क्रिटिकलिटी से आत्मनिर्भरता तक: भारत की परमाणु यात्रा का निर्णायक क्षण
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क्रिटिकलिटी से आत्मनिर्भरता तक: भारत की परमाणु यात्रा का निर्णायक क्षण

परमाणु ऊर्जा की पूरी प्रणाली एक सूक्ष्म संतुलन पर टिकी होती है न्यूट्रॉनों का संतुलन। इसी संतुलन को वैज्ञानिक भाषा में क्रिटिकलिटी (Criticality) कहा जाता है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Apr 11, 2026, 07:42 pm IST
inविज्ञान और तकनीक
ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत

ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत

आज का विश्व केवल आर्थिक या राजनीतिक संघर्षों का नहीं, बल्कि ऊर्जा की सुरक्षा और संसाधनों पर नियंत्रण का भी युग है। पश्चिम एशिया में उभरे तनाव, विशेषकर ईरान से जुड़े संघर्ष, ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यूरेनियम अब केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का आधार बन चुका है। जहां एक ओर यह युद्ध विश्व को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की आवश्यकता का संदेश देता है, वहीं दूसरी ओर भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। 5 मार्च 2026 को कलपक्कम स्थित प्रोटोटाइप फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकलिटी प्राप्त की। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता, वैज्ञानिक आत्मविश्वास और भविष्य की दिशा का उद्घोष है।

क्या है क्रिटिकलिटी

परमाणु ऊर्जा की पूरी प्रणाली एक सूक्ष्म संतुलन पर टिकी होती है न्यूट्रॉनों का संतुलन। इसी संतुलन को वैज्ञानिक भाषा में क्रिटिकलिटी (Criticality) कहा जाता है। सरल शब्दों में जब रिएक्टर में होने वाली हर एक नाभिकीय विखंडन (fission) प्रक्रिया आगे उतनी ही नई प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करे, जिससे अभिक्रिया स्वयं चलती रहे तो उस अवस्था को क्रिटिकलिटी कहते हैं।

क्रिटिकलिटी की तीन अवस्थाएं होती है

(1) उप-क्रिटिकल अवस्था – इसमें न्यूट्रॉन उत्पादन से अधिक न्यूट्रॉन हानि होती है। हर चरण में न्यूट्रॉन कम होते जाते हैं , श्रृंखला अभिक्रिया धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।
उपयोग -रिएक्टर को सुरक्षित रूप से बंद करने में

(2) क्रिटिकल अवस्था – इसमें न्यूट्रॉन उत्पादन और न्यूट्रॉन हानि बराबर होती है। श्रृंखला अभिक्रिया स्थिर रहती है ,ऊर्जा उत्पादन लगातार और नियंत्रित रूप से होता है। यही वह अवस्था है जिसमें परमाणु बिजलीघर सामान्य रूप से काम करते हैं। इसमें ऊर्जा उत्पादन स्थिर और रिएक्टर सुरक्षित और नियंत्रित राहत है।

(3) सुपर-क्रिटिकल अवस्था – न्यूट्रॉन उत्पादन अधिक और न्यूट्रॉन हानि कम होती है , इसमें न्यूट्रॉन की संख्या तेजी से बढ़ती है और ऊर्जा उत्पादन तेजी से बढ़ता है। उपयोग -रिएक्टर को शुरू करने (start-up) में और पावर बढ़ाने में होता है लेकिन यदि नियंत्रण न हो तो यह खतरनाक हो सकता है।

फास्ट ब्रीडर तकनीक के संदर्भ में क्रिटिकलिटी का महत्व इस बात में है कि जब कलपक्कम का PFBR क्रिटिकल हुआ अर्थात रिएक्टर की डिजाइन सही है , ईंधन व्यवस्था ठीक काम कर रही है, न्यूट्रॉन संतुलन स्थापित हो गया है। यह संकेत है कि भारत अब फास्ट ब्रीडर तकनीक में सफल हो चुका है। क्रिटिकलिटी वह अवस्था है जहां परमाणु ऊर्जा का संतुलित, नियंत्रित और सतत उत्पादन संभव होता है

