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मजहब ऊपर, बाकी सब बेमानी

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि मुसलमान किसी भी दल के स्थायी या बंधे-बंधाए वोट बैंक नहीं हैं। यह विश्लेषण है आक्षेपण नहीं हैं

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Jun 30, 2026, 10:43 pm IST
in विश्लेषण

छद्म पंथनिरपेक्षता के लिए यह आत्मावलोकन और आत्मनिरीक्षण का अमृतकाल है। भारतीय राजनीति ने 2014 से जो करवट लेनी शुरू की, उसने निर्वाचन परिणामों के चले आ रहे मिथक तोड़ दिए हैं। दो महत्वपूर्ण निष्कर्षों पर अब गौर करना जरूरी हो गया। पहला यह कि वामपंथ, समाजवाद और छद्म पंथनिरपेक्षता का चोला ओढ़े बैठी पार्टियों को भी अब ये महसूस होना चाहिए कि मुसलमान वोट किसी का वफादार नहीं है। उसका वोट, उनका एजेंडा और कभी न खत्म होने वाली तुष्टीकरण की लिप्सा से जुड़ा एक राजनीतिक व रणनीतिक हथियार है। दूसरा ये कि अब थोक मुस्लिम वोट जीत की गारंटी नहीं रहा।

डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारतीय राजनीति का एक सच बेबाकी से बयान कर दिया था। उनका कहना था, मुसलमान वोट सिर्फ मुसलमान वोट है, जबकि हिंदू वोट जातियों का वोट है। आजाद भारत की संसदीय राजनीति के इस सच को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने बदल डाला है। यही कारण है कि मुस्लिम तुष्टीकरण के जरिए सत्ता की चाह रखने वाले राजनीतिक दल आज दिवालिया हो चुके हैं, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल, दिवालिया होने के बावजूद भी क्या वे इस सच से आंख मिलाने को तैयार हैं।

भारतीय मुसलमानों में मुगल राज के पतन के बावजूद ऐतिहासिक रूप से एक श्रेष्ठता बोध रहा। रियासतदारों से लेकर सियासतदानों तक अपने शासक होने का दंभ था। जिसे आप आज तुष्टीकरण कहते हैं, वह वास्तव में मुस्लिम अल्पसंख्यकवाद है। 1857 की क्रांति के बाद से मुसलमान यह समझ चुके थे कि उनकी हुकूमत अब वापस नहीं आने वाली। साथ ही ब्रिटिश भी ये समझ चुके थे कि मुसलमानों की आकांक्षा और मनोविज्ञान राज करने का है।

इसलिए उन्होंने मुसलमानों को उनकी मजहबी पहचान और अतिरिक्त अधिकार की चाबी भरनी शुरू कर दी, कांग्रेस ने जवाबी अल्पसंख्यकवाद से इसे और मजबूत कर दिया, कमाल की बात है कि चाहे ब्रिटिश साम्राज्य हो या कांग्रेस, दोनों ने ही मुसलमानों के हितों और मांगों को बहुसंख्यक (यानी हिंदू) आकांक्षा के ऊपर स्थान दिया, आगा खान, नवाब मोहसिन-उल-मुल्क आदि मुस्लिम नेताओं ने 1906 में वायसराय लॉर्ड मिंटो से मुलाकात की, जिसे शिमला डेपुटेशन के नाम से जाना जाता है, इन नेताओं ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र, आबादी से अधिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक महत्व के आधार पर आरक्षण की मांग की।

मिंटो ने इन हिंदू विरोधी मांगों को स्वीकार किया, इसी वर्ष 30 दिसंबर 1906 को ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, कांग्रेस ने लीग को कांग्रेस के मुकाबले एक अलग धारा के रूप में बढ़ावा दिया। 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधार (इंडियन काउंसिल्स एक्ट) ने मुसलमानों को अलग निर्वाचन क्षेत्र दिए, केवल मुसलमान ही मुस्लिम सीटों पर वोट दे सकते थे। यह वह घटना थी, जिससे मुसलमानों को ये विश्वास हो गया कि वे अपनी नाजायज मांगें एकजुट होकर, धमकी के दम पर पूरी करा सकते हैं।

तुष्टीकरण की नींव

मुस्लिम नेतृत्व तब तक द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के लेकर मैदान में उतर चुका था। कांग्रेस समझ चुकी थी कि जो नाजायज और श्रेष्ठताबोध से प्रेरित अलगाववादी मांगों को स्वीकार करेगा, मुसलमान उसके रहेंगे। यहां से शुरू हुआ मुस्लिम तुष्टीकरण आज तक कांग्रेस के सिर पर बैठा है। यही अल्पसंख्यकवाद (तुष्टीकरण) 1916 के लखनऊ पैक्ट के रूप में सामने आया। कांग्रेस ने मुसलमानों के अलग निर्वाचन और मुस्लिमों के वेटेज (यानी हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण) को स्वीकार कर लिया। इस तरह मुस्लिम तुष्टीकरण का सुरसानुमा मुंह खुल चुका था। यह एक मांग पूरी होते ही, दूसरी के लिए खुलता रहा, और आज तक मुंह खोले खड़ा है।

