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सावरकर पर लगाए गए आरोपों का सच: तथ्य, तर्क और इतिहास क्या कहते हैं?

स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर जो मनगढ़ंत आरोप लगाए जाते हैं, उनकी गहन व पारदर्शी पड़ताल तथ्यों व तर्कों के आलोक में ही की जा सकती है।

Written byप्रणय कुमारप्रणय कुमार — edited by Mahak Singh
May 28, 2026, 03:13 pm IST
inभारत
वीर सावरकर जी

वीर सावरकर जी

स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर जो मनगढ़ंत आरोप लगाए जाते हैं, उनकी गहन व पारदर्शी पड़ताल तथ्यों व तर्कों के आलोक में ही की जा सकती है। सबसे पहले माफ़ीनामे, सामान्य याचिका या शपथ-पत्र में अंतर को हमें समझना होगा। उस समय राजनीतिक कैदियों को कारावास से मुक्त होते समय भविष्य में शिष्ट-शालीन-अनुशासित बने रहने का शपथ-पत्र या बंध-पत्र (बांड) भरकर देना होता था। याचिकाएँ दायर करनी होती थीं। ऐसी याचिका एक सामान्य क़ानूनी प्रक्रिया होती थी, उसे दया-याचिका कहकर प्रचारित-प्रसारित करना सावरकर जैसे प्रखर देशभक्त एवं त्यागी-तपस्वी-बलिदानी व्यक्तित्व का घोर अपमान है।

राजबंदियों की रिहाई और सावरकर की भूमिका

प्रथम विश्व युद्ध में जीत के पश्चात ब्रिटेन के महाराजा जॉर्ज पंचम द्वारा दुनिया के अन्य ब्रिटिश उपनिवेश समेत भारत में भी राजबंदियों को रिहा करने की शाही घोषणा की गई, उन्हें याचिका दायर करने का अवसर दिया गया। वे समय-समय पर ऐसी अतिरिक्त उदारता का प्रदर्शन करते रहते थे ताकि अंग्रेजों की तथाकथित आभिजात्यता या श्रेष्ठता का पूरी दुनिया में प्रचार-प्रसार कर सकें और स्वयं को साम्राज्यवादी सत्ता का अधिष्ठाता नहीं, लोकतंत्र का पोषक बताएँ। इस शाही घोषणा के बाद भारत में ऐसी याचिका या शपथ-पत्र केवल सावरकर ने ही नहीं, अपितु तमाम राजनीतिक कैदियों ने भरकर दिए थे। बल्कि सेलुलर जेल में बंद अन्य अनेक राजनीतिक कैदियों को रिहा करने के लिए सावरकर ने ही उनकी ओर से ब्रिटिश शासन को पत्र लिखा था। उन्होंने वर्ष 1917 में लिखे अपने एक पत्र में यहाँ तक कहा था कि ”यदि उनकी रिहाई अन्य राजनीतिक कैदियों की रिहाई के मार्ग में बाधा हो तो ब्रिटिश सरकार उन्हें छोड़कर अन्य राजबंदियों को जेल से छोड़ने पर गंभीरता एवं सकारात्मकता से विचार करे।”

रणनीति, समर्पण और राष्ट्रहित

एक सत्य यह भी है कि यह पिटीशन, जिसे उनके विरोधी ‘मर्सी पिटीशन’ कहकर प्रचारित करते हैं तत्कालीन काँग्रेस नेतृत्व की सहमति से दायर की गई थी। बिपिनचंद्र पाल की अध्यक्षता में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व एवं संगठन द्वारा भी प्रस्ताव पारित कर सावरकर को रिहा करने की याचिका ब्रिटिश सरकार को भेजी गई थी। कलांतर में भाकपा के संस्थापक श्रीपाद डांगे, महान क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल व बारीन्द्र घोष भी ऐसी ही ‘पिटीशन’ के आधार पर सेलुलर जेल से रिहा हुए थे। मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल नेहरू को नाभा जेल से रिहा कराने के लिए ऐसा ही बंध-पत्र (बांड) तत्कालीन वायसराय को भरकर दिया था। 25 जनवरी 1920 को स्वयं गाँधी जी ने वीर सावरकर के छोटे भाई नारायण दामोदर सावरकर को पुनः याचिका दायर करने की नसीहत दी थी। 26 मई 1920 को उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लंबा लेख लिखकर सावरकर बंधुओं की रिहाई की माँग उठाई थी। और फिर हमें यह याद रखना चाहिए कि किसी एक पत्र, याचिका या कथित माफ़ीनामे से किसी राष्ट्रनायक का महत्त्व या योगदान कम नहीं होता?उनकी यह याचिका उनकी रणनीति का हिस्सा भी तो हो सकती है! बल्कि रणनीतिक योजना ही थी। क्या शिवाजी द्वारा औरंगज़ेब को लिखे गए चार-चार माफ़ीनामे के पत्र से उनका महत्त्व कम हो जाता है? कालेपानी की सज़ा भोगते हुए गुमनाम अँधेरी कोठरी में घुट-घुटकर मरने की प्रतीक्षा करने और निष्क्रिय जीवन जीने से बेहतर तो यही था कि बाहर निकल सक्रिय-सार्थक-सोद्देश्य और राष्ट्र, समाज एवं संस्कृति को समर्पित जीवन जिया जाय!

