आस्था के मार्ग पर स्वास्थ्य की संजीवनी
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आस्था के मार्ग पर स्वास्थ्य की संजीवनी

केदारनाथ में प्रारंभ हुआ स्वामी विवेकानंद धर्मार्थ अस्पताल उन तीर्थयात्रियों के लिए ‘संजीवनी’ से कम नहीं है जिनका स्वास्थ्य अचानक खराब हो जाता है। “नर सेवा नारायण सेवा” की भावना के साथ उनकी यहां सेवा होती है और इसके बाद वे आगे की यात्रा पर निकल पड़ते हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 25, 2026, 08:13 am IST
in विश्लेषण, उत्तराखंड, धर्म-संस्कृति

केदारनाथ धाम में सुबह का तापमान हड्डियां जमा देने वाला है। पहाड़ों पर जमी बर्फ से उठती सर्द हवाएं सीधे चेहरे को चीरती हुई गुजरती हैं। बारिश की हल्की बूंदें और धुंध के बीच मंदिर परिसर में “हर-हर महादेव” के जयकारे लगातार गूंज रहे हैं। हजारों श्रद्धालु कतारों में खड़े हैं। कोई महाराष्ट्र से आया है, कोई तमिलनाडु से, कोई लंदन से। आस्था इतनी प्रबल कि मौसम भी उसके आगे छोटा पड़ता दिख रहा है, लेकिन इसी आस्था के बीच स्वास्थ्य की चुनौती भी उतनी ही बड़ी होकर सामने आई है।

ऊंचाई, ऑक्सीजन की कमी, कड़ाके की ठंड और लगातार पैदल चढ़ाई, कई श्रद्धालुओं की तबीयत अचानक बिगड़ गई। ऐसे में स्वामी विवेकानंद धर्मार्थ अस्पताल में डाॅक्टर निस्वार्थ भाव से श्रद्धालुओं का उपचार करने में जुटे हैं। स्वामी विवेकानंद हेल्थ मिशन सोसाइटी (एसवीएचएमएस) द्वारा संचालित यह अस्पताल 12,000 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। 50-बेड का यह अस्पताल श्रद्धालुओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

मंच पर विराजमान (बाएं से) सर्वश्री दिनेश चंद्र, डॉ कृष्ण गोपाल, पुष्कर सिंह धामी एवं सुरेश सोनी

गत 8 मई को इस अस्पताल का उद्घाटन किया गया। अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इस अस्पताल में देशभर के प्रतिष्ठित डॉक्टर बिना फीस लिए, सेवाभाव से यहां चिकित्सा करने के लिए मौजूद हैं। अस्पताल के उद्घाटन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री सुरेश सोनी, सहसरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल और विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक श्री दिनेश चंद्र मौजूद रहे। अपने उद्बोधन में श्री सुरेश सोनी ने कहा कि सनातन में सेवा ही परमोधर्म है।

ऐसे में यह अस्पताल श्रद्धालुओं को राहत देने का काम करेगा। यहां पर निस्वार्थ भाव से सेवाव्रती चिकित्सक केदारनाथ में दर्शन करने आने वाले लोगों की पीड़ा हरने का काम करेंगे। डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि संघ स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में सेवा का कार्य करते ही हैं। इस अस्पताल में भी समाज के लोगों के साथ मिलकर स्वयंसेवक सेवाकार्य में जुटे हुए हैं। उन्होंने इस पहल को जनसेवा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना भी सच्ची सेवा ही है।

श्री दिनेश चंद्र ने कहा कि केदारधाम में बाबा के दर्शन के लिए देश और दुनिया के कोने-कोने से श्रद्धालु पहुंचते हैं। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां लंबे समय से समुचित चिकित्सा सुविधाओं का अभाव था। ऐसी परिस्थिति में इस प्रकार के अस्पताल की आवश्यकता निरंतर महसूस की जा रही थी। उन्होंने कहा कि इस अस्पताल के माध्यम से आपात परिस्थितियों में समय पर उपचार मिलने से अनगिनत लोगों को राहत मिलेगी और यात्रा के दौरान श्रद्धालु स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करेंगे।

बिना रुके काम कर रहे डॉक्टर

इस दौरान अस्पताल में लगातार लोग पहुंच रहे थे, भीतर डॉक्टरों की टीम बिना रुके काम कर रही थी। किसी को ऑक्सीजन दी जा रही थी तो किसी के गिरते रक्तचाप को संभालने का प्रयास किया जा रहा था। माधुरी, जो दर्शन के लिए परिवार के साथ आई थीं, अस्पताल के बेड पर बैठी थीं। चेहरे पर थकान साफ थी। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “अत्यधिक ठंड के चलते तबीयत बिगड़ गई। पहले लगा सामान्य कमजोरी है, लेकिन फिर सांस लेने में परेशानी होने लगी।”

