क्या केरल सरकार-वामपंथी न्यायालय से भी बड़े हैं? आरएसएस के कार्यक्रम में कुलपतियों की मौजूदगी पर विवाद क्यों?
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क्या केरल सरकार-वामपंथी न्यायालय से भी बड़े हैं? आरएसएस के कार्यक्रम में कुलपतियों की मौजूदगी पर विवाद क्यों?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अब भी लगाए जा रहे आरोप, जबकि न्‍यायालय साफ कर चुका, कोई भी जा सकता है संघ के कार्यक्रमों में

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jun 15, 2026, 06:14 pm IST
in संघ @100, केरल
संघ शताब्दी वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति

संघ शताब्दी वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति

केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी समारोह में तीन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की उपस्थिति को लेकर जिस तरह राजनीतिक विवाद खड़ा किया जा रहा है, उसने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या कांग्रेस और वामपंथी दल आज भी संघ को उसी राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, जिसे न्यायालय और केंद्र व कई राज्‍य सरकारें वर्षों पहले खारिज कर चुकी हैं? जब अदालतें स्पष्ट कर चुकी हैं कि आरएसएस पर किसी भी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है, और सरकारी कर्मचारियों तक के लिए उसके कार्यक्रमों में भागीदारी पर लगी रोक हटा दी गई है, तब आखिर विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की मौजूदगी को लेकर इतना हंगामा क्यों?

दरअसल, यह विवाद केरल के जरिए पूरे देश के लिए तीन कुलपतियों की संघ कार्यक्रम में उपस्थिति से अधिक वैचारिक स्वतंत्रता, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अधिकारों की व्याख्या का भी प्रश्न बन गया है। सवाल यह भी है कि क्या किसी व्यक्ति का किसी सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के कार्यक्रम में शामिल होना स्वतः ही उसे पक्षपाती या अयोग्य बना देता है?

इस तरह शुरू हुआ विवाद

विवाद की शुरुआत तब हुई जब तिरुवनंतपुरम में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी समारोह में केरल विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी विश्वविद्यालय और मलयालम विश्वविद्यालय के कुलपति उपस्थित रहे। कार्यक्रम को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संबोधित किया था। कार्यक्रम की तस्वीरें और जानकारी सार्वजनिक होने के बाद केरल की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया।

कांग्रेस और वामपंथी नेताओं ने इसे राज्य की शैक्षणिक परंपराओं और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के विरुद्ध बताते हुए कुलपतियों के आचरण पर सवाल उठाए, लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि कोई कार्यक्रम विधिसम्मत है, उसका आयोजन करने वाला संगठन देश में वैध रूप से कार्यरत है और उस पर किसी प्रकार का कानूनी प्रतिबंध नहीं है, तो उसमें शामिल होना कैसे विवाद का विषय बन सकता है?

मुख्यमंत्री का हमला, लेकिन क्या तर्क पर्याप्त हैं?

केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि कुलपतियों का आरएसएस कार्यक्रम में शामिल होना उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है। उन्होंने दावा किया कि केरल की शैक्षणिक परंपरा लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से जुड़ी रही है तथा किसी वैचारिक संगठन के कार्यक्रम में कुलपतियों की भागीदारी चिंता का विषय है।

मुख्यमंत्री ने यहां तक कहा कि कुलपतियों ने अपने पद की गरिमा को ठेस पहुंचाई है और उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने आरएसएस पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाया, लेकिन इसी के साथ एक बड़ा प्रश्‍न सामने आता है कि क्या किसी संगठन पर राजनीतिक आरोप लगा देने भर से उसके कार्यक्रम में शामिल होना अनुचित हो जाता है? यदि यही मानदंड हो, तो क्या विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े सेमिनारों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक मंचों अथवा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने वाले शिक्षाविदों पर भी यही कसौटी लागू होगी?

वामपंथी विपक्ष भी हमलावर!

विधानसभा में विपक्ष के नेता पिनराई विजयन ने भी इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए आरोप लगाया कि संघ परिवार उच्च शिक्षा क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि कुलपतियों की उपस्थिति ने विश्वविद्यालयों में आरएसएस के बढ़ते प्रभाव को लेकर उठ रही आशंकाओं को और मजबूत किया है। विजयन ने दावा किया कि यह घटनाक्रम धर्मनिरपेक्ष केरल के लिए चिंता का विषय है और इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ राजनीतिक दलों के रुख पर भी सवाल उठाए।

हालांकि यहां भी मूल प्रश्न वही है, क्या किसी कार्यक्रम में उपस्थित होना किसी एजेंडे को स्वीकार कर लेने के समान है? यदि ऐसा है, तो क्या विभिन्न विचारधाराओं के मंचों पर जाने वाले शिक्षाविदों, न्यायविदों और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी यही निष्कर्ष निकाला जाएगा?

जब केंद्र सरकार ने ही हटा दी रोक, तो फिर विवाद क्यों?

