झारखंड में गो-तस्करी का नया 'पहाड़ और स्कॉर्पियो मॉडल' Exposed!
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झारखंड में पहाड़ी रास्तों से हो रही है गो-तस्करी: साहिबगंज-पाकुड़ रूट पर लग्जरी गाड़ियों का खेल, बांग्लादेश से जुड़े तार

झारखंड में सख्त कानून के बावजूद साहिबगंज और पाकुड़ जिलों में गो-तस्करी का नया रूट बेनकाब हुआ है। जानिए कैसे बांग्लादेश से जुड़े हैं इस सिंडिकेट के तार

Written byरितेश कश्यपरितेश कश्यप — edited by Shivam Dixit
May 23, 2026, 06:29 pm IST
inभारत, झारखण्‍ड
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

झारखंड में ‘झारखंड गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम, 2005’ कागज़ों पर तो 10 साल की कड़ी सजा का प्रावधान करता है, लेकिन धरातल पर इसकी हकीकत तस्करों के लिए किसी ‘मजाक’ से कम नहीं दिखती। राज्य में गो-तस्करी का जाल अब केवल ट्रकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ‘हाईवे छोड़ो, पहाड़ पकड़ो’ और ‘स्कॉर्पियो जैसी लग्जरी गाड़ियों’ के नए मॉडल ने सरकारी व्यवस्था और प्रशासनिक चौकसी की पोल खोल दी है।

साहिबगंज-पाकुड़ : तस्करी का नया रास्ता

हालिया रिपोर्टों ने साहिबगंज और पाकुड़ जिलों में गो—तस्करी के एक ऐसे नेटवर्क को बेनकाब किया है, जिसने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। तस्करों ने अब  हाईवे छोड़कर जंगल और पहाड़ी रास्तों को अपना नया मार्ग बना लिया है। साहिबगंज जिले का बोरियो प्रखंड इस नए नेटवर्क का केंद्र बनकर उभरा है।

सूत्रों के अनुसार, गोड्डा जिले के डुमरिया पशु हाट से पशुओं की खरीद के बाद उन्हें पैदल ही दुर्गम पहाड़ी रास्तों से पश्चिम बंगाल की सीमा की ओर ले जाया जाता है। हर रविवार को यह सिलसिला शुरू होता है। तस्कर इन पशुओं को पैदल हांकते हुए भुंडा पहाड़ तक ले जाते हैं। दिनभर पहाड़ों की आड़ में छिपे रहने के बाद, रात के सन्नाटे में जेटकेकुम्हारजोरी, लोगाय (बरहेट) और हिरणपुर (पाकुड़) के रास्तों से इन्हें बंगाल की सीमा पार करा दिया जाता है।

इस घृणित कार्य में स्थानीय ग्रामीणों को मोहरा बनाया जा रहा है। पशुओं को हांकने के बदले उन्हें प्रति चक्कर 800 से 1000 रुपये दिए जाते हैं। ग्रामीण आगे-आगे पैदल चलते हैं, जबकि तस्कर पीछे से बाइक और बोलेरो से पूरी निगरानी करते हैं।

‘हिंदू धर्म रक्षा मंच’ के केंद्रीय अध्यक्ष और अधिवक्ता संत कुमार घोष स्थानीय कार्यकर्ताओं और पहाड़िया समाज के प्रधानों से मिली जानकारी के आधार पर दावा करते हैं कि गो—तस्करों ने नया मार्ग अपना लिया है। उन्होंने बताया, ”गो—तस्कर अब ऐसे रास्तों का उपयोग कर रहे हैं, जहाँ पुलिस गश्त बेहद कम है और दो जिलों की सीमा होने के कारण कार्रवाई अक्सर उलझ जाती है।” उन्होंने यह भी बताया, ”पहले मुख्य मार्गों से ट्रकों के जरिए पशुओं की तस्करी होती थी, लेकिन कई बार छापेमारी और वाहन जब्ती के बाद तस्करों ने अपनी रणनीति बदल दी। अब वे ‘हाईवे छोड़ो, पहाड़ पकड़ो’ की नीति अपना चुके हैं। यानी मुख्य सड़कों से नहीं, पहड़ी रास्तों से गो—तस्करी होने लगी है।” इन सबको देखते हुए उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि बोरियो, बरहेट और हिरणपुर थाना क्षेत्रों में संयुक्त टास्क फोर्स बनाकर रात में जांच अभियान शुरू किया जाना चाहिए।