पास ही सुनैना ऑक्सीजन के सहारे थीं। उन्होंने बताया, “यहां की ठंड शरीर सह नहीं पाया। सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी। अगर समय पर डॉक्टर नहीं मिलते तो मुश्किल हो जाती।”

लंदन से अपने पिता के साथ दर्शनों के लिए आई प्रियंका के पिता की हालत भी अचानक खराब हो गई थी। परिवार घबराया हुआ था। प्रियंका कहती हैं, “पापा को अचानक सांस लेने में परेशानी हुई। हमें लगा अब क्या होगा, लेकिन डॉक्टरों ने तुरंत एडमिट किया। समय पर इलाज मिल गया, इसलिए स्थिति संभल गई।”

राहुल, अंशुल और रोहन जैसे कई युवा श्रद्धालु भी अस्पताल पहुंचे। रोहन लगातार ऑक्सीजन मास्क लगाए हुए थे। डॉक्टर उन्हें समझा रहे थे कि ऊंचाई पर शरीर को समय देना जरूरी है।

अस्पताल के उद्घाटन के दौरान देश के कई नामी डॉक्टर भी मौजूद रहे। दिल्ली के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विवेक कुमार ने कहा, “चारधाम यात्रा अब सिर्फ आस्था का नहीं, मेडिकल प्रबंधन का भी बड़ा विषय है। यहां हर मिनट महत्वपूर्ण है। यहां पर सांस की दिक्कत और हृदय से जुड़ीं समस्याएं सबसे ज्यादा सामने आती हैं।”

हार्ट और लंग ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. राहुल चंदोला लगातार मरीजों की निगरानी कर रहे थे। उन्होंने कहा, “ऊंचाई पर ऑक्सीजन का स्तर कम होने से कई लोगों में अचानक गंभीर स्थिति बन जाती है। यहां तुरंत चिकित्कीय सहायता जरूरी होती है।”

कार्यक्रम में मौजूद एम्स, दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. संजय राय कहते हैं “तीर्थयात्रा में आने वाले लोगों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति छिपानी नहीं चाहिए। बहुत लोग पहले से बीमार होते हैं लेकिन जांच नहीं कराते। यहां आने से पहले स्वास्थ्य जांच बेहद जरूरी होता है।” सर गंगाराम अस्पताल के डॉ. भुवनचंद्र पांडे ने कहा, “यहां सिर्फ इलाज नहीं, मानसिक सहारा देना भी जरूरी है। कई लोग घबरा जाते हैं। उन्हें भरोसा दिलाना पड़ता है कि वे सुरक्षित हैं।”

यथार्थ ग्रुप के सीएमडी डॉ. कपिल त्यागी ने कहा, “इतनी ऊंचाई पर 50 बिस्तरों का अस्पताल चलाना अपने आप में चुनौती है, लेकिन सेवा ही सबसे बड़ा उद्देश्य है।” एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा के प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने इसे “चलती-फिरती आपदा प्रबंधन प्रणाली” बताया। इस अस्पताल में देशभर से आए सेवाभावी डॉक्टर भी दिन-रात सेवा में जुटे हुए हैं। डॉ. हर्षित चौधरी एक मरीज की ईसीजी रिपोर्ट देखते हुए कहते हैं, “यहां डॉक्टर सिर्फ पेशेवर नहीं, सेवक बनकर काम कर रहे हैं।” डॉ. फाल्गुनी महिला श्रद्धालुओं की जांच कर रही थीं। वहीं डॉ. अंकुश लगातार आपातकालीन वार्ड और ऑक्सीजन यूनिट के बीच दौड़ते दिखे। डॉ. के.एन. भट्ट बुजुर्ग मरीजों की निगरानी में लगे हुए थे।

मानव सेवा का जीवंत उदाहरण

बाहर मंदिर की घंटियां लगातार बज रही थीं। बर्फ से ढकी चोटियों के बीच श्रद्धालु हाथ जोड़कर बाबा केदार के दर्शन कर रहे थे। वहीं अस्पताल के भीतर डॉक्टर श्रद्धालुओं की जिंदगी बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे। केदारनाथ में इस वक्त आस्था और सेवा एक साथ दिखाई देती हैं। एक ओर “हर-हर महादेव” का उद्घोष है, दूसरी ओर मॉनिटर की बीप। एक तरफ श्रद्धालुओं की आंखों में भक्ति है, दूसरी तरफ डॉक्टरों की आंखों में जिम्मेदारी। और इन सबके बीच, हिमालय की गोद में खड़ा यह अस्पताल सिर्फ एक स्वास्थ्य केंद्र नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में मानव सेवा का जीवंत उदाहरण बन गया है।

