पाकिस्तान में इस्लामाबाद में ईसाई कॉलोनी पर लटकी सरकारी तलवार: लोगों ने पूछा “कहाँ जाएंगे हजारों लोग?”
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पाकिस्तान में इस्लामाबाद में ईसाई कॉलोनी पर लटकी सरकारी तलवार: लोगों ने पूछा “कहाँ जाएंगे हजारों लोग?”

इस्लामाबाद की रिमशा, अकरम मसीह गिल और अल्लामा इकबाल कॉलोनियों में 25,000 ईसाई परिवार CDA की बेदखली कार्रवाई से खतरे में। बिना पुनर्वास के घर छीनने का विरोध जारी।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Mar 20, 2026, 12:22 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
Islamabad Imsha colony protest

प्रतीकात्मक तस्वीर

पाकिस्तान में इस्लामाबाद में इस समय ईसाई समुदाय के हजारों लोग सड़कों पर हैं। इस बार किसी लड़की के जबरन अपहरण और निकाह को लेकर वे सड़कों पर नहीं है, अपितु वे सरकार द्वारा अपनी कॉलोनी को कब्जाने के खिलाफ सड़कों पर हैं। जिस जमीन पर वे दशकों से रहते आ रहे हैं, उन्हें अब उसे खाली करने के लिए कहा जा रहा है और वह भी बिना किसी वैकल्पिक आवासीय व्यवस्था के।

ईसाइयों की है बुरी स्थिति

गौरतलब है कि पाकिस्तान में ईसाई समुदाय के अधिकतर लोग काफी गरीब हैं और वे सफाई कर्मी,, मजदूर और बंधुआ मजदूर तक का कार्य करते हैं। ऐसे में यह सहज ही कल्पना की जा सकती है कि अगर उन्हें उनकी कॉलोनी से ही बेदखल कर दिया गया तो वे कहाँ जाएंगे? पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव की भी बहुत अधिक परतें हैं, ऐसे में उन्हें कहाँ पर घर मिलेगा, यह भी एक प्रश्न है।

मेगाफोन से एक आदेश-घर खाली करो

कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी ने पिछले हफ़्ते रिमशा, अल्लामा इक़बाल और अकरम मसीह गिल झुग्गी बस्तियों के निवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया। इन आदेशों की घोषणा मेगाफ़ोन के ज़रिए की गई। इसके बाद तोड़-फोड़ की कार्रवाई शुरू हो गई।

christiandaily.com के अनुसार यहाँ पर रहने वाले लोगों का कहना है कि इस आदेश ने उनकी नींदें उड़ा दी हैं और उनके दिलों में उनके घर छीने जाने का खौफ भर गया है। और ये घर आज के नहीं बल्कि कई दशकों से बने हुए हैं। रिमशा कॉलोनी में रहने वाले अनवर मसीह का कहना था कि “हम कहाँ जाएंगे?” अनवर मसीह ने क्रिश्चियन डेली से बात करते हुए भावुक होते हुए कहा कि “हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। और जब से यह हालात शुरू हुए है, हमारे घर में सभी लोग चिंता में हैं। बच्चे तो रात में छैन से सो भी नहीं पाते हैं।“

इस आंदोलन का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

इस्लामिक कट्टरता का दंश झेलने को मजबूर ईसाई

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर वैसे ही कई प्रकार से अत्याचार होते रहे हैं। उनके धार्मिक स्थलों को तोड़ा जाता है, उनकी बेटियों को उठाकर ले जाया जाता है और जबरन निकाह पढ़वाया जाता है। बलात धर्मपरिवर्तन किया जाता है और इसके साथ संस्थागत भेदभाव भी हैं। कई वर्ष पहले एक रोजगार विज्ञापन निकला था, जिसमें सफाई कर्मियों के लिए केवल गैर मुस्लिम ही मांगे गए थे। अभी भी पाकिस्तानी धारावाहिकों में घरों में काम करने वाले नौकरों को हिन्दू भी दिखाया जाता है। वहाँ के धारावाहिकों में से गैर मुस्लिम और उनकी समस्याएं गायब रहती हैं।

यही कारण है कि अभी वे जिस समस्या का सामना कर रहे हैं, उसके विषय में भी विमर्श बनना संभव नहीं लगता है। सामुदायिक नेता इमरान शहजाद सहोत्रा ने कहा कि “झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों को बिना किसी वैकल्पिक आवास की व्यवस्था के जमीन खाली करने का आदेश देना अन्याय है।“