भारत की परमाणु ऊर्जा योजना

भारत की परमाणु ऊर्जा नीति केवल बिजली उत्पादन की योजना नहीं है, बल्कि यह एक दूरदर्शी वैज्ञानिक रणनीति है जिसे होमी जहांगीर भामा ने 1950 के दशक में प्रस्तुत किया था। इसका मूल उद्देश्य था सीमित यूरेनियम का अधिकतम उपयोग और प्रचुर थोरियम को ऊर्जा में बदलना। इसे तीन चरणों (Stage I, II, III) में विकसित किया गया है।

चरण 1 – प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR – यूरेनियम आधारित रिएक्टर)

जब यूरेनियम-235 पर एक न्यूट्रॉन गिरता है, तो वह टूट जाता है (इसे विखंडन कहते हैं)। इस प्रक्रिया में 2 से 3 नए न्यूट्रॉन निकलते हैं , और बहुत अधिक ऊर्जा (heat) उत्पन्न होती है। इसी के साथ एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया चलती है यूरेनियम-238 इन न्यूट्रॉनों को अपने अंदर अवशोषित कर लेता है और धीरे-धीरे बदलकर प्लूटोनियम-239 बन जाता है। अर्थात इस चरण में एक तरफ ऊर्जा बनती है दूसरी तरफ नया ईंधन प्लूटोनियम (Plutonium-239) तैयार होता है

चरण 2: फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) –जब प्लूटोनियम-239 पर न्यूट्रॉन गिरता है, तो वह भी यूरेनियम की तरह टूटता है और ऊर्जा उत्पन्न करता है , साथ ही कई नए न्यूट्रॉन छोड़ता है। इन नए न्यूट्रॉनों में से कुछ यूरेनियम-238 द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं और वह फिर से प्लूटोनियम-239 में बदल जाता है। इसी दौरान, जब थोरियम-232 न्यूट्रॉन को पकड़ता है, तो वह धीरे-धीरे बदलकर यूरेनियम-233 में परिवर्तित हो जाता है। इसका मतलब है जितना ईंधन इस्तेमाल होता है , उससे ज्यादा नया ईंधन बनता है। इसी कारण इसे ब्रीडर रिएक्टर कहा जाता है।

चरण 3: एडवांस्ड हेवी वाटर रिएक्टर (थोरियम आधारित ऊर्जा -AHWR) –जब थोरियम-232 न्यूट्रॉन को अवशोषित करता है, तो वह पहले एक मध्यवर्ती तत्व (प्रोटैक्टिनियम-233) में बदलता है, और फिर कुछ समय बाद यूरेनियम-233 में परिवर्तित हो जाता है। इसके बाद जब यूरेनियम-233 पर न्यूट्रॉन गिरता है, तो वह टूटता है और ऊर्जा उत्पन्न करता है साथ ही नए न्यूट्रॉन छोड़ता है। यूरेनियम-233 ऊर्जा देता है, उससे निकले न्यूट्रॉन फिर थोरियम को बदलते हैं और नया यूरेनियम-233 बनता है। यानी यह एक लगातार चलने वाला चक्र (self-sustaining loop) बन जाता है और लगातार ऊर्जा उत्पन्न होती रहती है।

सोडियम कूलेंट: विज्ञान की शक्ति और जोखिम का संतुलन

फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में तरल सोडियम का उपयोग एक अत्याधुनिक तकनीक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लगभग 800°C तक द्रव अवस्था में बना रहता है और अत्यंत कुशलता से ऊष्मा का स्थानांतरण करता है। जहाँ सामान्य रिएक्टरों में पानी का उपयोग किया जाता है, वहीं सोडियम का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि यह न्यूट्रॉनों की गति को धीमा नहीं करता, जिससे रिएक्टर की दक्षता बनी रहती है। लेकिन यह तकनीक पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। सोडियम अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होता है पानी या हवा के संपर्क में आते ही यह आग तक लगा सकता है। यही कारण है कि इसका उपयोग अत्यधिक सावधानी और जटिल सुरक्षा तंत्र के साथ किया जाता है।

