पिछले कुछ सालों में एक पैटर्न साफ दिख रहा है कि आज कल के युवा सो कॉल्ड Gen Z फेमस होने के लिए मर्यादा की लाइन क्रॉस कर रहे हैं। चाहे लड़का हो या लड़की, विवाद जितना बड़ा, फॉलोअर्स उतने ज्यादा। इस दौड़ में सबसे ज्यादा नुकसान दो चीजों का हो रहा है — कानून पर भरोसे का और समाज में बराबरी के सिद्धांत का।
हाल ही में जो दो मामले सामने आए जिन्होंने इस बहस को फिर से हवा दे दी। पहला मामला सेजल पवार का है। सेजल एमबीबीएस की छात्रा हैं। उन्होंने एक कॉमेडी शो में जाकर बताया कि कैसे वो और उनकी सहेलियां मेडिकल कॉलेज में प्रैक्टिकल के लिए रखे गए पुरुष शवों के प्राइवेट पार्ट्स पर मजाक करती हैं।
ये शव इसलिए दान किए जाते हैं ताकि डॉक्टर बन रहे छात्र मानव शरीर को समझ सकें। गरिमा और एथिक्स मेडिकल प्रोफेशन की बुनियाद हैं। इस शो के बाद सेजल के इंस्टाग्राम पर 2.44 लाख फॉलोअर्स बढ़ गए। बाद में ट्रोलिंग हुई तो उन्होंने माफी मांग ली और करियर सेट हो गया।
कॉलेज से निष्कासन या कोई कानूनी कार्रवाई की खबर सामने नहीं आई।
दूसरा मामला हिमांशु का है, जिसे सोशल मीडिया ने ‘370 बिरयानी वाला’ नाम दे दिया। हिमांशु एक लड़की को सहमति से पार्क ले गया। बाद में उसने लड़की से ₹370 की बिरयानी का पैसा वसूलने की बात कही, जोकि बहुत ही गलत है। वीडियो वायरल हुआ और नतीजतन हिमांशु को नौकरी से निकाल दिया गया। उसे जमकर ट्रोल किया गया, नैतिकता के पाठ भी पढ़ाए गए।
दोनों घटनाओं में संवेदनहीनता थी। दोनों में सार्वजनिक मंच का इस्तेमाल हुआ। पर समाज और सिस्टम की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं थी। सेजल पवार केस में माफी को फुल स्टॉप मान लिया गया। कहा गया ‘दोबारा नहीं होगी गलती’ और मामला खत्म। फॉलोअर्स बढ़ गए, पॉडकास्ट शुरू हो गए। यानी गलती करके भी करियर बन गया। लेकिन हिमांशु और उसके दोस्तों के केस में माफी की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। सीधे ‘कैरेक्टर सर्टिफिकेट’ जारी कर दिया गया। नौकरी गई, इज्जत गई, भविष्य दांव पर लग गया।
शो चलाने वाले और प्लेटफॉर्म भी बराबर के गुनहगार
सवाल यह भी है कि क्या ₹370 वसूलना और शवों की गरिमा तोड़ना दोनों ही संवेदनहीनता थी तो माफी का हक सिर्फ उन्हीं को क्यों जिनके पास कैमरा और फॉलोअर्स हैं? सेजल पवार वाले मामले में होस्ट प्रणित मोरे की चुप्पी पर सवाल क्यों नहीं उठ रहे। ठीक वैसे ही ‘370 बिरयानी’ केस में भी जिन्होंने वीडियो को वायरल किया, मसाला लगाकर चलाया, उन पेज-चैनलों की जवाबदेही बनती है। किसी की निजी बातचीत को एडिट करके, ‘कंटेंट’ बनाकर करोड़ों व्यूज बटोरे गए। यूट्यूब, इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम ने इसे पुश किया क्योंकि इसमें ‘ड्रामा’ था। प्लेटफॉर्म ने नहीं सोचा कि इससे उस लड़के की जिंदगी पर हमेशा के लिए डिजिटल दाग रह जाएगा। जब सरकार या समाज से जुड़ी सच्चाई लिखो तो ये प्लेटफॉम रीच घटा देते हैं लेकिन जब किसी की इज्जत उछालनी हो, तो वही एल्गोरिदम वीडियो को ट्रेंडिंग में डाल देता है। ये दोहरापन कब रुकेगा?
प्रणित मोरे की अकाउंटेबिलिटी पर सवाल क्यों नहीं?
अकाउंटेबिलिटी सबसे पहले प्रणित मोरे की ही बनती है। मंच उसका, शो उसका और माइक भी उसका। तो एडिट करके वीडियो अपलोड भी उसी की टीम ने किया होगा। जब आपके मंच पर कोई संवेदनशील या गलत बात बोली जा रही है, तो होस्ट के तौर पर टोकना, रोकना, काउंटर करना आपकी जिम्मेदारी है। चुप रहना तो मौन सहमति ही है। ‘370 बिरयानी’ वाले केस में भी प्रणित ने खुद माना था कि “मुझे उस समय चुनौती देनी चाहिए थी”। मतलब उसे पता है कि होस्ट की जवाबदेही होती है। फिर सेजल पवार वाले मामले में वही गलती दोहराई -न टोका, न रोका क्यों? क्योंकि पैसे भी उसे कमाने हैं। विवादित कंटेंट से व्यूज आए, व्यूज से पैसा आया। जब प्रॉफिट आपका है, तो जवाबदेही भी आपकी है। सिर्फ गेस्ट को बली का बकरा बनाकर होस्ट बच नहीं सकता। अगर हिमांशु की नौकरी जा सकती है, सेजल को माफी मांगनी पड़ी, तो शो चलाने वाला ये कहकर नहीं बच सकता कि “मैं तो सिर्फ होस्ट था”। मुद्दा सीधा है – जिसका माइक, उसकी जिम्मेदारी। जब तक शो के मालिक पर एक्शन नहीं होगा, तब तक ऐसे ‘वायरल के लिए कुछ भी’ वाले कंटेंट बनते रहेंगे। माफी मांगना अच्छी बात है, पर माफी सबको बराबर मिले। गलती की कीमत भी सबके लिए एक हो। हिमांशु अपनी गलती की कीमत चुका रहे हैं। सेजल पवार 2.5 लाख फॉलोअर्स के साथ नई शुरुआत कर चुकी हैं। ये फर्क ही सबसे बड़ा सवाल है। और जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक ‘इंसाफ’ शब्द अधूरा रहेगा।
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम जेंडर नहीं देखता, एंगेजमेंट देखता है
इस पूरी बहस का महत्वपूर्ण बिंदु तो हम सब भी हैं। क्योंकि हम ही दर्शक, लाइक करने वाले, शेयर करने वाले हैं। सेजल को 2.44 लाख फॉलोअर्स हमने दिए। हिमांशु की नौकरी जाने पर हमने तालियां बजाईं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम जेंडर नहीं देखता, वो एंगेजमेंट देखता है। विवाद जितना गहरा, रीच उतनी ज्यादा। जब तक हम गरिमा तोड़ने वाले कंटेंट को बूस्ट करते रहेंगे, क्रिएटर्स वैसा ही कंटेंट बनाते रहेंगे। अब वक्त आ गया है कि समाज भी अपने दायित्व को समझे। वरना हम सिर्फ पक्ष बदल-बदल कर बहस करते रहेंगे, और इस बीच इंसानियत, गरिमा और न्याय – तीनों हारते रहेंगे।