यह भी पढ़ें- वीर सावरकर पर विवाद क्यों बढ़ा? जानिए कोर्ट की टिप्पणी और ऐतिहासिक तथ्य

ब्रिटिश शासन और सावरकर पर लगे आरोपों का प्रश्न

जहाँ तक ब्रितानी हुकूमत की कथित तारीफ़ या उनके प्रति राजभक्ति की बात है तो अव्वल तो यह आरोप ही निराधार एवं अनर्गल है, क्योंकि ऐसा कुछ होता तो ब्रिटिश शासन उन्हें सशर्त्त क्यों रिहा करती, उन्हें 5 वर्ष के स्थान पर बढ़ा-बढ़ाकर 13 वर्ष तक रत्नागिरी जिले में तमाम शर्त्तों एवं कठोर पाबंदियों के साथ नज़रबंद क्यों रखती, उनके प्रति कोई विशेष छूट या उदारता क्यों नहीं बरतती? ब्रिटिशर्स अपने निकटस्थों को जेल में भी कैसी-कैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराते थे, उनके साथ कितनी उदारता बरतते थे, उन्हें किसी-न-किसी पद पर बिठाकर या प्रतिनिधित्व प्रदान कर कितना-कितना उपकृत करते थे, अपने लोगों को किन-किन सम्मानों एवं पुरस्कारों से नवाज़ते थे, इतिहास ऐसे दृष्टांतों से भरा पड़ा है। यहाँ तक कि भारत छोड़कर जाते हुए भी उन्होंने अपने लोगों के हित-संरक्षण का पूरा ध्यान रखा। ऐसे तमाम प्रसंग व प्रमाण हैं कि सत्ता-हस्तांतरण से पूर्व वे यह सुनिश्चित कर गए कि उनके लिए जासूसी या मुखबिरी करने वाले लोगों के हितों का स्वतंत्र भारत की सरकार में भी समुचित ध्यान रखा जाय।

सावरकर पर आरोप और ऐतिहासिक दृष्टिकोण

वहीं लाभ तो दूर, उलटे रिहाई के बाद भी सावरकर की स्नातक और वक़ालत की डिग्री निरस्त कर दी गई, उन पर कड़ी निगरानी रखी गई, बल्कि वे अकेले ऐसे स्वतंत्रता-सेनानी रहे जो आज़ादी से पूर्व और बाद की सरकारों द्वारा समान रूप से सर्विलांस पर रखे गए, जो शासन के कोपभाजन के जबरदस्त शिकार रहे। उल्लेखनीय है कि उनकी तुलना में स्वतंत्रता-आंदोलन में भाग लेने वाले अन्य कई राजनेताओं ने बिना किसी परिस्थितिजन्य विवशता या दबाव के अलग-अलग समयों पर किसी-न-किसी मुद्दे पर बढ़-चढ़कर ब्रिटिश शासन की तारीफ़ की थी। इन तारीफों को या तो स्वाभाविक या तत्कालीन परिस्थितियों एवं सूझ-बूझ का परिणाम माना गया। फिर सावरकर जी पर एकपक्षीय-अनर्गल आरोप क्यों? गाँधी जी ने समय-समय पर ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर भिन्न-भिन्न संदर्भों में उनके प्रति आभार प्रदर्शित किया है, उनके प्रति निष्ठा जताई है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐसे पत्र लिखे हैं, जिसमें भारतीयों को अंग्रेजों का वफ़ादार बनने की नसीहत दी गई है, ब्रिटिशर्स द्वारा शासित होने को भारतीयों का सौभाग्य बताया गया है।

यह भी पढ़ें- सावरकर की विचारधारा और आलोचना: इतिहास क्या कहता है?