इस पूरे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। केंद्र सरकार ने 9 जुलाई 2024 को “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी पर लगी दशकों पुरानी रोक समाप्त कर दी थी।

कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के अधीन कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा जारी आदेश में 1966, 1970 और 1980 के उन पुराने निर्देशों में संशोधन किया गया था, जिनके तहत सरकारी कर्मचारियों के ‘आरएसएस’ की शाखाओं और अन्य गतिविधियों में शामिल होने पर कार्रवाई का प्रावधान था। नए आदेश के बाद सरकारी कर्मचारियों के लिए ‘आरएसएस’ कार्यक्रमों में भागीदारी पर कोई प्रतिबंध नहीं रह गया। यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा विधिवत जारी किया गया और सरकारी नीति का हिस्सा बना।

ऐसे में प्रश्न यह है कि जब स्वयं सरकार इस प्रकार की भागीदारी को वैध मान चुकी है, तब विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की मौजूदगी को लेकर राजनीतिक तूफान खड़ा करने का औचित्य क्या है?

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी ने भी साफ कर दी थी स्थिति

‘आरएसएस’ को लेकर कानूनी स्थिति केवल सरकारी आदेशों तक सीमित नहीं है। वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस गजेंद्र सिंह की खंडपीठ ने कहा था कि केंद्र सरकार को यह समझने में लगभग पांच दशक लग गए कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” जैसे विश्वप्रसिद्ध संगठन को सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधित गतिविधियों की श्रेणी में रखना उचित नहीं था।

न्‍यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार को अपनी गलती का एहसास होने में करीब पचास वर्ष लग गए। न्यायालय ने इस बात पर भी अफसोस जताया कि इतने लंबे समय तक अनेक सरकारी कर्मचारियों की सामाजिक भागीदारी और सार्वजनिक जीवन से जुड़ने की आकांक्षाएं प्रभावित हुईं। कहना होगा कि यह टिप्पणी सिर्फ एक कानूनी अवलोकन नहीं थी, बल्कि इस पूरे विवाद पर व्यापक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करती है।

न्‍यायालय का निर्देश और सरकार की जिम्मेदारी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने आदेश में केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग तथा गृह मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वे 9 जुलाई 2024 के संशोधित आदेश को अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर प्रमुखता से प्रदर्शित करें। अदालत का उद्देश्य स्पष्ट था कि देश के सभी सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों को यह जानकारी मिले कि ‘आरएसएस’ की गतिविधियों में भागीदारी पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो चुका है।

ऐसे में जब न्यायपालिका और सरकार दोनों इस विषय पर स्पष्ट रुख रख चुके हैं, तब केरल में उठ रहे राजनीतिक सवालों की दिशा और मंशा पर भी स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े होते हैं।

क्या वैचारिक असहमति लोकतांत्रिक अधिकारों से बड़ी है?

लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि नागरिकों को विभिन्न विचारों, संगठनों और मंचों से जुड़ने की स्वतंत्रता हो। किसी संगठन से वैचारिक असहमति होना एक बात है, लेकिन उसके कार्यक्रम में शामिल होने मात्र को अपराध या अनुचित आचरण बताना दूसरी बात। यदि ‘आरएसएस’ को लेकर किसी राजनीतिक दल की वैचारिक आपत्ति है तो उसे लोकतांत्रिक विमर्श में रखा जा सकता है। लेकिन क्या केवल वैचारिक विरोध के आधार पर किसी कुलपति की उपस्थिति को पद की गरिमा से जोड़ देना उचित है?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्वविद्यालयों को विचारों के मुक्त आदान-प्रदान का केंद्र माना जाता है। यदि शिक्षाविदों को केवल इसलिए कठघरे में खड़ा किया जाएगा कि वे किसी विशेष संगठन के कार्यक्रम में गए, तो फिर अकादमिक स्वतंत्रता की सीमा क्या रह जाएगी?

आखिर कांग्रेस और वामपंथी किस बात से परेशान हैं?

ऐसे में साफ दिखाई दे रहा है कि केरल में खड़ा हुआ यह विवाद तीन कुलपतियों की उपस्थिति का मामला होने तक सीमित न होकर उस मानसिकता का है जोकि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रति दशकों पुराने राजनीतिक आरोपों को आज भी उसी रूप में दोहराना जारी रखना चाहती है, जबकि न्‍यायालय और सरकारें इससे जुड़ी सभी स्थिति स्पष्ट कर चुकी हैं।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या कांग्रेस और वामपंथी दल स्वयं को न्यायपालिका से ऊपर मानते हैं? यदि न्यायालय यह कह चुका है कि ‘आरएसएस’ जैसे संगठन को प्रतिबंधित श्रेणी में रखना गलत था, यदि केंद्र सरकार भागीदारी पर लगी रोक समाप्त कर चुकी है, तो फिर किसी कार्यक्रम में शामिल होने वालों को कटघरे में खड़ा करने का आधार क्या है?

 

Topics: संघ शताब्दी समारोहआरएसएस कार्यक्रम में कुलपतिमहात्मा गांधी विश्वविद्यालयमलयालम विश्वविद्यालयराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघकेरलकेरल विश्वविद्यालय
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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