
इलाहाबाद हाई कोर्ट
भारत को गजवा—ए—हिंद बनाने का सपना देखने वाले कट्टरवादी तत्व हिंदू युवाओं और युवतियों को ऐसी पट्टी पढ़ा रहे हैं कि ये युवा अपने ही परिवार और धर्म के विरोधी बन जा रहे हैं। इनकी मति इस तरह मार दी जा रही है कि ये युवा न तो अपने वृद्ध माता—पिता की बात मान रहे हैं और न ही अपने समाज की। यदि परिवार वाले थोड़ी सख्ती करते हैं, तो ये लोग अपने नए आकाओं के बल पर अदालत तक पहुंच जाते हैं। अदालत भी इन्हें वयस्क मानकर कह देती है कि ये ‘बड़े’ हो गए हैं और उनकी मर्जी पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। इसके बाद तो परिवार वालों के पास रोने के अलावा कुछ बचता ही नहीं है।
गत 6 अगस्त को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक ऐसे ही पिता की आंखें उस समय छलक गईं, जब न्यायालय ने उन पर अपनी दो बेटियों को कथित रूप से बंधक बनाने के आरोप में 12 लाख रुपए का जुर्माना लगा दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि वह भी अदालत में 12 लाख रुपए जमा कराए। यानी कुल मिलाकर अदालत में 25 लाख रुपए जमा किए जाएं। यह पैसा कथित रूप से बंधक बनी दो बहनों को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
जिन पिता पर जुर्माना लगा है, उनका नाम है— अनिल कुमार भाटिया। उन पर उनकी बेटियों अंशु भाटिया उर्फ अमीना (आयु लगभग 35 वर्ष) और दीया भाटिया उर्फ जोया (आयु 20 वर्ष) ने आरोप लगाया था कि उन्होंने उन दोनों को कैद कर रखा है। अंशु और दीया की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर हुई थी। उसका निपटारा करते हुए न्यायालय ने उपरोक्त आदेश दिया। यही नहीं, न्यायालय ने इस मामले को संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताते हुए कहा, ”दीया भाटिया उर्फ जोया दीया भाटिया और अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया को प्रतिवादी संख्या 4 (लड़कियों के पिता) या किसी अन्य व्यक्ति या राज्य और उसके पदाधिकारियों के किसी भी हस्तक्षेप के बिना, अपनी पसंद के किसी भी स्थान पर और किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र घोषित किया जाता है।” जब अदालत ने ही लड़कियों को स्वतंत्र घोषित कर दिया तो अब वे दोनों अपने परिवार को बिलखता छोड़कर तब्लीगी जमात में चली गई हैं। यानी पूरी तरह मुसलमान बनकर इस्लाम का प्रचार—प्रसार कर रही हैं।
अनिल कुमार भाटिया आगरा के रहने वाले हैं। इन दिनों वे अपनी दोनों बेटियों की करतूतों के कारण काफी परेशान हैं। परेशानी दूर करने के लिए वे कभी आगरा, कभी प्रयागराज तो कभी दिल्ली की दौड़ लगा रहे हैं। लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश ने उनकी परेशानी को और बढ़ा दिया है। वे कहते हैं, ”अपनी बेटियों को बचाने के लिए वे सर्वोच्च न्यायालय तक जाएंगे।” उनका कहना है कि तब्लीगी जमात से जुड़े कुछ लोगों ने उनकी बेटियों को बहका दिया है।
आगरा के सामाजिक कार्यकर्ता दिग्विजयनाथ तिवारी कहते हैं, ”अनिल कुमार भाटिया के साथ जो हो रहा है या आगे जो होने वाला है, वह हर उस हिंदू पिता के लिए चिंता की बात है, जिनके पास बेटियां हैं। सोचिए, जिस परिवार की दो बेटियां घर से निकल जाएं और विरोध करने पर परिवार वालों पर ही मुकदमा करें, उस परिवार पर क्या बीत रही होगी।”
अनिल कुमार भाटिया द्वारा 4 मई, 2025 को सदर थाना, आगरा में दर्ज कराई गई एफआईआर (0228) के अनुसार, अंशु और दीया 24 मार्च, 2025 को घर से अचानक गायब हो गईं। उसी दिन उन दोनों की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई। इसके बाद पुलिस के साथ ही घर वाले भी उन दोनों को ढूंढने में लगे रहे। करीब दो महीने के बाद अनिल कुमार भाटिया के मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी आया। वह ओटीपी आधार कार्ड में नाम परिवर्तन से जुड़ा था। उससे पता चला कि वे दोनों कोलकाता के एक मुस्लिम—बहुल इलाके में हैं। जानकारी मिलते ही आगरा पुलिस कोलकाता गई। उनके साथ अनिल कुमार भाटिया भी थे। पुलिस दोनों बहनों को आगरा ले आई। उनके साथ तीन आरोपी भी आगरा लाए गए।
