आतंक के लिए सजा पाया हुआ शाहिद बट्ट बना है ब्रिटेन में बर्मिंघम में काउन्सलर के लिए निर्दलीय उम्मीदवार
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आतंक के लिए सजा पाया हुआ शाहिद बट्ट बना है ब्रिटेन में बर्मिंघम में काउन्सलर के लिए निर्दलीय उम्मीदवार

1999 में यमन में ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास, चर्च और होटल उड़ाने की साजिश रचने का दोषी शाहिद बट्ट अब बर्मिंघम के स्पार्खिल वॉर्ड से पार्षद का चुनाव लड़ रहा है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Apr 12, 2026, 11:10 am IST
inविश्व, विश्लेषण
terror convict Shahid Butt councillor election

शाहिद बट्ट

क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे आतंक से जुड़े हुए मामले में सजा मिल चुकी हो और जिसे इस कारण सजा मिली हो कि उसने विदेशों में अपने ही देश के दूतावासों को उड़ाने की साजिश रची हो और उसने अपने ही देश के नागरिकों का अपहरण किया हो। मगर ऐसा हो रहा है और ऐसा हो रहा है ब्रिटेन में बर्मिंघम में। यहाँ पर काउन्सलर के चुनावों में एक ऐसा व्यक्ति खड़ा हो रहा है, जिसने यमन में ब्रिटिश कान्सलिट, एक अंगलिकन चर्च और एक होटल को निशाना बनाने का षड्यन्त्र रचा था और उसे 1999 मे वहाँ पर सजा भी हुई थी।

वह वर्ष 2003 में यूके वापस आया था और अब वह यूके में बर्मिंघम में काउन्सलर के पद के लिए चुनावों में है। इसे लेकर वहाँ पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। फरवरी से लेकर अभी तक विरोध तेज हो रहा है, मगर यह विरोध वहाँ की जनता में कोई भी उद्वेग या असंतोष पैदा नही कर पा रहा है, जहां पर वह चुनाव लड़ रहा है। शाहिद भट्ट जिस सीट से काउन्सलर के पद के लिए लड़ रहा है, वहाँ पर अब बहुसंख्यक मुस्लिम हैं।

शाहिद बट्ट को यमन में मिली थी सजा

शाहिद बट्ट को जब वर्ष 1999 में यमन में सजा मिली थी, तब उस पर इन आरोपों की पुष्टि हुई थी कि आतंकवादी यमन से पश्चिमी प्रभाव को मिटाना चाहते थे और एक इस्लामिक राज्य की स्थापना करना चाहते थे। छ महीने तक यह मुकदमा चल था और उसमें जज ने यह आरोप खारिज कर दिए थे, कि उनसे जबरन ये आरोप कुबूल करवाए गए हैं। क्योंकि शाहिद बट्ट का कहना यही है कि उस पर अत्याचार किये गए थे और जबरन उससे आरोपों की पुष्टि कारवाई गई थी।

शाहिद बट्ट अभी तक यही कहता है कि वह आरोप फर्जी थे और उस पर आरोप कुबूल करवाने के लिए कई प्रकार के ज़ुल्म किये गए थे। मगर लोगों का कहना है कि ऐसा नहीं है, क्योंकि यमन के जज ने ही इन तमाम आरोपों को खारिज कर दिया था। फरवरी में जब यह मुद्दा उभरकर आया था तब बट्ट ने बीबीसी को बताया था कि अगर लोगों को लगता है कि वह चरमपंथी है, तो वह कुछ नहीं कर सकता है, यह उनका विचार है। अंत में स्पार्कहिल के नागरिक ही इसकी पुष्टि करेंगे कि सही क्या है।

यूके का कानून उसे चुनाव लड़ने से नहीं रोकता

बीबीसी के साथ बात करते हुए ही उसने कहा था कि जहां तक कानून की बात है तो कोई भी कानून ऐसा यूके में नहीं है, जो उसे काउन्सलर के पद के लिए चुनाव लड़ने से रोके।“ उसने यह भी स्वीकारा था कि उसका अतीत काफी अलग रह चुका है और कहा था कि “जाहिर है कि यह बहुत भावनात्मक बात है कि जब आपको लोग “दोषी आतंकवादी” कहते है और उसे लोगों की चिंता से सरोकार है। मगर उसने यह भी कहा था कि वह अपनी कम्युनिटी के लोगों के बीच जा रहा है, जिस कम्युनिटी के लिए उसने पूरी ज़िंदगी काम किया था।

बट्ट के विवादित और उकसाने वाले कदम

बट्ट केवल इसे लेकर ही दोषी नहीं है, बल्कि वह यूके में भी मुस्लिमों को भड़काने का काम कर रहा है। उसने बर्मिंघम के मुस्लिमों को नवंबर में एस्टन विलय और इज़राएली क्लब मककबी तेल अवीव के बीच होने वाले फुटबॉल मैच का विरोध करने के लिए भड़काया था। उस पर यह भी आरोप था कि उसने ऐसी भाषा का प्रयोग किया था, जिससे लोगों के बीच हाथापाई की नौबत आ सकती थी।

7 मई 2026 को चुनाव होने हैं, और अब बट्ट की उम्मीदवारी एक मुद्दा बनता जा रहा है। डेली मेल के अनुसार एक ब्रिटिश नागरिक एरिक फिर्किनस का अपहरण एक ऐसे इस्लामिस्ट गैंग ने किया था, जो शाहिद बट्ट की आजादी की मांग कर रहा था। एरिक पर्यटकों के ऐसे 16 लोगों में से एक थे, जिन्हें आतंकवादी समूह ने इसलिए अपहृत कर किया था क्योंकि वे बट्ट और उसके सह आरोपी की रिहाई करवाना चाहते थे। चार पर्यटकों की इस हमले में मौत हो गई थी। और एरिक का कहना था कि यह उनका सौभाग्य था कि वह जिंदा बच सके और वह भी तब जब उनके सीने पर एक आतंकवादी ने बंदूक रख दी थी।

हालांकि, बट्ट का कहना है कि रिहा होने के बाद उसने जिहाद से मुंह मोड़ लिया है और दो दशकों से वह लोगों को चरमपंथ से दूर रहने के लिए प्रेरित कर रहा है। बट्ट जिस स्पार्कहिल से चुनावों मे खड़ा है, वहाँ पर 91% अल्पसंख्यक जनसंख्या है, और जिसमें से 70% मुस्लिम हैं। डेली मेल के अनुसार एरिक को यह जरा भी विश्वास नहीं है कि बट्ट ने आतंकवाद को छोड़ दिया है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

सोशल मीडिया पर इसे लेकर अब बहस छिड़ गई है। लोग यह बहस कर रहे हैं कि आखिर एक दोषी व्यक्ति को कैसे चुनावों में खड़ा होने की इजाजत दी जा सकती है? फरवरी से अप्रेल तक यह बहस लगातार चल रही है, सोशल मीडिया पर लोग विरोध दर्ज कर रहे हैं और यहाँ तक कि लेबर और कंजरवेटिव दोनों ही दलों के समर्थक भी इस बात से सहमत दिख रहे हैं कि शाहिद बट्ट को चुनावों में नहीं खड़ा होना चाहिए।

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