नदियों की पहचान पर आक्रमण : क्यों मां गंगा में जूठी हड्डियां फेंकना है घातक?
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नदियों की पहचान पर आक्रमण : क्यों मां गंगा में जूठी हड्डियां फेंकना है घातक?

एक तरफ साकिब कानपुरी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान हैं, जिनके लिए मां गंगा अनमोल हैं। तो दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो गंगा को मैया नहीं मानते।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Apr 11, 2026, 09:35 pm IST
in भारत
मां गंगा

मां गंगा

गंगा वह हैं, जिनके होने से भारतीय संस्कृति का अस्तित्व है। यह वही मां गंगा हैं जिनके तट पर बैठकर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई बजाते थे और कहते थे कि गंगा मैया के किनारे बैठकर जब मैं शहनाई बजाता हूं, तो लगता है कि मैया खुद मेरा साथ दे रही हैं। साकिब कानपुरी ने भी कभी लिखा था-

“ऐ बहार-ए-गंग ऐ भारत-नवाज़
तेरी हस्ती पर है इक आलम को नाज़
तेरे आईने में है अक्स-ए-फ़लक
क़तरे क़तरे में मसर्रत की झलक”

एक तरफ साकिब कानपुरी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान हैं, जिनके लिए मां गंगा अनमोल हैं। तो दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो गंगा को मैया नहीं मानते। चिकन-बिरयानी खाकर बची हुई हड्डियां गंगा में फेंक दीं। 15 मार्च 2026 को बनारस में मां गंगा के आँचल में घटा यह दृश्य मानसिक आघात से कम नहीं है। क्योंकि जिस मां गंगा की लहरों में हिन्दू अंतिम विश्राम के लिए आता है, उसी मां गंगा के आँचल को झूठी हड्डियों द्वारा दूषित किया गया। क्या यह युगों-युगों से चली आ रही आस्था की प्रतीक मां गंगा की पहचान को मिटाने का पाप नहीं है ?

घटना सामने आते ही नेताओं के अनर्गल बयान

जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ और लोगों का विरोध प्रदर्शन हुआ, वैसे ही मुस्लिम और कथित सेक्युलर नेताओं के बयान आने लगे। सबसे विवादास्पद बयान रहा मौलाना साजिद राशिदी का। उन्होंने अस्थि विसर्जन और जूठी हड्डियों को एक बताते हुए कहा कि अंतिम संस्कार के समय आप लोग मृतकों की हड्डियाँ (अस्थियाँ) गंगा में फेंकते हैं। अगर वे (मुस्लिम युवक) चिकन की हड्डियाँ फेंकते हैं तो उन्हें जेल क्यों भेज दिया जाए? यह दोहरा मापदंड है। शायद मौलाना ने अपनी मानसिकता को स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए हिन्दू और मुर्गे एक समान हैं। अखिलेश यादव ने भी एक प्रकार से मां गंगा के साथ किये गए अपराध के पक्ष में ही बोलते हुए बयान दिया कि नाव पर इफ्तार करना क्या गुनाह है? उन युवकों ने पुलिस की हथेली पर ईदी नहीं रखी होगी, इसलिए गिरफ्तारी हुई। क्रूज पर सबसे महंगी शराब परोसी जाती है, उस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती?

यहां अखिलेश यादव कुछ जल्दबाजी कर गए। यदि वह इंटरनेट को ही खंगाल लेते तो पता चलता कि मां गंगा पर चलने वाले किसी भी क्रूज में शराब नहीं परोसी जाती है और भोजन भी शाकाहारी ही परोसा जाता है। मामला इफ्तार करने का था ही नहीं, और न ही मुस्लिमों का था। मामला था मां गंगा में जूठी हड्डियां फेंकने का। मामला था मां गंगा की पहचान को नष्ट करने का। मां गंगा के आँचल में मांसाहार करने का।

कांग्रेस के नेता इमरान प्रतापगढ़ी से लेकर सुप्रिया श्रीनेत तक कई कथित सेक्युलर नेताओं के बयान आए और उन्होंने अपना पूरा ध्यान केवल इस पर रखा कि इफ्तार क्यों गंगा के बीचों बीच नहीं हो सकता? कांग्रेस के मोहम्मद जावेद तो एक कदम और आगे बढ़ गए और उन्होंने कहा कि अगर बचा हुआ खाना नदी में फेंका गया तो इतनी सख्ती क्यों? इन दो शब्दों पर गौर किया जाए तो पता चलेगा कि मानसिकता क्या है और हिंदुओं और उनके अस्तित्व को समझा क्या जाता है? जिस माँ गंगा को हिन्दू अपनी माँ मानता है, उसे मात्र नदी मानकर जूठा खाना फेंकने वाला स्थान कांग्रेस और अन्य कथित सेक्युलर नेताओं द्वारा बताया जा रहा है।