भेदभाव की जिंदगी जी रहे पाकिस्तानी ईसाई

उनके अनुसार यहाँ पर रहने वाले अधिकांश नागरिकों के पास कहीं और जाने का विकल्प है ही नहीं, क्योंकि उनकी सीमित आय है और साथ ही पाकिस्तान के घरों के बाजार में उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है अर्थात उन्हें सहजता से घर नहीं मिलता है। ऐसे में वे कहाँ जाएंगे, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिसे समुदय के नेता और आम लोग पूछ रहे हैं।

रिमशा कॉलोनी इस्लामाबाद की सबसे बड़ी अनौपचारिक बस्तियों में से एक है, जहाँ हज़ारों कामकाजी लोग रहते हैं। इनमें से कई ईसाई हैं जो सफ़ाई कर्मचारी, घरेलू सहायक, निर्माण मज़दूर और अन्य कम आय वाले मज़दूरों के तौर पर काम करते हैं; ये लोग शहर के रोज़मर्रा के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं।

समय के साथ यहाँ पर छोटे चर्च बन गए,, लोगों ने छोटे-मोटे स्कूल्स भी खिल लिए और समुदाय मिलकर एक दूसरे के साथ रहने लगा। फिर भी वहाँ के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का यही कहना ठा कि इस क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। सरकार ने सुविधाएं देने के स्थान पर उनसे उनके घर ही छीन लिए हैं।

इस कालोनी का दुखद इतिहास

इस कॉलोनी को रिंसहा कॉलोनी क्यों कहा जाता है, इसका भी दुखद इतिहास है। दरअसल इसका नाम वर्ष 2012 की उस घटना से जुड़ा है, जिसमें एक मानसिक रूप से कमजोर ईसाई बच्ची रिमशा पर कुरान की बेअदबी का आरोप लगाया गया था। इस्लामाबाद के एफ-12 सेक्टर में कुरान के पन्ने जलाने का उस पर आरोप था। हालांकि वे सभी आरोप झूठे पाए गए थे, मगर इस घटना ने आसपास मे रहने वाले ईसाई पड़ोसियों के दिलों में डर भर दिया था।

इसी संकट के समय, कई ईसाई परिवार जो जी 12 के पास महरबंदी में रहा करती थीं, वे हिंसा के डर से अपने घर छोड़कर भाग गए थे और उन्हें सेक्टर एच 9 में अस्थाई शेल्टर बनाने की अनुमति दी गई थी। शुरुआत में यहाँ पर टेंट थे और फिर समय के साथ लोगों ने पक्के घर बना लिए और यह कॉलोनी रिमशा कॉलोनी कहलाने लगी थी।

अल्पसंख्यकों का शोषण कर रहा पाकिस्तान

यह और भी दुर्भाग्य की बात है कि जहां सरकार का फर्ज होता है कि वह अपने हर नगरिक के हर अधिकार की रक्षा करे, वहीं वह पहले से ही डर के साये में रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को उनके उन घरों से निकाल रही है, जहां पर रहने की अनुमति खुद सरकार ने दी थी। क्या सरकार को इन्हें स्थाई निवास नहीं देना चाहिए? पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने भी कहा कि चूंकि अधिकारियों ने खुद ही इन लोगों को रिमशा कांड के बाद यहाँ पर बसाया था, तो वे खुद ही इन्हें कैसे हटा सकते हैं?

उसने प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, इंटीरियर मंत्री और कौमी मामलों के मन्त्रालय से अनुरोध किया है कि वे तत्काल ही इस मामले को देखें और अधिकारियों से कार्यवाही रोकने के लिए कहें! परंतु सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या ऐसा होगा? क्या इन हजारों परिवारों के साथ, जिनका घर उनसे छीना जा रहा है और वह भी उन्हीं लोगों द्वारा जिन्होनें उन्हें रहने की अनुमति दी थी।

अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता सैमसन सलामत ने भी प्रस्तावित बेदखलियों की आलोचना करते हुए कहा कि बिना पुनर्वास के इस तरह की कार्रवाई पाकिस्तान की 2001 की राष्ट्रीय आवास नीति का उल्लंघन होगी।

इस नीति के अनुसार तब तक गैर कानूनी बस्तियों के किसी भी निवासी को तब तक सरकार बेघर नहीं कर सकती जब तक कि उन्हें औपचारिक पुनर्वास योजनाओं के अंतर्गत दोबारा नहीं बसा देती।

अतिक्रमण हटाने के नाम पर ईसाइयों पर अत्याचार

हालांकि सिटी डेवलपमेंट अथॉरिटी का कहना है कि वह यह सब अतिक्रमण हटाने के लिए कर रही है। उसका कहना है कि वह कानून व्यवस्था लागू करने और शहर के मास्टर प्लान को लागू करने के यह कदम उठा रही है। और उसका यह भी कहना है कि वह देखेगी कि क्या इन्हें अधिकारियों ने बसाया था, तो वह इस अग्रीमेंट का पालन करेगी।

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