राजनीतिक रणनीति और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

उनके तमाम पत्रों व लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि वे अंग्रेजों के अनेक उपकारों का  उल्लेख करते हुए कई बार भाव-विभोर हए हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गाँधी द्वारा तत्कालीन वायसराय को लिखे गए पत्रों में वे अंग्रेजों की ओर से भारतीय सैनिकों की भागीदारी को उनका फ़र्ज़ बताते नहीं थकते! तो क्या इन सबसे स्वतंत्रता-संग्राम में उनका महत्त्व कम हो जाता है? बल्कि उनके इन सब वक्तव्यों को हम उनकी राजनीतिक कुशलता, स्पष्टवादिता, बड़े ध्येय के लिए अपनाई जाने वाली नीति-युक्ति मानकर बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में स्वीकार करते हैं। यह उचित एवं तर्कसंगत भी है। मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे काँग्रेसी नेताओं या राजा राममोहन राय जैसे अनेकानेक समाज सुधारकों ने तो ब्रिटिश शासन और उनकी जीवन-शैली की खुली पैरवी की, यदि इस आधार पर उनके योगदान को कम करके नहीं आँका जाता तो फिर राष्ट्र के लिए आयु का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण होम कर देने वाले सावरकर पर सवाल और आरोप क्यों? आंबेडकर भी अनेक अवसरों पर ब्रिटिशर्स की पैरवी कर चुके थे, यहाँ तक कि स्वतंत्रता-पश्चात दलित समाज को वांछित अधिकार दिलाने को लेकर वे स्वतंत्रता का तात्कालिक विरोध तक कर चुके थे। तो क्या इससे उनका महत्त्व और योगदान कम हो जाता है? बल्कि इसे भी उन दिनों सामाजिक स्तर पर बरते जाने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार का परिणाम बताकर न्यायसंगत ठहराया जाता है।

भारत छोड़ो आंदोलन पर मतभेद और ऐतिहासिक संदर्भ

कुछ विद्वान और इतिहास के संदर्भों की उथली जानकारी रखने वाले लोग सावरकर की इस आधार पर आलोचना करते हैं कि उन्होंने 1942 में गाँधी जी द्वारा प्रारंभ किए गए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का विरोध किया था। क्या यह सत्य नहीं कि उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद, सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने वाले सी.राजगोपालाचारी, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर जैसे अनेकानेक नेताओं ने ”भारत छोड़ो आंदोलन” के समय और तरीकों पर तमाम सवाल खड़े किए थे। बल्कि कुछ इतिहासकार तो यहाँ तक मानते हैं कि 1941-42 के दौरान नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़े जाने वाले सशस्त्र सैन्य संघर्ष की योजनाओं और प्रयासों के दबाव में बिना किसी सुनियोजित योजना, ठोस रणनीति एवं निर्धारित-सुचिंतित लक्ष्य के ही गाँधी जी द्वारा आनन-फ़ानन में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ प्रारंभ कर दिया गया, जिसे कुचलने में अंग्रेजों को चंद सप्ताह भी नहीं लगे।

 

सावरकर की दूरदृष्टि और राष्ट्रीय चिंतन

काँग्रेस के सभी बड़े नेताओं को अंग्रेजों ने गिरफ़्तार कर लिया और जैसी आशंका थी, पूरा-का-पूरा आंदोलन ही नेतृत्वविहीन हो गया। यदि युवाओं-विद्यार्थियों के हिंसात्मक प्रतिरोध को छोड़ दें तो इस आंदोलन का कोई व्यापक एवं प्रतिकूल प्रभाव ब्रिटिश सरकार पर नहीं पड़ा था। सावरकर चाहते थे कि काँग्रेस भारत-विभाजन की मुस्लिम लीग की माँगों पर अपना पक्ष स्पष्ट करे, इस देश को परंपरा से अपनी मातृभूमि-पुण्यभूमि मानने वाले समाज को न्यायोचित अधिकार मिले, अंग्रेजों द्वारा मुस्लिम लीग की माँगे माने जाने की स्थिति में हिंदुओं के जान-माल का कम-से-कम नुकसान हो, और ऐसा चाहना अनुचित भी नहीं था। बल्कि उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर हिंदुओं को सैन्य प्रशिक्षण लेने के लिए प्रोत्साहित किया। जिन्ना के ‘डाइरेक्ट एक्शन’ और विभाजन के बाद पाकिस्तान में हुए ‘हिंदुओं के नरसंहार’ के संदर्भ में यदि विचार करें तो सावरकर का यह प्रयास और प्रोत्साहन कितना स्तुत्य, उपयोगी और दूरदर्शी प्रतीत होता है!

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