सिरमौर जौनसार घाटी: उत्तराखंड और हिमाचल में यमुना की सहायक टोंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना के निर्माण की राह अब आसान हो रही है l 660 मेगावाट क्षमता की इस परियोजना के निर्माण की जद में उत्तराखंड के नौ गांव और हिमाचल के आठ गांव आएंगेl
इस परियोजना से 1379 मिलियन यूनिट बिजली का सालाना उत्पादन होगा l करीब छह हजार लोगों को अपना गांव छोड़ना होगा l
85 साल पहले एक सपना देखा गया
हालांकि, अब भी यह सपना अधूरा है जिसके पूरा होने की उम्मीद गृह मंत्री अमित शाह ने दिखाया है, कई बार दो राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पहल हुई l लेकिन फिलहाल, अब भी यह परियोजना हकीकत से दूर है जिस पर पिचके पखवाड़े में दिल्ली में उत्तराखंड और हिमाचल के सीएम की मीटिंग में बड़ा अहम फैसला हुआ हैl
हम बात कर रहे हैं किशाऊ डैम परियोजना की, जो कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में प्रस्तावित है l गौर रहे कि किशाऊ एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध होगा और टिहरी डैम नंबर एक पर है, जिसकी उंचाई 260 मीटर हैl
कितना पुराना है ये प्रोजेक्ट
दरअसल, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून जिले की सीमा पर साल 1940 में किशोऊ बांध परियोजना के बारे में पहली बार विचार आया था l उस समय ये क्षेत्र महा पंजाब का हिस्सा था और दूसरी ओर यूपी का हिस्सा था। पंजाब सरकार ने 1944-45 में प्रोजेक्ट साइट पर सर्वे शुरू किया l हालांकि, साल 1946 में सरकार ने कई कारणों से सर्वे को रोक दिया l फिर करीब 16 साल तक यह सर्वे ठंडे बस्ते में पड़ा रहा l
उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 1962 में सर्वे दोबारा शुरू किया और 1965 में प्रोजेक्ट की शुरुआती प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई गई l इस प्रोजेक्ट रिपोर्ट में कहा गया कि डैम की ऊंचाई 235 होगी l सरकार ने रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी और 1965 में इस प्रोजेक्ट को पंचवर्षीय योजना में शामिल किया गया l
आर्क डैम बनाने का सुझाव
परियोजना की डीपीआर का अवलोकन करने के बाद जल कमीशन ने महसूस किया कि किशाउ गांव के पास परियोजना में गड़बड़ी है और सुझाया गया कि रॉकफिल डैम के बजाए आर्क डैम बनाया जाए l उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग की तरफ से 1970 में फिर दोबारा सर्वे शुरू किया गया l 1978 में डीपीआर बनाई गई और रॉकफिल डैम का प्रस्ताव केंद्रीय जल कमीशन को सौंपा गया l हालांकि, कमीशन ने फिर डीपीआर को देखकर माना कि रॉकफील डैम के लिए यह साइट सही नहीं है l
इसमें जियोग्राफिकल परेशानियां है और ऐसे में कमीशन ने किशाऊ गांव के पास इस परियोजना की साइट को खारिज कर दिया और कहा कि अटाल, संभरखेड़ा और मोराड़ के पास साइट का चयन किया जाए l इसके बाद संबरखेड़ा की साइट को 236 मीटर ऊंचा बांध बनाने के लिए सही पाया गया l
1965 में इस परियोजना को पंचवर्षीय योजना में शामिल किया
सरकार ने रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी और 1965 में इस प्रोजेक्ट को पंचवर्षीय योजना में शामिल किया गयाl किशाऊ बांध परियोजना की वेबवसाइट के अनुसार, संबरखेडा स्थान के लिए 1988 में डीपीआर बनाई गई, जो कि दोबारा 1998 में उत्तर प्रदेश सरकार ने रिवाइज की और केंद्रीय जल आयोग को सौंपी गईl अब हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सरकार की तरफ से इस प्रोजेक्ट की देखरेख की जा रही है क्योंकि उत्तराखंड उत्तर प्रदेश से अलग राज्य बन चुका है। इसे लेकर 2017 में किशाऊ बांध कोर्पोरेशन लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई गई l फिलहाल, अब भी इस परियोजना की साइट को लेकर विशेषज्ञ मंथन जारी है l
किशाऊ बांध परियोजना किस नदी पर बन रही है ?