भारत की सभ्यतागत चेतना में राजा भगीरथ की कथा त्याग, तपस्या, धैर्य और मानव सेवा के सर्वोच्च प्रतीकों में से एक मानी जाती है। हिमालय में कठोर तपस्या के माध्यम से उन्होंने मां गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाकर मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। उनका यह प्रयास केवल आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं था, बल्कि समाज के लिए समर्पित जीवन का आदर्श था। जिस हिमालय ने इस महान तपस्या को देखा, वही आज भी पवित्रता, सहनशीलता, आध्यात्मिक शक्ति और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक बना हुआ है।

आज भी हिमालयी क्षेत्र मानव सेवा और करुणा से प्रेरित अनेक प्रयासों को प्रेरणा देता है। दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र, दूरस्थ गांव, कठिन मौसम और चुनौतीपूर्ण तीर्थ मार्ग स्वास्थ्य सेवाओं को अत्यंत कठिन बना देते हैं। कई उच्च हिमालयी क्षेत्रों में समय पर चिकित्सा सहायता ही जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाती है। ऐसे ही कठिन और पवित्र भूभाग में स्वामी विवेकानंद हेल्थ मिशन सोसाइटी (एसवीएचएमएस) ने एक मानवीय स्वास्थ्य सेवा आंदोलन के रूप में जन्म लिया, जिसका उद्देश्य चिकित्सा सेवा, राहत कार्य, जागरूकता और करुणामय सहयोग के माध्यम से समाज की सेवा करना है।

सेवा से स्वास्थ्य तक

“नर सेवा नारायण सेवा” से प्रेरित एसवीएचएमएस की स्थापना जनवरी 2012 में कुछ युवा चिकित्सकों और समाजसेवियों द्वारा की गई। इसकी शुरुआत देहरादून के निकट धर्मावाला नामक जनजातीय क्षेत्र में एक छोटे से चैरिटेबल क्लीनिक से हुई। एक छोटी पहल के रूप में शुरू हुआ यह प्रयास आज दूरस्थ और उपेक्षित क्षेत्रों में लाखों लोगों की सेवा करने वाला व्यापक स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क बन चुका है।
आज एसवीएचएमएस 15 चैरिटेबल अस्पताल संचालित कर रही है। इनमें से 12 उत्तराखंड के दूरस्थ और तीर्थ क्षेत्रों में, 2 उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में तथा एक दिल्ली में संचालित है। ये अस्पताल स्थानीय लोगों और चारधाम यात्रा पर आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए जीवनरेखा बन चुके हैं।

संस्था द्वारा संचालित प्रमुख अस्पतालों में श्री केदारनाथ धाम अस्पताल, श्री बद्रीनाथ धाम अस्पताल, गंगोत्री धाम अस्पताल, श्री महर्षि भृगु चैरिटेबल अस्पताल, केशव माधव अस्पताल, स्वामी रामप्रकाश चैरिटेबल अस्पताल, माधव अस्पताल नारायणकोटी तथा राजा जगतदेव सिंह मेमोरियल अस्पताल प्रमुख हैं। तीर्थ मार्गों पर स्थित ये अस्पताल आपातकालीन चिकित्सा, जांच, सर्जरी और भर्ती उपचार जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करते हैं, जहां पहले आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग नहीं थीं।

8 मई, 2026 को एसवीएचएमएस ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए चारधाम क्षेत्र में लाखों यात्रियों की सेवा हेतु अत्याधुनिक 50 बिस्तरों वाले अस्पताल की स्थापना की। यह केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा के विस्तार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है, जिसने कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को नई मजबूती प्रदान की है।

