध सिद्ध नहीं करती। लेकिन एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का बाद में किसी प्रमुख राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना निश्चित रूप से उस व्यापक बहस का हिस्सा है कि चुनावी संस्था से जुड़े शीर्ष पदाधिकारियों और सक्रिय राजनीति के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए।
एम.एस. गिल: मुख्य चुनाव आयुक्त से केंद्रीय मंत्री तक
इसके बाद आता है डॉ. एम.एस. गिल का उदाहरण। गिल 12 दिसंबर 1996 से 13 जून 2001 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उनके कार्यकाल में 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव सहित कई महत्वपूर्ण चुनाव हुए। भारत निर्वाचन आयोग ने उनके कार्यकाल और चुनावी योगदान को आधिकारिक रूप से दर्ज किया है। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद गिल की सार्वजनिक भूमिका पूरी तरह अलग दिशा में चली गई। 2004 में वे कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे। समकालीन रिपोर्ट में उन्हें स्पष्ट रूप से “पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और कांग्रेस सदस्य” के रूप में दर्ज किया गया है।
इसके बाद वे केंद्र की कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार में मंत्री बने। यहां भी तथ्य और राजनीतिक निष्कर्ष को अलग रखना जरूरी है। किसी पूर्व चुनाव आयुक्त का चुनाव लड़ना या मंत्री बनना कानूनन अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जब वही व्यक्ति देश की चुनाव व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर रह चुका हो और बाद में किसी राजनीतिक दल के टिकट पर संसद में पहुंचे तथा सरकार में मंत्री बने, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या ऐसी नियुक्तियों के लिए कोई अधिक स्पष्ट नैतिक या संस्थागत मर्यादा होनी चाहिए?
वी.एस. रामादेवी: मुख्य चुनाव आयुक्त से राज्यपाल तक
वी.एस. रामादेवी भारत की पहली महिला मुख्य चुनाव आयुक्त बनीं। उनका कार्यकाल 26 नवंबर 1990 से 11 दिसंबर 1990 तक रहा। चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में यह दर्ज है। बाद में वे राज्यसभा की महासचिव बनीं और फिर हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल तथा उसके बाद कर्नाटक की राज्यपाल रहीं। उनके राज्यपाल पद के कार्यकाल में अलग-अलग राजनीतिक सरकारें सत्ता में थीं, जिनमें आई.के. गुजराल की सरकार और अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा-नीत सरकार भी शामिल थीं। इसलिए रामादेवी के मामले को सीधे कांग्रेस की राजनीतिक नियुक्ति का उदाहरण बताना उचित नहीं होगा।
लेकिन, उनका उदाहरण एक महत्वपूर्ण व्यापक तथ्य सामने रखता है—पूर्व चुनाव अधिकारियों का बाद में संवैधानिक पदों पर जाना भारतीय प्रशासनिक इतिहास में असामान्य नहीं रहा है। इसलिए आज जब नियुक्तियों पर राजनीतिक बहस होती है, तो इतिहास को पूरे संदर्भ के साथ देखना आवश्यक है।
सीबीआई के पूर्व निदेशक अश्वनी कुमार: जांच एजेंसी से राजभवन तक
अब चुनाव आयोग से आगे बढ़कर देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई को देखें। अश्वनी कुमार अगस्त 2008 से नवंबर 2010 तक सीबीआई निदेशक रहे। वे हिमाचल प्रदेश के डीजीपी रह चुके थे और सीबीआई निदेशक बनने वाले हिमाचल कैडर के पहले अधिकारी थे। मार्च 2013 में यूपीए सरकार के दौरान उन्हें नागालैंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया। बाद में उन्होंने कुछ समय के लिए मणिपुर के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला। नागालैंड राजभवन के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका कार्यकाल 21 मार्च 2013 से 1 जुलाई 2014 तक दर्ज है।