यह कोई एक दिन की हरकत नहीं है, बल्कि यह एक कट्टर मानसिकता है, जो दूसरे के धार्मिक अस्तित्व को मिटा देना चाहती है। यह नदी की धार्मिक पहचान पर हमला है।

नदी की पहचान और उस पर आक्रमण

वर्ष 2014 में विशाल भारद्वाज की फिल्म आई थी हैदर! उसमें कश्मीर के मार्तंड सूर्य मंदिर के सामने हैदर गाना गाता है और उसमें मार्तंड सूर्य मंदिर को “शैतान की गुफा” कहा गया था। वह गाना आया, उस समय कश्मीरी पंडितों ने विरोध किया और कहा कि मंदिर की पहचान के साथ छल है और उसका गलत प्रतिनिधिकरण हैं। विशाल भारद्वाज के निर्देशन में बनी इस फिल्म की कहानी शेक्सपियर के नाटक हेमलेट पर थी।

मगर यह बहुत रोचक था कि शेक्सपियर के हेमलेट में मार्तंड मंदिर को शैतान की गुफा कह दिया जाए। उसमें एक गाना था, झेलम नदी पर।

झेलम, झेलम
ढूँढे किनारा
किससे पूछें कितनी देर से
दर्द को सहते जाना है
किससे पूछें कितनी देर से
दर्द को सहते जाना है

इस गाने को गुनगुनाने वाले आज भी कई हैं। झेलम की पीड़ा पर न जाने कितने लोग हैं जो बात करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। मगर झेलम शब्द में ही जो पीड़ा है, उसकी ओर ध्यान नहीं जाता है। झेलम जो कभी वितस्ता हुआ करती थी, जिसका इतिहास यह है कि उसका जन्म ही भगवान शिव द्वारा एक त्रिशूल के वार से हुआ था। जब वितस्ता कहते हैं तो महादेव के साथ उस नदी का इतिहास मिलता है। उससे कश्मीरी पंडितों का इतिहास जुड़ता है, उससे हिन्दू इतिहास जुड़ता है और कहा जाए कि उससे भारत का इतिहास जुड़ता है। परंतु मुगल काल या उससे पहले से ही उसका नाम झेलम हो गया। जैसे ही झेलम हुआ, उसका महादेव के त्रिशूल का इतिहास धुंधला हो गया।

शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या रखा है? परंतु नाम में ही सब रखा हुआ है। नाम में ही इतिहास है, नाम में ही पहचान है। नाम है काशी तो गंगा का इतिहास है, महादेव की नगरी है काशी! महादेव से इतिहास जुड़ता है। नदी और भूमि देशाचार का निर्माण भी करती हैं और देशाचार से प्रभावित भी होती हैं। नदी और भूमि दोनों के ही अपने चरित्र होते हैं।

क्या होते हैं नदियों के चरित्र और पहचान?

यह बहुत सहज प्रश्न है कि क्या नदी या भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों के भी चरित्र होते हैं? उनकी अपनी पहचान होती है? तो इसका बहुत सरल उत्तर है कि हां! जैसे वितस्ता का अपना चरित्र है। वितस्ता शब्द आते ही हृदय में श्रद्धा भाव उत्पन्न हो जाता है। जब वितस्ता है तो नीलमत पुराण से उसका इतिहास है कि कैसे भगवान शिव ने अपनी त्रिशूल से धरती पर एक विटस्ति (लगभग 9 इंच) चौड़ी खाई बनाई। उसमें से देवी पार्वती (उमा) स्वयं नदी के रूप में प्रकट हुईं। इसलिए शिव ने इस नदी का नाम वितस्ता रखा।

परंतु क्या यही भाव झेलम के साथ आएगा? या फिर जो लोग झेलम कहते हैं, वे इस इतिहास को मानेंगे? अब आते हैं मां गंगा पर! गंगा की बात होती है तो राजा भगीरथ तक पहुंचते हैं। जब राजा भगीरथ तक पहुंचते हैं तो राजा सगर तक पहुंचते हैं और फिर यह कड़ियां जुड़ती हैं कि कैसे भगीरथ ने तपस्या की थी और वे गंगा जी को धरा पर लाए थे। महादेव की जटाओं में कैसे माँ गंगा समाई थीं। और फिर वे कैसे महादेव की नगरी काशी में भी आई थीं। काशी तक उनके आने की यात्रा हिंदुओं के इतिहास की यात्रा है।