स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सुलभ बनाने के लिए एसवीएचएमएस ने तीन वर्ष पूर्व “चारधाम साथी” मोबाइल एप्लीकेशन शुरू की। हाल ही में लॉन्च किए गए इसके संस्करण 3.0 ने इसकी उपयोगिता को और बढ़ाया है। इस एप के माध्यम से यात्री निकटतम अस्पताल खोज सकते हैं, डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ से सीधे संपर्क कर सकते हैं, अस्पताल की दूरी जान सकते हैं तथा आपात स्थिति में तत्काल सहायता प्राप्त कर सकते हैं। यह पहल भारतीय सेवा परंपरा और आधुनिक डिजिटल तकनीक के अद्भुत समन्वय का उदाहरण है। 30 अप्रैल, 2026 तक संस्था के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में 29 लाख से अधिक मरीजों का पंजीकरण हो चुका है। संस्था ने 1.81 लाख से अधिक आपातकालीन मामलों का उपचार किया है, 16 लाख से अधिक जांचें की हैं तथा 13,800 से अधिक सर्जरी सम्पन्न की हैं। संस्था की स्वास्थ्य सेवाएं आज उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 500 से अधिक गांवों तक पहुंच चुकी हैं।

मरीजों का कुशलक्षेम पूछते (बाएं से) डॉ कृष्ण गोपाल जी, श्री पुष्कर सिंह धामी और डॉ प्रवीण कुमार रेड्डी

महत्वपूर्ण भूमिका

स्वास्थ्य सेवा से आगे बढ़कर एसवीएचएमएस उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वर्षों से स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अभाव के कारण पहाड़ी क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर पलायन होता रहा है। अपने अस्पतालों, शिक्षा कार्यक्रमों और सेवा-आधारित अवसरों के माध्यम से संस्था स्थानीय लोगों का भरोसा फिर से जीत रही है और पलायन कर चुके लोगों को वापस अपने गांव-क्षेत्र में बसने तथा स्थायी विकास को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा रही है।

संस्था की सबसे बड़ी शक्ति इसका विशाल स्वयंसेवी नेटवर्क है। प्रतिवर्ष देशभर से लगभग 200 प्रतिष्ठित डॉक्टर और मेडिकल छात्र संस्था के तीन उच्च हिमालयी अस्पतालों में कम से कम दस दिन तक सेवा देते हैं। इसके अतिरिक्त 2500 से अधिक डॉक्टर और मेडिकल छात्र इस मानवीय अभियान से स्वयंसेवक के रूप में जुड़े हुए हैं। इसने एसवीएचएमएस को एक राष्ट्रीय स्तर के सेवा आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया है।

एसवीएचएमएस की प्रेरणा स्वामी विवेकानंद के विचारों से आती है, जिन्होंने मानव सेवा को ही सर्वोच्च आध्यात्मिक साधना माना। संस्था स्वास्थ्य, शिक्षा और सामुदायिक विकास के माध्यम से उन्हीं आदर्शों को व्यावहारिक रूप देती है। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ संस्था “शिक्षा अभियान” और “बाल गोकुलम” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों और समाज के समग्र विकास के लिए भी कार्य कर रही है। इन पहलों का उद्देश्य शिक्षा, संस्कार और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना है।

प्रेरणा, नेतृत्व और विस्तार

एसवीएचएमएस की यह प्रेरणादायी यात्रा डॉ. नित्यानंद जी की दूरदृष्टि से संभव हुई, जो एक प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक और उत्तराखंड के प्रांत संघचालक रहे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन उत्तराखंड के लोगों की सेवा को समर्पित कर दिया। हिमालयी क्षेत्रों की कठिनाइयों और प्राकृतिक आपदाओं को समझते हुए उन्होंने “उत्तरांचल दैवी आपदा संस्थान” की स्थापना की तथा चारधाम क्षेत्र में अनाथ और वंचित बच्चों के लिए विद्यालय और छात्रावास प्रारंभ किए। उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने इस मिशन को आगे बढ़ाया। उनके नेतृत्व में हजारों डॉक्टर, समाजसेवी और स्वयंसेवक इस सेवा अभियान से जुड़े और हिमालयी क्षेत्रों में अस्पतालों की एक श्रृंखला स्थापित की। आज ये अस्पताल दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए वास्तविक “संजीवनी” बन चुके हैं। अध्यात्म, सेवा और साधना की इस सतत यात्रा में एसवीएचएमएस भारत की उस सनातन संस्कृति का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है, जहां आध्यात्मिकता का सर्वोच्च स्वरूप मानव सेवा में दिखाई देता है।

Topics: चिकित्सा और स्वास्थ्यराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघस्वास्थ्य की संजीवनीकेदारनाथ धामसनातन संस्कृतिस्वामी विवेकानंदमानव सेवापाञ्चजन्य विशेषनर सेवा- नारायण सेवानि:स्वार्थ भावसेवाव्रती चिकित्सकपरमोधर्म
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