तमिलनाडु

Explainer: तमिलनाडु में RTI से बाहर हुआ पब्लिक लॉ एंड ऑर्डर डिपार्टमेंट, क्या होगा इसका असर?

तमिलनाडु सरकार ने पब्लिक (लॉ एंड ऑर्डर) विभाग को RTI एक्ट 2005 से बाहर कर दिया। जानें विभाग के काम, फैसले का कारण और जनता पर पड़ने वाले प्रभाव।

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कुलदीप सिंह

तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया है। पब्लिक (लॉ एंड ऑर्डर) डिपार्टमेंट को सूचना के अधिकार यानी आरटीआई एक्ट, 2005 के दायरे से बाहर कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह विभाग खुफिया और सुरक्षा से जुड़ा संगठन है, इसलिए इस पर आरटीआई लागू नहीं होगी।

यह आदेश ह्यूमन रिसोर्सेज मैनेजमेंट डिपार्टमेंट ने जारी किया। इसे सरकारी गजट में नोटिफाई कर दिया गया है। आदेश 21 सितंबर का है और आरटीआई एक्ट की धारा 24(4) के तहत निकाला गया है। इस धारा में राज्य सरकारों को अधिकार है कि वे अपने खुफिया और सुरक्षा संगठनों को आरटीआई से मुक्त कर सकें।

विभाग क्या-क्या काम देखता है

यह विभाग राज्य में कानून-व्यवस्था से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों को संभालता है। इसमें सांप्रदायिक और जातिगत झगड़े शामिल हैं। कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर जांच आयोगों की नियुक्ति और उनकी सिफारिशों पर आगे की कार्रवाई भी यहीं होती है।

सीओएफईपोसा और नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए) के तहत हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़े सभी मामले इसमें आते हैं। हिरासत में लिए गए लोगों की याचिकाएं, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दायर हेबियस कॉर्पस पिटीशन भी यहीं देखी जाती हैं। हर महीने कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठकें और चीफ सेक्रेटरी के निर्देश पर विशेष बैठकें भी इस विभाग के काम हैं।

पुलिस द्वारा फायरिंग के मामलों की जांच रिपोर्ट, पुलिस हिरासत में मौतें, पुलिस टॉर्चर और रिमांड कैदियों की मौतों की रिपोर्ट भी यहां आती हैं। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (एनएचआरसी) से जुड़े रेफरेंस भी इसी विभाग के पास जाते हैं।

सरकार ऑफ इंडिया को कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक घटनाओं की मासिक रिपोर्ट भेजना, लोकसभा-राज्यसभा के सवालों के जवाब तैयार करना, छात्रों, किसानों और राजनीतिक दलों के आंदोलन संभालना, राजनीतिक आधार पर दर्ज मामलों को वापस लेने के अनुरोध देखना—ये सब भी इसी विभाग के काम हैं। मानहानिकारक लेख, न्यूज आइटम या भाषणों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी भी यहां से दी जाती है।

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फैसले का जनता पर नकारात्मक असर

आरटीआई एक ऐसा कानून है जिससे आम आदमी सरकारी कामकाज की जानकारी मांग सकता है। अब इस विभाग से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों की जानकारी आसानी से नहीं मिल पाएगी। पुलिस हिरासत में मौत या टॉर्चर की जांच रिपोर्ट अब आरटीआई के जरिए नहीं मांगी जा सकेगी। सांप्रदायिक या जातिगत झगड़ों से जुड़े दस्तावेज, आंदोलनों के दौरान हुई कार्रवाई की डिटेल भी छिप सकती है। एनएसए या सीओएफईपोसा के तहत हिरासत में लिए गए लोगों के मामले में पारदर्शिता कम हो जाएगी।

मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर भी असर पड़ेगा। हालांकि कानून में प्रावधान है कि भ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों वाली जानकारी पूरी तरह बाहर नहीं की जा सकती, लेकिन प्रक्रिया जटिल हो जाती है। राज्य सूचना आयोग की मंजूरी लेनी पड़ती है और समय भी ज्यादा लगता है।

सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार या आम नागरिक जो पहले आसानी से जानकारी ले सकते थे, अब वे इन संवेदनशील मामलों में सरकारी जवाबदेही पूछने में दिक्कत महसूस करेंगे। राजनीतिक आधार पर दर्ज केस वापस लेने या आंदोलनों से जुड़े फैसले भी अब कम पारदर्शी रह सकते हैं। इससे कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में जनता का भरोसा प्रभावित होने की आशंका रहती है। सरकार ने इस विभाग को खुफिया और सुरक्षा संगठन बताते हुए छूट दी है। इससे विभाग के कई काम आरटीआई की पहुंच से बाहर हो गए हैं।

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