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हर तीसरा खेत खतरे में…. बचा लो भूमि, भोजन और भविष्य- राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण की रिपोर्ट अहम

वैश्विक ताकत बनना भारत का सपना हो सकता है, लेकिन देश की सबसे बड़ी ताकत,यानी उसकी मिट्टी कमजोर हो रही है।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य — edited by Lalit Fulara
Apr 10, 2026, 03:08 pm IST
inविश्लेषण, मत अभिमत

वैश्विक ताकत बनना भारत का सपना हो सकता है, लेकिन देश की सबसे बड़ी ताकत,यानी उसकी मिट्टी कमजोर हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि देश की लगभग एक-तिहाई भूमि खराब हो चुकी है।यह केवल कृषि नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और जनस्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है। राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण और भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो जैसे प्रमुख संस्थान ने स्पष्ट रुप से अवगत कराया जा चुका है कि भारत की लगभग 146.8 मिलियन हेक्टेयर (यानी करीब 30 प्रतिशत) भूमि खराब हो चुकी है। बड़ी चिंता इसलिए भी है, क्योंकि भारत के पास विश्व की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि है, लेकिन कंधों पर 18 प्रतिशत वैश्विक आबादी का पेट भरण का जिम्मा कंधों पर लिया है।

आज का भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के साथ विश्व रैकिंग दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन यह वृद्धि प्राकृतिक उर्वरता के कारण नहीं, बल्कि रसायनों और तकनीकी सहारे है। इन हालात पर पैनी निगाह रखने वाले मानते हैं कि यदि यही स्थिति रही, तो भविष्य में भारत को खाद्यान्न आयात भी करना पड़ सकता है।मिट्टी के बिगड़ने के पीछे प्रकृति से खिलवाड़ पर आमादा इंसान की कारगुजारी वजह हैं।इनमें महत्वपूर्ण भूमिका के रुप में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने निभाई,क्योंकि इनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी के पोषक तत्वों को तबाह कर उसे असंतुलित कर रहा है। ऊपर से अधिक सिंचाई और भूजल दोहन ने जलस्तर गिरा दिया है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। वनों की तेजी से चल रही कटाई ने भी मिट्टी के कटाव को तेज करने काम किया है। विशेषज्ञ इनके सहित औद्योगिक कचरे और सीवेज मिट्टी को भारी धातुओं से हो रहे प्रदूषण को भी जिम्मेदार मानते हैं। कुल मिलाकर इन सभी कारणों से मिट्टी का क्षय हुआ है।

इन हालात में सुधार की एक बड़ी उम्मीद और कार्ययोजना के साथ 2016 में अक्षय कृषि परिवार सामने आया। इस अभियान के अंतर्गत साल 2016 से प्राकृतिक खेती और कृषि जागरूकता के क्षेत्र में गतिविधियां शुरु हुई। वैश्विक महामारी कोविड के दौरान भी यह गतिविधियां नहीं थमी। इसी के तहत राष्ट्रीय स्तर पर भूमि सुपोषण एवं संरक्षण जन अभियान जारी है। उत्तर क्षेत्र के ग्राम विकास संयोजक राकेश कुमार का कहना है कि संगठन का मुख्य उद्देश्य सभी के लिए विषमुक्त भोजन सुनिश्चित करना और किसानों को रासायनिक खेती से हटाकर टिकाऊ कृषि पद्धति की ओर प्रेरित करना है। अक्षय कृषि परिवार इस अभियान के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान आधारित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, प्रशिक्षण, सुपोषण, संगठन और जागरूकता के जरिए इसे जन-जन तक पहुंचाने में जुटा है।

संगठन का मानना है कि यह अभियान केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि धरती माता के प्रति जिम्मेदारी निभाने का एक ऐतिहासिक प्रयास है। पिछले दशकों में कृषि पद्धतियों में हुए बदलावों के कारण भूमि की जो उर्वरता प्रभावित हुई है,उसे सुधारना समय की आवश्यकता है। संगठन का मुख्य उद्देश्य सभी के लिए विषमुक्त भोजन सुनिश्चित करना और किसानों को रासायनिक खेती से हटाकर टिकाऊ कृषि पद्धतियों की ओर प्रेरित करना है। अभियान को सफलता से चलाने के लिए लगातार बैठकें चल रही है। राकेश कुमार ने बताया कि देशभर में आयोजित विभिन्न सम्मेलनों के माध्यम से भूमि संरक्षण, देशी बीजों के उपयोग, पशु आधारित कृषि प्रणाली और प्राकृतिक संसाधनों के सामुदायिक प्रबंधन जैसे विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया है। इन चर्चाओं के आधार पर अब जन अभियान के रूप में इसे आगे बढ़ाया जा रहा है। अभियान के तहत देशभर में संवाद, प्रशिक्षण और कार्यशालाओं के माध्यम से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं। अभियान की सफलता के लिए धर्मगुरुओं,शिक्षाविदों, विशेषज्ञों,लेखकों, जागरुक किसानों और आमजन का सहयोग लिया जा रहा है।अभियान के माध्यम से समाज को मूलमंत्र दिया जा रहा है ,ताकि भूमि,भोजन और भारत का भविष्य सुरक्षित रहे।

Topics: agriculture crisis soil erosion Indiafood security future India soil reportenvironmental warning farmland degradationsoil degradation India reportone third farmland at risk Indianational soil survey report Indiasoil health crisis agriculture Indialand degradation threat food securitysave soil campaign India agriculturefarmland fertility declining India
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
वरिष्ठ पत्रकार [Read more]
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