हाल के वर्षों में भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्रों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। अचानक हुए इस परिवर्तन के कारण सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां के कान खड़े हो गए हैं। यह परिवर्तन सामरिक व जनसांख्यिकीय दृष्टि से भी अति संवेदनशील हैं। इनमें से अधिकतर मस्जिद और मदरसा बिना वैध दस्तावेजों और सरकारी अनुमति के संचालित हो रहे हैं। इन मस्जिदों और मदरसों का निर्माण नेपाल की सीमा से 15 किलोमीटर के दायरे में रहा है। इसके अलावा सीमा के बीच की खाली जमीन जिसे नो मैंस लैंड कहा जाता है। वहां भी अनधिकृत तौर पर बड़े पैमाने पर मस्जिदों और मदरसों का निर्माण चिंता का सबब बनता जा रहा है।
अवैध मदरसों को विदेशों से हवाला के जरिए फंडिंग
इससे संबंधित कई अन्य सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवालों में सीमावर्ती क्षेत्रों के कई गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों और मस्जिदों को विदेशों या हवाला के माध्यम से मिल रही आर्थिक का है। क्या किसी ख़ास योजना के तहत इन अवैध मस्जिदों और मदरसों का निर्माण करवाया जा रहा है? आने वाले समय में यह परिवर्तन भारत के सुरक्षा मानकों पर भी सवाल खड़े कर सकता है। अगला सवाल है कि क्या गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों और मस्जिदों के मार्फत सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलाव की लम्बी और दूरगामी सोची समझी योजना पर काम किया जा रहा है। सीमावर्ती इलाकों में इन धार्मिक संस्थाओं के तेजी से फैलने से स्थानीय जनसांख्यिकी में हुए बदलाव और असंतुलन आंतरिक सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा रही है।
प्रशासन लगातार ले रहा एक्शन
इन अवैध निर्माणों के खिलाफ प्रशासनिक और सरकारी कार्रवाई भी चल रही है। नेपाल सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के जिलों श्रावस्ती, बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज और लखीमपुर खीरी में प्रशासन ने अवैध निर्माणों के खिलाफ बड़े पैमाने पर बुलडोजर कार्रवाई और सीलिंग अभियान चलाकर विधिसम्मत कार्रवाई किया है। बिना मान्यता के चल रहे मदरसों और सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थलों को चिन्हित कर नोटिस जारी किए गए तथा कई अवैध ढांचों को ध्वस्त किया गया है।
विदेशी घुसपैठ बनी चुनौती
नेपाल से जुड़े जानकारों का मानना है कि नेपाल में मधेश आंदोलन के बाद प्रदान की गई नागरिकता में विदेशी घुसपैठियों के कारण तराई में धार्मिक सुरक्षा चुनौती बनती जा रही है। भारत-नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा से घुसपैठ की समस्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। भारत नेपाल सीमा पर बने मस्जिदों और मदरसों में पाकिस्तान, बांग्लादेश और दूसरे मुस्लिम देशों के कट्टरपंथियों को अविगढ़ ढंग से ठहराया जा रहा है और उसके बाद उन्हें नागरिकता प्रदान करवाने का जबरदस्त प्रयास करवाया जा रहा है।
अभी पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के बनाने के बाद बड़े पैमाने पर हुई घुसपैठियों पर कार्रवाई के कारण भी बड़े पैमाने पर ये भागकर सीमावर्ती इलाको में शरण ले रहे हैं और सीमावर्ती इलाकों की जनसंख्यिकी बदलती जा रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और देश के अन्य राज्यों से भी अवैध रोहिंग्या और बांग्लादेशियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बाद ये सीमावर्ती इलाकों को अपना अगला आश्रय बना रहे हैं। सीमावर्ती इलाकों में उन्हें इस तथ्य का ज्ञान है कि जब भारत की एजेंसी कार्रवाई करेगी तो नेपाल की तरफ भाग जायेंगे और नेपाल में कार्रवाई होगी तो भारत में आ जायेंगे।
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पाकिस्तान-तुर्की खौफनाक साजिश
एक गोपनीय सुरक्षा रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान तुर्की के सहयोग से भारत के सीमावर्ती इलाको में मस्जिदों, मदरसों, अनाथालयों और इस्लामिक सांस्कृतिक केंद्रों का तेजी से विस्तार कर रहा है। तराई में मस्जिदों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय है क्योंकि इनकी संख्या में बेहताशा वृद्धि हो रही है। तराई क्षेत्र में वर्ष 2018 में 760 मस्जिदें थीं 2021 में लगभग डेढ़ गुना बढ़कर 1,000 से अधिक हो गया हैं । इसके ही समानांतर तराई इलाको में मदरसों की संख्या भी में बेहताशा वृद्धि दर्ज़ करते हुए 508 से बढ़कर 645 हो गया हैं।
नेपाल के सुदूर गावों में भी मस्जिद और मदरसों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। नेपाल में मस्जिदों और मदरसों के मार्फत तुर्किये और अन्य देशों के सहयोग से पिछले समय में नेपाल में मतांतरण एक प्रमुख समस्या बनकर उभरी है। हिंदू गरीब आबादी इससे सीधे प्रभावित हो रही पर है।