पुरानी लेकिन गहराती समस्या

झारखंड में गो-तस्करी की समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन वर्तमान समय में यह चरम पर पहुंच चुकी है। अगस्त 2016 में केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने झारखंड में बढ़ती तस्करी के कारण राज्य पर निगरानी बढ़ा दी थी। उस समय दिल्ली में हुई उच्च स्तरीय बैठक में साहिबगंज और पाकुड़ को बांग्लादेश सीमा के निकट होने के कारण सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना गया था।

कानून को ठेंगा और ₹50 का जुर्माना

राज्य में कानून को ठेंगा दिखाने वाली कई घटनाएं व्यवस्था की जड़ों तक फैले भ्रष्टाचार और लापरवाही को उजागर करती हैं। उदाहरण के तौर पर 15 दिसंबर, 2020 को रांची पुलिस ने एक कंटेनर से 52 मवेशी बरामद किए थे। इन पशुओं को वध के लिए अत्यंत क्रूरता से ठूंसकर ले जाया जा रहा था। पुलिस ने तस्करी का मामला तो दर्ज किया, लेकिन उसे अदालत में साबित नहीं कर पाई। परिणामस्वरूप, 1 अप्रैल 2026 को आए फैसले में अदालत ने दोषियों पर पशु क्रूरता के तहत मात्र 50-50 रुपये का जुर्माना लगाया।

दिसंबर, 2022 में स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को स्वयं सड़क पर उतरना पड़ा था। उन्होंने सरैयाहाट थाना क्षेत्र में तस्करी के लिए ले जाए जा रहे 150 से अधिक गोवंश को मुक्त कराया और तस्करों को पुलिस के हवाले किया। लेकिन इसके बाद भी तस्करों पर ऐसी कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, जो उनके मन में कानून का भय स्थापित कर सके।

इसके बावजूद सरकार का ध्यान इन घटनाओं की ओर नहीं गया। मई 2024 में गढ़वा जिले में गो-तस्करी के संदेह में एक 60 वर्षीय बुजुर्ग के साथ न केवल मारपीट की गई, बल्कि उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाया गया। यह घटना दर्शाती है कि जब कानून अपना काम नहीं करता, तो सामाजिक तनाव किस प्रकार हिंसक रूप ले लेता है। लेकिन तुष्टीकरण की राजनीति ने व्यवस्था के हाथ इस कदर बांध दिए हैं कि प्रशासन चाहकर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रहा है।

अब तस्करों ने ट्रकों के बजाय स्कॉर्पियो जैसी लग्जरी गाड़ियों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ग्रामीणों ने कई बार ऐसी गाड़ियाँ पकड़ी हैं, जिनमें गायों को ठूंसकर ले जाया जा रहा था। पकड़े जाने पर आक्रोशित ग्रामीण गाड़ियों में तोड़फोड़ और आगजनी तक कर देते हैं।

लग्जरी गाड़ियों का इस्तेमाल और सफेदपोशों का संरक्षण: सांसद निशिकांत दुबे का बड़ा आरोप

सांसद निशिकांत दुबे का स्पष्ट रूप से मानना है कि पशु तस्करी के इस खेल में बड़े सफेदपोश नेताओं और कई प्रशासनिक अधिकारियों की गहरी संलिप्तता है। उनका आरोप है कि इसी ऊंचे स्तर के संरक्षण के कारण तस्करों के मन में कानून या पुलिस का कोई भय नहीं रहता। उन्होंने खुलासा किया कि पशु तस्करी के लिए एक संगठित गिरोह काम करता है, जो तस्करी के रास्तों में पड़ने वाले स्थानीय पुलिस थानों को ‘मैनेज’ करता है। इसी मिलीभगत की वजह से तस्कर बेखौफ होकर पशुओं को एक जिले से दूसरे जिले और फिर सीमा पार तक पहुंचा देते हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि झारखंड में गो-तस्करी अब केवल एक आपराधिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सुनियोजित उद्योग बन चुकी है। 2005 का कानून अपनी जगह मौजूद है, लेकिन उसे लागू करने वाली प्रशासनिक इच्छाशक्ति लगभग गायब दिखाई देती है। पुलिस द्वारा जब्त किए गए पशुओं को वापस ग्रामीणों को सौंप दिया जाता है, जहाँ से तस्कर उन्हें पैसों का लालच देकर दोबारा हासिल कर लेते हैं।

Topics: Nishikant Dubey StatementDumaria Pashu Haat GoddaBorio Barheit Police InvestigationCow Smuggling Bangladesh ConnectionJharkhand Cow SmugglingSahibganj Pakur Smuggling Route
रितेश कश्यप
रितेश कश्यप
डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। राजनीति, सामाजिक और सम-सामायिक मुद्दों पर पैनी नजर। कर्मभूमि झारखंड।   [Read more]
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