विश्व का अनुभव- प्रयास, असफलताएं और सीख

दुनिया के कई विकसित देशों अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान ने इस तकनीक पर कार्य किया, लेकिन अंततः उन्हें इसे बंद करना पड़ा। इसके पीछे मुख्य कारण थे अत्यधिक लागत , सुरक्षा जोखिम और तकनीकी जटिलता। इन देशों ने अरबों डॉलर खर्च किए, परंतु व्यावसायिक सफलता नहीं मिली। केवल रूस इस तकनीक को आगे बढ़ा सका, लेकिन वहाँ भी सोडियम रिसाव जैसी घटनाएँ सामने आईं, जो इसकी जोखिमपूर्ण प्रकृति को दर्शाती हैं।

भारत की पहल -सीख, सुधार और स्वदेशी समाधान

भारत ने इन वैश्विक अनुभवों से सीखकर अपनी राह बनाई। भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) ने 500 मेगावाट क्षमता वाला प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित किया, जो पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। भारत ने सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए बहु-स्तरीय सुरक्षा प्रणाली , डबल सोडियम लूप (ताकि पानी का सीधा संपर्क न हो) , उन्नत लीकेज पहचान प्रणाली और स्वचालित एवं निष्क्रिय सुरक्षा तंत्र। यह केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ठोस कदम है।

आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर भारत

भारत की ऊर्जा चुनौती का मूल कारण सीमित यूरेनियम और बढ़ती मांग है, जबकि थोरियम जैसे संसाधन (विश्व का लगभग 25%, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा) उसे दीर्घकालिक समाधान प्रदान करते हैं। थोरियम को सीधे उपयोग नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे यूरेनियम-233 में बदलकर ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है और यही भारत की रणनीतिक दिशा है।
परमाणु ऊर्जा के साथ रेडियोधर्मी कचरा एक बड़ी समस्या है, जिससे कई देश जूझ रहे हैं, परंतु फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) इस कचरे को पुनः उपयोग में लाकर मात्रा घटाते हैं और ऊर्जा बढ़ाते हैं।

2047 तक भारत की ऊर्जा मांग लगभग तीन गुना होने का अनुमान है। सौर और पवन ऊर्जा वर्तमान जरूरतें पूरी कर रही हैं, परंतु उनकी अनियमितता के कारण स्थिर (baseload) ऊर्जा के रूप में परमाणु ऊर्जा आवश्यक बनी रहेगी।
भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ेगी, पर परमाणु ऊर्जा पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं होगी रक्षा, अंतरिक्ष और उच्च ताप उद्योगों में इसकी आवश्यकता बनी रहेगी।
2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में परमाणु ऊर्जा भारत के लिए एक स्वच्छ और दीर्घकालिक आधार बन सकती है।

पृथ्वी से अंतरिक्ष तक: ऊर्जा आत्मनिर्भरता की यात्रा

भारत की परमाणु ऊर्जा यात्रा हमें यह सिखाती है कि ऊर्जा केवल उत्पादन का विषय नहीं, बल्कि दूरदर्शी चयन का प्रश्न है क्या हम तात्कालिक सुविधा चुनते हैं या दीर्घकालिक स्थिरता। फास्ट ब्रीडर तकनीक और थोरियम आधारित दृष्टिकोण यह दर्शाते हैं कि सीमित संसाधनों को भी निरंतर ऊर्जा चक्र में बदला जा सकता है। यह उपभोग से पुनरुत्पादन की ओर बढ़ने की सोच है।

आने वाले समय में भारत के लिए चुनौती केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा के बीच संतुलन स्थापित करना होगा, ताकि ये एक-दूसरे के पूरक बनें। साथ ही, सुरक्षा, पारदर्शिता और जन-विश्वास इस विकास के आधार बनेंगे।
भविष्य की राह और भी व्यापक है। जब मानव चंद्रमा और मंगल जैसे ग्रहों पर बसेगा, तब निरंतर और विश्वसनीय ऊर्जा की आवश्यकता होगी, जहाँ परमाणु ऊर्जा ही सबसे सक्षम विकल्प बन सकती है।

इस प्रकार, भारत की ऊर्जा यात्रा पृथ्वी तक सीमित नहीं, बल्कि अंतरिक्ष तक विस्तृत संभावनाओं की ओर अग्रसर है, जहाँ सीमित संसाधनों के बीच असीम भविष्य का निर्माण संभव है।

 

Topics: कलपक्कमक्रिटिकलिटी परमाणु ऊर्जाक्या है क्रिटिकलिटीभारत परमाणु ऊर्जा
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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