गंगोत्री से लेकर सुंदरबन तक की उनकी पवित्र यात्रा है। जो भारत की जड़ों से जुड़ा है, उनके लिए वे संसाधन नहीं है बल्कि वे माता है, जो उद्धार करने के लिए आई हैं। यही उनकी पहचान है। माता गंगा में कोई भी आस्थावान हिन्दू जूतों या चप्पलों के साथ नहीं जाता है। माता गंगा का नाम सुनते ही उसके हाथ अपने आप ही श्रद्धा से जुड़ जाते हैं। जीवन की अंतिम बेला में भी माँ गंगा का जल ही उसके लिए आवश्यक होता है।

यही मां गंगा की पहचान है। मां का जल रूपी आशीर्वाद सभी के लिए है, और होना भी चाहिए, परंतु यह भी प्रश्न उठता है कि क्या माँ गंगा के तट पर आने वाले सभी नदी को माँ मानते हैं या फिर केवल संसाधन?

राफेल लेंपकिन के शब्दों में “कल्चरल जीनोसाइड”

मां सभी के लिए होती है। सभी को निश्छल स्नेह प्रदान करती है। उसकी दृष्टि में कोई ऊंचा या नीचा नहीं है। परंतु क्या हो जब नदी के लिए भाव माता से हटकर मात्र संसाधन हो जाएं? गंगोत्री से लेकर सुंदरबन तक आस्था, त्योहार, घाट, आरती और लोकगीतों में वह मां रहती हैं, देवी रहती हैं। जब तक विभाजन नहीं हुआ था, तब तक पद्मा में भी वही रहा करता होगा, जब तक विभाजन नहीं हुआ था तब तक पाकिस्तान में भी सिंधु नदी के तट पर पूजा अर्चना हुआ करती थी।

सिंधु नदी के तट पर भी कभी मंत्र गूंजते होंगे, जब उनकी पहचान माता या देवी के रूप में रही होगी! परंतु अब ऐसा कुछ नहीं है। अब वह मात्र जल संसाधन है; या फिर अल्लाह की निशानी! जैसे ही पूजा करने वाले लोग गायब हुए, नदी की पहचान बदल जाती है। या कहें कि देशाचार बदलते ही नदी और भूमि की पहचान और चरित्र ही बदल जाता है।

क्या होता है देशाचार?

देशाचार का अर्थ हुआ देश/प्रदेश या अञ्चल के निवासियों का आचार और व्यवहार, उनकी परम्पराएं, उनके धार्मिक विचार, उनके सामाजिक विचार आदि। राजतरंगिनी लिखने वाले पंडित जोनराजा ने सिकंदर शाह मिरी के समय हुए देशाचार के विध्वंस के विषय में लिखा है

““कश्मीरदेशाचाराणाम् ध्वंसोऽथ यवनैः कृतः ।
येनैवं विप्लवः प्राप्तः कश्मीरे नागरादिभिः ॥

”अर्थात्, “यवनों ने कश्मीर देश के आचार-विचार (देशाचार) का ध्वंस कर दिया, जिससे कश्मीर में नागर आदि (हिन्दू समाज) में ऐसा विप्लव (विनाश) आ गया।” उन्होंने राजतरंगिनी में स्पष्ट बताया है कि कैसे तलवार के बल पर देशाचार का ध्वंस हुआ। उनमें वह विश्वास भी था, जो वितस्ता को महादेव से जोड़ता था। जो नदियों के तट पर पूजा अर्चना करता था।
जैसा कि ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में वहां के मूल निवासियों के इतिहास से जुड़े हुए पवित्र स्थलों, जो नदी से जुड़े हुए थे, उन्हें संसाधन मानते हुए ब्लास्ट से नष्ट कर दिया। इसे वहां के मूल लोगों ने कल्चरल जीनोसाइड कहा था। जर्मन उपनिवेशवादियों ने अफ्रीका में हेरेरो लोगों के जल स्रोतों को नष्ट कर दिया। उनमें या तो विष मिला दिया या फिर उनके किनारे पहरे बैठा दिए।

इससे उन नदियों को पवित्र मानने वाले लोग या उन जल स्रोतों के आसपास के इतिहास वाले लोग मारे गए। ये कई उदाहरण हैं, जो देशाचार के नष्ट होने पर सभ्यता के विनाश को बताते है। इसी कड़ी में जीनोसाइड विद्वान राफेल लेमकिन की भी बात करते हैं, जो देशाचार के विध्वंस को और भी स्पष्ट तरीके से बताते हैं। उन्होनें अपनी पुस्तक Axis Rule in Occupied Europe में इसे बताया है कि कैसे रक्त की एक भी बूंद बहाए बिना सभ्यता का विनाश हो सकता है। जीनोसाइड हो सकता है! उन्होंने लिखा था “Generally speaking, genocide does not necessarily mean the immediate destruction of a nation, except when accomplished by mass killings of all members of a nation. It is intended rather to signify a coordinated plan of different actions aiming at the destruction of essential foundations of the life of national groups, with the aim of annihilating the groups themselves.”

