सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने वाली याचिका खारिज की, कहा- 'महिलाओं को नुकसान होगा'
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सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने वाली याचिका खारिज की, कहा- ‘महिलाओं को नुकसान होगा’

सुप्रीम कोर्ट ने शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की PIL खारिज कर दी, जिसमें देशभर में महिलाओं के लिए पेड पीरियड लीव की मांग थी। CJI सूर्या कांत ने कहा कि अनिवार्य अवकाश से महिलाओं को नौकरी मिलना मुश्किल हो सकता है और जेंडर स्टीरियोटाइप्स बढ़ेंगे।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Mar 13, 2026, 02:25 pm IST
in भारत
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश को लेकर चल रही बहस को विराम देते हुए इसे महिलाओं के आत्मसम्मान के खिलाफ करार दिया है। इसी के साथ मामले में दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है। यह इस मामले में सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने से महिलाओं को नुकसान हो सकता है।

याचिका किसने दायर की थी

यह पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) शैलेंद्र मणि त्रिपाठी नाम के व्यक्ति ने दाखिल की थी। याचिका में मांग की गई थी कि पूरे देश में महिलाओं के छात्राओं और कर्मचारियों के लिए मासिक धर्म के दौरान पेड लीव की नीति बनाई जाए। याचिकाकर्ता ने कुछ राज्यों और संस्थानों के उदाहरण दिए, जैसे केरल में स्कूलों में छूट दी गई है और कुछ प्राइवेट कंपनियां खुद से यह सुविधा दे रही हैं।

इस मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने की। याचिकाकर्ता की तरफ से सीनियर एडवोकेट एम आर शमशाद ने पैरवी की। याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने पहले ही संबंधित अथॉरिटीज को अपना प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) सौंप दिया था। इस पीआईएल पर चीफ जस्टिस ने सख्त सवाल उठाते हुए उठाते हुए कहा कि ऐसे प्लान महिलाओं को कमतर दिखाने की कोशिश लगते हैं। उनका कहना था, “ये याचिकाएं डर पैदा करने के लिए हैं, महिलाओं को हीन भावना महसूस करवाने के लिए — कि मासिक धर्म उनके साथ कुछ बुरा हो रहा है।”

उन्होंने आगे कहा कि इसे सकारात्मक अधिकार के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन नियोक्ता (एम्प्लॉयर) का पक्ष भी देखना चाहिए, जिसे पेड लीव देनी पड़ती है। बेंच ने वॉलंटरी (स्वैच्छिक) नीतियों की तारीफ की और कहा, “वॉलंटरी तरीके से देना बहुत अच्छा है। लेकिन जैसे ही इसे कानून में अनिवार्य कर दिया जाए, कोई उन्हें जॉब नहीं देगा। न्यायपालिका या सरकारी नौकरियों में भी नहीं लेंगे — उनका करियर खत्म हो जाएगा। लोग कहेंगे कि घर पर बैठ जाओ और सबको बता दो।”

महिलाओं के नौकरी पाने की संभावनाएं घटेंगी

कोर्ट का मानना था कि अनिवार्य लीव से महिलाओं की नौकरी पाने की संभावना कम हो सकती है, क्योंकि नियोक्ता सोचेंगे कि महिलाओं को अतिरिक्त छुट्टियां मिलेंगी तो उन्हें रखना मुश्किल होगा। इससे जेंडर स्टीरियोटाइप्स (लिंग आधारित पुरानी सोच) और मजबूत हो सकती है, जो महिलाओं के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

फैसला क्या आया

सुप्रीम कोर्ट ने पीआईएल को खारिज कर दिया। साथ ही कोई भी अनिवार्य देशव्यापी नीति बनाने का आदेश नहीं दिया गया। हालांकि, बेंच ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के रिप्रेजेंटेशन पर विचार करें और स्टेकहोल्डर्स से बात करके उचित फैसला लें। यह फैसला महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को मानते हुए भी आया, लेकिन कोर्ट ने जोर दिया कि कानूनी रूप से जबरदस्ती करने से उल्टा असर पड़ सकता है।

Topics: मासिक धर्मCJI सूर्या कांतसुप्रीम कोर्ट मासिक धर्म अवकाशपीरियड लीव याचिका खारिजशैलेंद्र मणि त्रिपाठी PILमहिलाओं की नौकरी प्रभावितmenstrual leave supreme courtperiod leave India
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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