विभाजन के बाद भी जारी सिलसिला

देश बंट गया, और फिर कांग्रेस ने पंथनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर तुष्टीकरण या मुस्लिम अल्पसंख्यकवाद की अपनी पुरानी परंपरा को जारी रखा। जिस मुस्लिम लीग के नेताओं ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया, उनमें से तमाम भारत में रह गए और संविधानसभा में पहुंच गए। पाकिस्तान बनाने की मांग का समर्थन करने वाले, आधारस्तंभ समझे जाने वाले 27 मुस्लिम लीग सदस्य संविधानसभा में बने रहे। एक उदाहरण देखिए। बेगम एजाज रसूल मुस्लिम लीग की मुख्य नेता थी। विभाजन का आधार बने 1945-46 के निर्वाचन में इन्होंने ही जिन्ना जिंदाबाद का नारा दिया, लेकिन ये भारत का भविष्य तय करने वाली संविधान सभा में एकमात्र मुस्लिम सदस्य के रूप में मौजूद थीं, उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ले ली।

1997 के इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया कि वह भारत में क्यों रुक गई थीं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में रहकर भी उनका उद्देश्य यही था कि यहां रहने वाले मुसलमानों के लिए अलग क्षेत्र बनाने में मदद की जाए। तमाम मुस्लिम लीग के सदस्य बंटवारे के बाद कांग्रेसी हो गए और कांग्रेस ने भी इन्हें हाथों-हाथ लिया, संविधान सभा में भी इन्होंने निहायत बेशर्मी से मुसलमानों के लिए अलग पहचान, अलग निर्वाचन, अल्पसंख्यक अधिकार, पर्सनल लॉ की मांगें उठाई।

शरिया के आधार पर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार जैसे मसलों पर मुसलमानों ने पर्सनल लॉ हासिल कर लिया। हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल आ गया। अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 30 के तहत विशेष अधिकार दे दिए गए, इन्हें सरकारी सहायता का अधिकार तो मिल गया, लेकिन कोई सरकारी नियंत्रण न रहा, जबकि बहुसंख्यक समुदायों के संस्थान सरकारी नियंत्रण में आ गए, इंदिरा गांधी तो अपने पिता से भी आगे निकल गईं। सिर्फ तुष्टीकरण और हिंदू पहचान को खत्म करने के लिए संविधान की प्रस्तावना में ही पंथनिरपेक्षता को घुसा दिया। इसी के साथ पंथ निरपेक्षता शब्द मुस्लिम तुष्टीकरण का हिजाब बन गया।

हिंदू पुनर्जागरण की दस्तक

अयोध्या में राम जन्मभूमि के शिलान्यास के साथ ही भारत में हिंदू पुनर्जागरण काल की शुरुआत हुई। वर्ष 1906 से चले आ रहे मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ हिंदू जनमानस करवट बदलने लगा। रामजन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत के साथ ही मुसलमानों में एक अलग किस्म की बेचैनी फैली, इस देश के अल्पसंख्यकवाद को, मुसलमानों को और पंथनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले दलों के लिए यह बिल्कुल नई बात थी कि हिंदू अपने आराध्य, अस्मिता और अधिकारों के लिए उठ खड़ा हुआ है, चूंकि शिलान्यास में राजीव गांधी शामिल थे, इसलिए मुसलमानों को कांग्रेस पर संदेह होने लगा, उन्होंने एक पल न सोचा कि कांग्रेस ने उनके लिए हिंदुओं को हमेशा हाशिए पर रखा, वे सीधे बोफोर्स आंदोलन से निकले ज्यादा मुस्लिम परस्त राजनीतिक दलों की गोद में जा बैठे, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव (जो गर्व से बताते थे कि वे दोबारा भी रामभक्तों पर गोली चलवा सकते हैं) और बिहार में लालू प्रसाद यादव (जो अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि रथयात्रा के दौरान लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी को मानते हैं) उनके नई मसीहा हो गए।

राजनीतिक रूप से अति महत्वपूर्ण इन दोनों राज्यों से कांग्रेस ऐसी विदा हुई कि कभी सत्ता में न लौट सकी। मुसलमानों ने कांग्रेस से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया। अब कांग्रेस वहीं मुसलमानों के लिए विकल्प रह गई, जहां उनके पास कोई अन्य ज्यादा मुस्लिम परस्त विकल्प नहीं था। यह ठीक वैसा ही है, जैसा मुसलमानों ने एक बार आजादी से पहले मुस्लिम लीग के लिए कांग्रेस के साथ किया था।

केंद्र में जब-जब कांग्रेस की सरकार रही, उसने मुसलमानों का दिल दोबारा जीतने के लिए जो कुछ हो सकता था, करने का प्रयास किया। पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार के समय 1991 में ‘प्लेसस ऑफ वर्शिप एक्ट’ पास हुआ। यह विवादित धार्मिक स्थलों की स्थिति को 15 अगस्त 1947 की तारीख पर रोक देता है। यह हिंदुओं को मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा छीने अपने देव एवं आराध्यस्थलों को वापस लेने से रोकने की कोशिश थी।