उस समय इस नियुक्ति पर राजनीतिक विवाद भी हुआ। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि पूर्व सीबीआई प्रमुख को राज्यपाल बनाना राजनीतिक प्रतिफल जैसा दिखाई देता है। दूसरी ओर तत्कालीन सरकार के प्रतिनिधियों ने आरोप को खारिज करते हुए कहा कि सेवानिवृत्त अधिकारियों की ऐसी नियुक्तियों पर कोई कानूनी रोक नहीं है। इसलिए यहां निष्पक्ष निष्कर्ष यही है कि नियुक्ति तथ्य है, जबकि उसे राजनीतिक प्रतिफल कहना उस समय विपक्ष द्वारा लगाया गया आरोप था।
सीबीआई में यह अकेला उदाहरण भी नहीं था
सीबीआई के सेवानिवृत्त निदेशकों के बाद के पदों पर भी वर्षों से बहस होती रही है। एक विश्लेषण में पूर्व निदेशकों के उदाहरण दिए गए हैं—पी.सी. शर्मा का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से जुड़ना, विजय शंकर का केंद्र-राज्य संबंध आयोग में जाना और अश्वनी कुमार का राज्यपाल बनना। इसी प्रकार 2012 में सीबीआई निदेशक अमर प्रताप सिंह के सेवानिवृत्ति के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में सदस्य बनने की खबरें सामने आई थीं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि सेवानिवृत्त जांच अधिकारियों को बाद में संवैधानिक या वैधानिक संस्थाओं में जिम्मेदारी मिलना केवल एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित विषय नहीं है।
असली सवाल कांग्रेस बनाम भाजपा का नहीं
इन उदाहरणों को सामने रखने का उद्देश्य यह कहना नहीं होना चाहिए कि किसी अधिकारी की बाद की नियुक्ति अपने आप उसके पूर्व कार्यकाल को गलत साबित करती है। ऐसा निष्कर्ष तथ्यों से आगे निकल जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ यह कहना भी उचित नहीं होगा कि ऐसी घटनाओं पर सवाल ही नहीं उठने चाहिए। लोकतंत्र में संस्थागत निष्पक्षता केवल वास्तविक निष्पक्षता का विषय नहीं, बल्कि उसकी सार्वजनिक धारणा का भी विषय है।
यदि चुनाव आयोग का कोई पूर्व प्रमुख बाद में किसी राजनीतिक दल का उम्मीदवार बनता है, यदि कोई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त बाद में राजनीतिक दल से राज्यसभा पहुंचकर मंत्री बनता है, या किसी जांच एजेंसी के पूर्व प्रमुख को सेवानिवृत्ति के बाद राज्यपाल बनाया जाता है, तो इन घटनाओं पर पारदर्शी सार्वजनिक चर्चा लोकतंत्र के हित में है। आज कांग्रेस चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की बात करती है। यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इसी के साथ इतिहास यह भी याद दिलाता है कि सत्ता में रहते हुए संस्थाओं के साथ व्यवहार और विपक्ष में रहते हुए संस्थागत स्वतंत्रता की मांग—दोनों के बीच समान मानदंड होना चाहिए।
इतिहास का आईना
टी.एन. शेषन का कांग्रेस उम्मीदवार बनना, एम.एस. गिल का कांग्रेस से राज्यसभा पहुंचकर केंद्र सरकार में मंत्री बनना और अश्वनी कुमार का सीबीआई निदेशक के बाद राज्यपाल बनना—ये अलग-अलग परिस्थितियों की घटनाएं हैं। इन्हें एक ही रंग में रंगना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। फिर भी ये उदाहरण एक साझा प्रश्न जरूर खड़ा करते हैं—क्या चुनाव आयोग, सीबीआई और अन्य संवेदनशील संस्थाओं के शीर्ष पदों पर रहने वाले अधिकारियों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर अधिक स्पष्ट और पारदर्शी आचार-संहिता होनी चाहिए?
यदि इस प्रश्न का उत्तर आज खोजा जा रहा है, तो उसका उत्तर केवल आज की राजनीति में नहीं, बल्कि पिछले दशकों के अनुभवों में भी तलाशना होगा। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं है कि कोई एक दल दूसरे दल के पुराने उदाहरण गिनाकर अपनी वर्तमान स्थिति को सही साबित कर दे। लोकतंत्र की मजबूती तब होगी जब सत्ता में कांग्रेस हो, भाजपा हो या कोई अन्य दल—चुनाव आयोग और जांच संस्थाओं की स्वतंत्रता के लिए एक समान मानदंड लागू हो। इतिहास का आईना सबके लिए एक जैसा होना चाहिए। यही संस्थागत निष्पक्षता की असली कसौटी है।











