जो राष्ट्र ज्ञान का सृजन करता है, वही भविष्य का नेतृत्व करता है। वर्तमान में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का ज्ञान प्राप्त करना महत्वपूर्ण नहीं है, आज विज्ञान प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय शक्ति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा , सामरिक क्षमता और वैश्विक प्रभुत्व के प्रमुख निर्धारक बन चुकी हैं। पिछले एक दशक में भारत में विज्ञान में प्रद्योगिकी क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त की है, चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने वाला पहला देश बनाया है, आदित्य एल 1 सूर्य के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष में स्थापित किया गया, मौसम पूर्वानुमान की क्षमता बड़ी है, सुपर कंप्यूटर का विकास हुआ है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत लगातार आगे बढ़ रहा है। इक्कीसवीं सदी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, जलवायु विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान और उच्च-ऊर्जा भौतिकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के नए क्षेत्र बन चुके हैं।
लेकिन आज भी प्रश्न खड़ा है कि क्या हम वैज्ञानिक रूप से आत्मनिर्भर हैं? रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह है कि भारत को वैज्ञानिक उपकरण बनाने की क्षमता को विकसित करना होगा , मौसम मापने वाले यंत्र, प्रदूषण मापक, समुद्री सेंसर , प्रयोगशाला उपकरण और अनेक उन्नत वैज्ञानिक यन्त्र विदेशो से आयात किए जाते हैं।
क्या है मेगा साइंस विजन-2035
इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय द्वारा मेगा साइंस विजन 2035 कार्यक्रम के द्वारा देश के वैज्ञानिक भविष्य का व्यापक विवरण प्रस्तुत किया गया है, जिसमें जलवायु अनुसंधान, खगोल विज्ञान, उच्च ऊर्जा भौतिक, परमाणु भारत की और अन्य विज्ञान क्षेत्र में तैयार रिपोर्ट इन बातों को रेखांकित करते हैं कि भारत आने वाले समय में वैश्विक वैज्ञानिक परियोजना में केवल भागीदार नहीं रहेगा, वह उनके नेतृत्व करने की क्षमता भी रखेगा। मेगा साइंस विजन 2035 का उद्देश्य भारत के वैज्ञानिक भविष्य की दिशा तय करना , अनुसंधान प्राथमिकताओं की पहचान करना, वैज्ञानिक आधारभूत संरचना विकसित करना ,स्वदेशी तकनीक क्षमता का निर्माण करना, उद्योग और विज्ञान के बीच समन्वय करना और भारत को वैश्विक विज्ञान नेतृत्व की दिशा में अग्रसर करना है।
जलवायु अनुसंधान- आत्मनिर्भरता की आवश्यकता
जलवायु परिवर्तन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है मेगा साइंस विजन 2035 की जलवायु रिपोर्ट बताती कि भारत में भविष्य में बढ़ती गर्मी, अनिश्चित मानसून, बाढ़, सूखा, समुद्र स्तर में वृद्धि और हिमालय ग्लेशियर की पिघलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। मानव गतिविधियों के कारण पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इसका प्रभाव भारत जैसे देशों पर अधिक होगा। भारत को अनेक उपकरणों पर विदेशी निर्भरता है साथ ही विश्वसनीय आंकड़ों की भी कमी है वही दूसरी और पृथ्वी जो भूमि , महासागर और वायुमंडल के जटिल अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता है , यह प्रणाली अमेरिका और यूरोप के मॉडल पर निर्भर है जबकि भारतीय है, हिमालय और हिन्द महासागर विशिष्ट है। अत: स्वदेशी मॉडल विकसित करना होगा।