अर्थात किसी भी समूह को मारने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि रक्त बहाया जाए, बल्कि उसके कई माध्यम हो सकते हैं। और उनमें एक सबसे महत्वपूर्ण था देशाचार का विनाश।

मान्यताओं पर प्रहार

नदी जैसी मान्यताओं पर प्रहार। अवधारणाओं पर प्रहार! जैसे नदी को माता न मानते हुए मात्र संसाधन बना देना और फिर यह कहना कि संसाधन ही तो है, उसमें कुछ भी डालो क्या फर्क पड़ता है?

जैसे कि नदी को संसाधन मानते हुए उनमें ब्रिटिश काल में सीवेज और कारखानों का कचरा फेंका जाने लगा। और फिर आजादी के बाद तमाम प्रयासों के बाद भी यह जारी है। नदियों की माता की पहचान पर हमला था यह।

हालांकि उसे विकास का नाम देकर लोगों ने जैसे अपने अपराध को तुष्ट किया, परंतु बनारस में 15 मार्च 2026 को जो हुआ, वह कहीं से भी अतिक्रमण नहीं था, वह दुस्साहस था। यदि मां गंगा मात्र नदी ही रह जाती हैं तो भी उनमें जूठन नहीं फेंकी जानी चाहिए क्योंकि तब भी वे जल का स्रोत रहती हैं। जो लोग यह कहते हैं कि हिन्दू अपनी अस्थियाँ भी तो बहाते हैं तो हड्डियाँ फेंक दी तो क्या हुआ? तो वे यह भूल जाते हैं कि हिन्दू अंतिम विश्राम लेता है अपनी माँ की गोद में।

यह तुलना ही कल्पना से परे है और जो लोग हिंदुओं को माँ गंगा में धार्मिक कारणों के चलते दूषित करने का आरोप लगाते हैं, वे पाकिस्तान और बांग्लादेश की नदियों को देख सकते हैं। रावी नदी, जिसकी यात्रा ऋग्वेद में पारुष्णी के रूप में थी, महाभारत काल में वे इरावती के नाम से रहीं और वर्तमान में रावी हैं, परंतु विश्व की सबसे प्रदूषित नदी के रूप में अब वह रह गई हैं। उनके तटों पर अब न ही आरती होती है और न ही कोई पूजा अर्चना करने आता है, वह देवी से नदी हो गई है और किस रूप में है, यह देखा जा सकता है।

जब माँ गंगा, पद्मा (प्राचीन गंगा) के रूप में बदलती हैं और उनके आसपास वे लोग अधिक हो जाते हैं, जो नदी को मात्र नदी मानते हैं, मां नहीं तो वह दुनिया की सबसे प्रदूषित नदी के रूप में बदल जाती है क्योंकि उसमें टैनरी उद्योग अर्थात चमड़े के कारखानों का कचड़ा फेंका जाने लगता है। क्योंकि उन्हें माँ मानने वाला देशाचार समाप्त हो गया है, वे लोग गायब हो गए हैं, जो उन्हें माँ मानते थे।

पूरी सभ्यता पर आक्रमण

मां गंगा में जूठी हड्डियाँ फेंकना और फिर उसे मात्र नदी तक सीमित करने के बयान देना, यह पूरी की पूरी सभ्यता पर आक्रमण है। इफ्तार करना विषय नहीं है और न ही किसी ने इस पर आपत्ति दर्ज की है, आपत्ति है जूठन फेंकने से और उस जूठन को अस्थि विसर्जन से तुलना किये जाने पर! आपत्ति है मां गंगा से संबंधित देशाचार समाप्त करने पर, जिसकी यात्रा अनंत काल से चली आ रही है, जो माँ गंगा को मोक्षदायिनी मानता है। जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी विनयपत्रिका में लिखा है

“जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि
नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि, जय जह्नु बालिका ।
बिमल बिपुल बहसि बारि, सीतल त्रयताप-हारि,
भँवर बर बिभंगतर तरंग-मालिका ॥“

मोक्षदायिनी, कलियुग के पापों को हरने वाली मां गंगा को जूठन फेंकने वाली नदी के रूप में बदलने के षड्यन्त्र का विरोध निरंतर होना चाहिए।

Topics: नदियों पर आक्रमणकल्चरल जीनोसाइडगंगा बनारसगंगा में झूठी हड्डियांनदियों की पहचान
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