अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे युद्ध के बीच ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अपनी कमाई के लिए इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। ईरानी संसद में एक ड्राफ्ट बिल तैयार किया गया है, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से ‘सुरक्षित मार्ग’ के लिए टोल वसूलने का प्रावधान है।
क्या है यह प्रस्ताव?
ये मसौदा ईरान के संसद सदस्यों ने एक कानून का मसौदा तैयार किया है, जो जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए पैसे चुकाने को अनिवार्य बनाएगा। फार्स न्यूज एजेंसी के मुताबिक, यह बिल अगले हफ्ते तक अंतिम रूप ले सकता है। इसका मकसद ईरान को इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर अपना नियंत्रण कानूनी रूप से मजबूत करना है।
अभी अनौपचारिक तौर पर कुछ जहाजों से 20 लाख डॉलर तक की रकम मांगी जा रही है। नया बिल इसे औपचारिक और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है। जहाजों को अपना क्रू, कार्गो और रूट की डिटेल्स शेयर करनी होंगी, अक्सर किसी मध्यस्थ के जरिए।
क्यों अहम है होर्मुज
दरअसल, होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री रास्तों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ता है। यहां से रोजाना औसतन 140 जहाज गुजरते हैं, जिनमें ज्यादातर तेल और गैस के टैंकर होते हैं। दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। जलडमरूमध्य करीब 140 मील लंबा है, लेकिन सबसे संकरा हिस्सा सिर्फ 25 मील चौड़ा है। पानी उथला होने और आसपास की पहाड़ियों की वजह से यहां माइन्स और मिसाइलों का खतरा रहता है।
क्या है पूरा मामला
मामला कुछ यूं है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला किया। इसके बाद से ईरानी आईआरजीसी ने खाड़ी देशों को दहलाना शुरू कर दिया। य़हीं नहीं ईरान ने होर्मुज को बंद कर दिया। हमलों के बाद से यहां यातायात बहुत कम हो गया है। अब सिर्फ कुछ जहाज गुजर पा रहे हैं — ज्यादातर ईरान या चीन से जुड़े, या इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की मंजूरी वाले। ईरान ने भारत जैसे ‘मित्र राष्ट्रों’ को भी कुछ राहत दी है। बड़ी बात ये है कि युद्ध की वजह से पर्सियन गल्फ में तेल उत्पादन रुक गया है, कुछ रिफाइनरियां क्षतिग्रस्त हुई हैं। टैंकर ट्रैफिक फरवरी 28 के बाद से काफी घटा है।
इस युद्ध का असर ये हो रहा है कि इससे वैश्विक तेल बाजार प्रभावित हुआ है। ब्रेंट क्रूड का भाव 114 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया था और अब भी 100 डॉलर से ऊपर बना हुआ है। ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं, बाजार अस्थिर हुए हैं और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है।