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पेरिस समझौते को हासिल करने की तरफ भारत
भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के पेरिस समझौते संबंधी लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन विशाल सौर पार्कों के लिए भूमि अधिग्रहण, जैव विविधता पर प्रभाव, स्थानीय तापमान में परिवर्तन तथा पवन ऊर्जा परियोजनाओं का पारिस्थितिक प्रभाव अभी पर्याप्त रूप से अध्ययन का विषय नहीं बने हैं। मेगा साइंस विज़न रिपोर्ट 2035 नवीकरणीय ऊर्जा का विरोध नहीं करती, यह आग्रह करती है कि ऊर्जा संक्रमण वैज्ञानिक निगरानी और पर्यावरणीय मूल्यांकन के साथ आगे बढ़े।
जलवायु परिवर्तन पर्यावरण के साथसाथ मानव स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव डाल रहा है । हीट स्ट्रोक, श्वसन रोग, मलेरिया, डेंगू तथा जलजनित रोगों की बढ़ती घटनाएँ इसका उदाहरण हैं। रिपोर्ट देश में जलवायु एवं स्वास्थ्य वेधशाला स्थापित करने की अनुशंसा की गई है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने मिशन मौसम, भारत पूर्वानुमान प्रणाली (Bharat Forecasting System) ,प्रभाव आधारित पूर्वानुमान (Impact-Based Forecasting), AI आधारित मानसून पूर्वानुमान ,डॉप्लर मौसम रडार नेटवर्क और स्काईकास्ट प्रणाली क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है।
मेगा साइंस विज़न ने 2035 तक आठ प्रमुख राष्ट्रीय परियोजनाओं का प्रस्ताव रखा है, जिनमें उन्नत वेधशालाएँ , समर्पित उपग्रह मिशन ,क्षेत्रीय अनुसंधान अभियान ,स्थल-आधारित निगरानी नेटवर्क , स्वदेशी सेंसर विकास , कार्बन तटस्थता अध्ययन , अनुकूलन विज्ञान और जलवायु लचीलापन निर्माण शामिल हैं। इन परियोजनाओं को समयबद्ध ढंग से लागू किये जाने पर भारत जलवायु विज्ञान में विश्वस्तरीय क्षमता विकसित कर सकता है।
खगोल विज्ञान- ब्रह्मांड को समझने की भारतीय तैयारी
मानव सभ्यता ने हमेशा तारों को देखकर मौसम का अनुमान लगाया और आज हम उन्हीं तारों और आकाशगंगा का अध्ययन कर, वैज्ञानिक ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझने का प्रयास कर रहे हैं। मेगा साइंस विजन 2035 खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी की रिपोर्ट बताती है कि भारत भारत अगले दशक में खगोलीय अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण चलांग लगाने जा रहा है। इसके लिए 30 मीटर टेलीस्कोप परियोजना, स्क्वायर किलोमीटर अरे, लीगो इंडिया, राष्ट्रीय 10 मीटर दूरबीन, राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन आदि से भारत आने वाले समय में अपने प्राचीन गौरव जिसके लिए आर्यभट्ट, भास्कराचार्य ,वराहमिहिर और हमारा वैदिक ज्ञान जाना जाता था, इसकी पुनर्स्थापना हो जाएगी।
उच्च ऊर्जा भौतिक पदार्थ ब्रह्मांड के मूल रहस्य की खोज