सोनिया गांधी के निर्दोशों से चलने वाली मनमोहन सिंह सरकार के समय में 2006 में सच्चर समिति की रिपोर्ट आई। यह हर संसाधन पर मुसलमानों को प्राथमिकता देने का बेशर्म प्रयास था। खुद प्रधानमंत्री रहते मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है।

भारत में राजनीति का एक गुट मुस्लिम वोटों की खींचतान का बन गया। कांग्रेस, तृणमूल, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, द्रमुक, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, आज की उधव शिवसेना, वामपंथी पार्टियों समेत तमाम सेक्युलर दल पंथ निरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम मतों की ठेकेदारी पर दावा करते रहे। इस बेशर्मी से कि मानो हिंदू वोट की उन्हें जरूरत ही नहीं, ‘मुसलमान खतरे में’ है इसका नैरेटिव तैयार होता रहा। कभी सीएए और एनआरसी के नाम पर इन दलों और देश की कानून-व्यवस्था को मुसलमान आंख दिखाते रहे, इस कदर मुस्लिम परस्ती कि संविधान में दलितों, पिछड़ों को जो आरक्षण की व्यवस्था है, वह भी ये दल मुसलमानों को बांट देना चाहते हैं। पंथ निरपेक्षता और मुस्लिम अल्पसंख्यकवाद का ऐसा तमाशा, जिसमें आतंकवादियों की पैरवी और उनके मुकदमे वापस लेने जैसे कृत्य भारत में हुए।

लेकिन मुसलमान वोटर का एजेंडा साफ है, उनकी कभी खत्म न होने वाली मांगें, विशेष दर्जे की चाहत, और गजवा-ए हिंद की जाहिर आकांक्षा पर जो कथित सेक्युलर दल खरा नहीं उतरता, वह उसकी नजर से उतर जाता है। इसी के चलते ज्यादा मुस्लिम परस्त और ज्यादा पंथनिरपेक्ष दिखाने की होड़ विपक्षी दलों में रही। लेकिन अब मिथक टूट रहे हैं, अब सिर्फ मुस्लिम वोट और हिंदुओं में किसी जाति का वोट पाकर चुनाव नहीं जीता जा सकता।

बदलता चुनावी गणित

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा उत्तर प्रदेश में पहले ही समाजवादी पार्टी के मुस्लिम-यादव समीकरण को ध्वस्त कर चुकी है, ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि मुस्लिम के जवाब में हिंदू पहचान अब जातियों के वोटबंदी से ऊपर उठ रही है, जातीय ध्रुवों में बंटी बिहार की राजनीति में भी पिछले चुनाव में कमोबेश यही पैटर्न नजर आया। भारतीय जनता पार्टी, जद (यू) के गठबंधन को मुस्लिम वोटों की खींचतान के बीच जातिविहीन हिंदू वोट प्राप्त हुआ।

हरियाणा में मुस्लिम मत कम हैं, लेकिन महाराष्ट्र चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में गठबंधन की बंपर जीत इसी का नतीजा है, पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव में भी यही हश्र हुआ है, मुसलमानों के दम पर हिंसा की खुलेआम धमकी देने वाली, दिल में काबा और आंखों में मदीना रखने वाली तृणमूल कांग्रेस मुसलमान मतों को एकमुश्त पाकर भी बुरी तरह हार गई। इस हार के बाद उन्हें एक और चोट लगी, कुल 31 मुस्लिम विधायक इस बार तृणमूल के टिकट पर जीते, लेकिन इनमें से 18 तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर बागी खेमे में चले गए और नए गुट को विधानसभा में मान्यता भी मिल गई है, शायद ममता बनर्जी को अब ये समझ आ रहा होगा कि वामपंथी दलों को दशकों तक वोट देने वाले मुस्लिम वोटर ने उनके पक्ष में पलटी क्यों मारी थी और उन्हें आगे क्या नजर आ रहा है, हालांकि पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी दक्षिण काली मंदिर में दर्शन करती पाई गईं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव बड़े मंगल की बधाइयों के बीच हिंदू धार्मिक चिह्न ट्वीट कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल राम मंदिर के दर्शन कर रहे हैं। यह दिखावा हो सकता है, कोई इसे सॉफ्ट हिंदुत्व कह सकता है। लेकिन यह हकीकत है। भारतीय राजनीति अब अल्पसंख्यकवाद या यूं कहें कि मुस्लिम मतों की ठेकेदारी और उनके दम पर राज करने की प्रवृति से बाहर आ रही है।

Topics: मुस्लिम वोट बैंक‘मुस्लिम तुष्टीकरणCAAराम जन्मभूमि आंदोलनपाञ्चजन्य विशेषहिंदू वोटछद्म पंथनिरपेक्षतानरेंद्र मोदीद्वि-राष्ट्र सिद्धांतमुस्लिम लीगचुनावी गणितडॉ. राममनोहर लोहियाशिमला डेपुटेशनNRCलखनऊ पैक्टमुस्लिम मतदातासच्चर समिति रिपोर्ट
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