कोलकाता | पश्चिम बंगाल में संस्कृत को बोलचाल की भाषा के रूप में बढ़ावा देने के लिए ‘संस्कृत भारती’ ने अपना नया अभियान तेज कर दिया है। इस अभियान के तहत मात्र 20 घंटे के प्रशिक्षण में लोगों को संस्कृत बोलना सिखाया जा रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ‘संस्कृत भारती’ द्वारा करीब दो हजार स्वयंसेवकों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है।
विधायकों की संस्कृत में शपथ ने जगाई रुचि
बता दें कि हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति और समाज में संस्कृत के प्रति एक नया आकर्षण देखा गया है। विशेष रूप से विधानसभा में भाजपा के 16 विधायकों द्वारा संस्कृत में शपथ लिए जाने के बाद आम लोगों में इस देव भाषा को सीखने की जिज्ञासा बढ़ी है।
शपथ लेने वाले प्रमुख विधायकों में शामिल हैं:
- हिरणमय चटर्जी
- चंदना बाउरी
- लक्ष्मीकांत साव
- डॉ. राजेश कुमार
- दुधकुमार मंडल
संस्कृत भारती के दक्षिण बंगाल प्रभारी अरुण चक्रवर्ती ने बताया कि विधायकों द्वारा संस्कृत में शपथ ग्रहण किए जाने से आम लोगों में इस भाषा को सीखने की रुचि उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। अब तक राज्य में लगभग 50 हजार लोग संगठन के दस दिवसीय ‘संस्कृत संभाषण शिविर’ का लाभ उठा चुके हैं।
कैसे काम करता है ‘संस्कृत संभाषण शिविर’?
संस्कृत भारती द्वारा संचालित इस शिविर की कार्यप्रणाली बेहद सरल और सुलभ रखी गई है-
- समय सीमा: यह 10 दिन का शिविर होता है, जिसमें प्रतिदिन केवल 2 घंटे का समय देना होता है।
- निशुल्क प्रशिक्षण: इस शिविर में शामिल होने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता।
- सरल पद्धति: प्रशिक्षक व्याकरण के बोझ के बजाय दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले सरल वाक्यों के माध्यम से सीधे बोलना सिखाते हैं।
इतिहास और संगठन का विस्तार
संस्कृत के प्रचार की यह यात्रा वर्ष 1981 में बेंगलुरु से शुरू हुई थी। बाद में 1995 में संस्कृत के प्रसार के लिए विधिवत ‘संस्कृत भारती’ नामक संगठन का गठन किया गया। पश्चिम बंगाल में इस संगठन ने वर्ष 2008 में अपनी गतिविधियां शुरू की थीं। अब बंगाल राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद इस अभियान को नई गति और विस्तार मिला है।
जाति-मजहब से परे है यह अभियान
संस्कृत भारती का स्पष्ट दावा है कि इस अभियान का किसी जाति, मजहब या राजनीति से संबंध नहीं है। यह पूर्णतः भाषाई और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य है। यही कारण है कि विभिन्न समुदायों के लोग, जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी शामिल हैं, इन शिविरों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और संस्कृत की बारीकियां सीख रहे हैं।