उच्च भौतिक हमें सबसे छोटे कणों की दुनिया में ले जाती है, जिससे हमें जानकारी मिलती ब्रह्मांड किससे बना है, पदार्थ कैसे बना, प्रकृति के मूलभूत नियम क्या है ? मेगा साइंस विजन 2035 रिपोर्ट इस क्षेत्र को ऊर्जा सीमा, तीव्रता सीमा ,ब्रह्मांड की सीमा और सैद्धांतिक सीमा जैसे चार भागों में बांटती है। ऊर्जा सीमा वह क्षेत्र जहां वैज्ञानिक हिग्स-बोसॉन की खोज के बाद नई भौतिकी की खोज की तलाश कर रहे हैं ; तीव्रता सीमा के तहत न्यूट्रिनो जैसे अत्यंत सूक्ष्म कणों का अध्ययन किया जा रहा है। ब्रह्मांड सीमा के तहत डार्क मैटर और डार्क एनर्जी को के रहस्य को समझने का प्रयास किया जा रहा है:सैद्धांतिक सीमा के तहत वैज्ञानिक नए सिद्धांत और नई अवधारणाओं के विकास से जुड़े हुए हैं. आज भारतीय वैज्ञानिक CERN,Belle-II, NOvA, DUNE, Hyper-Kamiokande, CTA और IceCube में कार्य कर रहे हैं, लेकिन मेगा साइंस विजन 2035 रिपोर्ट कहती है कि हमें भागीदारी अकेले तक सीमित नहीं रहना है अब भारत को सहयोगकर्ता से नेतृत्वकर्ता बनना है, अर्थात ऐसी परियोजना स्थापित करनी है जिसका नेतृत्व भारतीय वैज्ञानिक करें और विश्व के अनेक वैज्ञानिक इसमें भाग लेने आए।
भारत के समक्ष चुनौतियां
भारत विज्ञान और अनुसंधान पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.6 % से 0 .7% खर्च करता है, जबकि चीन 2.76% ,अमेरिका 3.5% ,इजराइल 6% विज्ञान और अनुसन्धान पर खर्च करता है। इसी कारण भारत की वैज्ञानिक प्रयोगशाला में उपकरण अनुसंधान परियोजना को अपेक्षित संसाधन नहीं मिल पाते हैं। उच्च स्तरीय प्रयोगशाला उपकरणों का लगभग 70 से 80% पैसा आयात होता है, महत्वपूर्ण चुनौती प्रतिभा पलायन है विश्व के बड़े वैज्ञानिक तकनीक मानव संसाधन के उत्पादक हम हैं, सबसे युवा जनसंख्या हमारे पास हैं लेकिन, भारतीय वैज्ञानिक इंजीनियर शोधकर्ता विदेश में कार्यरत हैं। आज भारतीय कई बड़ी-बड़ी कंपनी के सीईओ बने हुए हैं।
आज अमेरिका के विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित में विदेशी मूल के वैज्ञानिकों में भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। यूनेस्को के अनुसार भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 250 से 300 शोधकर्ता हैं, जबकि अमेरिका में 4000 से अधिक दक्षिण कोरिया में 8000 और इजराइल में 8500 है। इससे स्पष्ट है कि भारत को बड़ी संख्या में वैज्ञानिक शोधकर्ताओं की आवश्यकता है। भारत में 1100 से विश्वविद्यालय हैं 50000 से अधिक महाविद्यालय हैं, लेकिन वैश्विक स्तर की शोध संसाधनों की संख्या सीमित हैं।
इसके लिए मेगा साइंस विज़न 2035 पांच बड़े कदम उठाने के लिए कहती है। पहले अनुसंधान एवं विकास पर बजट को वर्तमान स्तर से काफी बढ़ाना होगा, दूसरा वैज्ञानिक उपकरण निर्माण के लिए राष्ट्रीय मिशन स्थापित करना होगा तीसरा विश्वविद्यालय उद्योग और शोध तीनों का त्रिगुट बनाना होगा , नवीन शोध और नवाचार केंद्र को बढ़ावा देना होगा। चौथा विश्वविद्यालय को शिक्षा के साथ-साथ शोध का केंद्र बनाने की आवश्यकता है। पांचवा बड़ी संख्या में वैज्ञानिक अभियंता डाटा वैज्ञानिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आवश्यक और उपकरण डिजाइन में तैयार करने होंगे।
यदि भारत आने वाले दशक में वैज्ञानिक उपकरण निर्माण, जलवायु विज्ञान , कृत्रिम बुद्धिमत्ता , अंतरिक्ष अनुसन्धान और मूलभूत विज्ञान में बेहतर निवेश करता है, तो 2035 विश्व के लिए ज्ञान नवाचार और वैज्ञानिक नेतृत्व का वैश्विक केंद्र बन जाएगा जिससे भारत की आत्मनिर्भर विज्ञान से विश्व नेतृत्व तक भारत की यात्रा होगी।