किशाऊ बांध परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है l जो कि हिमाचल और उत्तराखंड को विभाजित करने वाली बड़ी नदी है। जमुना में ये नदी हरीपुर कालसी में जमुना जी में जाकर मिल जाती है। इस परियोजना से 660 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा l इस परियोजना के बनने से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को फायदा होगा l
किशाऊ बांध परियोजना पर कितना खर्च आएगा ?
किशाऊ बांध परियोजना के लिए करीब 11500 करोड़ रुपय़े की लागत आएगी हालांकि, इसमें अलग से भी काफी खर्चें होंगे l
2018 में केंद्रीय जल आयोग ने इसकी 11500 करोड़ लागत का अनुमान लगाया था l हालांकि, अब 2026 में यह लागत करीब 15000 करोड़ पहुंच गई है, करीब 236 मीटर ऊंचा यह बांध प्रस्तावित है l
किशाऊ बांध परियोजना से क्या फायदा होगा ?
किशाऊ बांध परियोजना से 97076 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था होगी l साथ ही पीने के लिए 617 MCM पानी उपलब्ध होगा l गौर रहे इस परियोजना में उत्तराखंड की 1452 हेक्टेयर और 1498 हेक्टेयर जमीन हिमाचल प्रदेश की डूब क्षेत्र में आ जाएगी l योजना के चलते उत्तराखंड के 9 गांव और हिमाचल के 8 गांव पानी में डूब जाएंगे, और दोनों राज्यों के कुल 5484 लोग प्रभावित होंगे l
किशाऊ बांध परियोजना क्यों अटकी थी ?
हिमाचल प्रदेश में बीती भाजपा सरकार ने योजना में 800 करोड़ खर्च करने की हामी भरी थी l लेकिन अब अमित शाह के साथ मीटिंग में सीएम सुक्खू अपनी शर्तें मनवाने में कामयाब हुए हैं और आठ साल से चल रहा वित्तीय विवाद सुलझ गया है l ऐसे में अब हिमाचल प्रदेश परियोजना में पैसा खर्च नहीं करेगा.दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा हिमाचल की 2,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत को वहन करेगा l वहीं, हिमाचल और उत्तराखंड को बिजली से सालाना आय होगी और 100 करोड़ बिजली यूनिट भी मिलेंगी l इसी मुद्दे पर बीते 8 साल से बात अटकी थी l
कब तक बन पाएगा बांध ?
इस परियोजना के लिए फिलहाल 8.10 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं और परियोजना का आगाज होने के बाद 96 महीने में इसे पूरा करने की डेडलाइन है l जून 2015 में हिमाचल और उत्तराखंड सरकार के बीच अनुबंध हुआ था l इस परियोजना में करीब 32 किमी लंबी झील बनेगी l जिससे पर्यटन भी बढ़ेगा, गौर रहे कि इस परियोजना का वामपंथी और जनजाति संगठन विरोध भी लोग कर रहे हैं l उल्लेखनीय है कि ये जौनसार और सिरमौर घाटी जनजाति बाहुल्य क्षेत्र है।
जानकारी के मुताबिक फरवरी 2026 में हिमाचल सरकार ने इस परियोजना में आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था और सीएम सुक्खू ने कहा था कि हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा बांध का लंबित एरियर नहीं मिला है और ऐसे में वह इस परियोजना में आगे नहीं बढ़ेंगे l हालांकि, गौर रहे कि 2008 में इस प्रोजेक्ट को नेशनल प्रोजेक्ट का दर्जा दिया गया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा में शामिल है। गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हुई बैठक में हिमाचल की कांग्रेस शासित सहित राजस्थान हरियाणा दिल्ली यूपी और उत्तराखंड बीजेपी शासित राज्यों ने इस प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया है जिसके बाद से जौनसार और सिरमौर घाटी में खासी हलचल देखी जा रही है।