इसके साथ ही पुलिस ने छापा मारकर अन्य छह राज्यों में भी सात आरोपियों को गिरफ्तार किया। इन सबको 19 जुलाई, 2025 को आगरा जेल भेज दिया गया। कागजी कार्रवाई के बाद पुलिस ने दोनों बहनों को 20 जुलाई, 2025 को उनके घर वालों को सौंप दिया। इसके बाद वे दोनों बहनें पूरी स्वतंत्रता के साथ घर में रहने लगीं। उन पर कोई पाबंदी नहीं थी। वे दोनों उच्च शिक्षित हैं। इस कारण दोनों ने अपने घर ही मोहल्ले के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाना शुरू कर दिया। ऑनलाइन पढ़ाने के लिए इन दोनों ने मोबाइल भी लिया। शायद घर वालों से यही गलती हो गई।
इसी दौरान दिल्ली में रहने वाले कुंवर सुल्तान अली से उन दोनों बहनों का ऑनलाइन संपर्क हुआ। उसने उन दोनों को फिर एक बार भड़काया और उन्हें सलाह दी कि पिता की कथित कैद से मुक्त होने के लिए उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगाओ। इसके बाद उसी ने 27 जुलाई, 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दोनों बहनों की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगाई। अपनी याचिका में दोनों बहनों ने अपने वकील के माध्यम से आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस की मदद से उन्हें अवैध रूप से कैद में रखा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध कार्य किया था। वहीं अनिल कुमार भाटिया के वकीलों ने कहा कि यह मामला कन्वर्जन से जुड़ा है। यह उत्तर प्रदेश में 2021 में बने ‘गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम’ का खुला उल्लंघन है। इस पर दोनों बहनों के वकील ने तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश का गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 इस मामले में लागू नहीं होता है, क्योंकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि धर्म परिवर्तन बल, धोखाधड़ी, दबाव या छल के माध्यम से किया गया है।
30 जुलाई, 2026 को न्यायालय ने सुनवाई करते हुए आगरा पुलिस को आदेश दिया कि 6 अगस्त, 2026 को अदालत में दोनों बहनों को हाजिर किया जाए। आदेशानुसार पुलिस उन्हें लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहुंची। न्यायाधीश संदीप जैन की एकल पीठ ने इसकी सुनवाई की। न्यायालय ने कहा कि 35 और 20 वर्ष की आयु की दोनों बहनें वयस्क हैं और अपने धर्म, निवास स्थान और व्यक्तिगत मामलों के बारे में निर्णय लेने की अधिकारी हैं।
अनिल कुमार भाटिया के वकील जगदीश कुमार उर्फ जगन सिंह ने बताया, ”हम लोगों ने अदालत से कई बार निवेदन किया कि यदि उन दोनों बहनों ने इस्लाम कबूल कर लिया है, तो प्रमाण दें कि कहां किया, किस काजी ने कलमा पढ़ाया, किस सरकारी अधिकारी ने प्रमाणपत्र जारी किया! लेकिन अदालत ने हमारी एक नहीं सुनी और निर्णय सुना दिया।” वे यह भी कहते हैं, ”यह निर्णय एकल पीठ का है। अब न्यायालय से निवेदन किया जाएगा कि इसे दो सदस्यीय पीठ को सौंपा जाए। अगर इसके बाद भी संतोषजनक निर्णय नहीं आएगा तो सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी, क्योंकि यह निर्णय बहुत ही असाधारण है। इससे कन्वर्जन को बढ़ावा मिलेगा और अब तक जो आरोपी जेल में हैं, वे बाहर भी आ सकते हैं।” बता दें कि इस मामले में अब तक 19 लोग पकड़े गए हैं और इन सबकी जमानत याचिका आगरा जिला न्यायालय ने खारिज कर दी है। अब ये जमानत के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के चक्कर लगा रहे हैं।
एक बार फिर दिग्विजयनाथ तिवारी कहते हैं, ”हिंदू अपनी बेटियों को पढ़ाएं जरूर, लेकिन उसके साथ ही उन्हें अपने धर्म और संस्कृति की भी जानकारी दें, ताकि कोई उन्हें मजहब के नाम पर भटका न सके।”