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वर्जित सहजताओं पर प्रश्न उठाने की कैसी प्रगतिशील विवशता?

तमिलनाडु में रजस्वला होने वाली लड़की का स्वागत किया जाता है, उसकी विशेष पूजा आदि की जाती है। ऐसी ही परम्पराएं कर्नाटक, असम समेत कई राज्यों में हैं।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Apr 1, 2023, 04:35 pm IST
in भारत, विश्लेषण, मत अभिमत
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

साहित्य या विमर्श में एक धारा है और उसे प्रगतिशील कहा जाता है। प्रगतिशील इसलिए क्योंकि इसमें उन कथित वर्जनाओं पर विमर्श करना सम्मिलित होता है, जिनके विषय में प्रगतिशीलों का कथन है कि भारतीय लोक में उन पर बात नहीं होती है एवं कथित प्रगतिशील साहित्य ही उस पर बात करता है। वैसे यह वर्जनाएं क्या हैं, उस विषय में प्रश्न करने पर प्रगतिशीलता बहुत ही सुविधाजनक मौन साध लेती है। वह प्रायोजित एजेंडे के अनुसार ही विमर्श करती हैं और वर्जनाएं तय करती हैं तथा उन तमाम परम्पराओं को प्रताड़ना बनाकर प्रस्तुत करने लगती हैं, जिन्हें भारतीय लोक में सहज लिया गया है।

भारतीय लोक में उन सभी विषयों को सहज लिया गया है, जिसे पश्चिमी चेतना से प्रभावित विमर्श वर्जना कहता है। भारत के लोक में तो विमर्श चला है, संरक्षण का विमर्श, प्रेम का विमर्श, परिवार का विमर्श एवं उन तमाम शारीरिक अवस्थाओं का विमर्श, जिन्हें पश्चिम से जनित विमर्श वर्जनाएं मानता है, भारतीय लोक उत्साह से परिपूर्ण है, वह जन्म से लेकर मृत्यु तक की तमाम अवस्थाओं को संस्कारों के माध्यम से अपनाना एवं उनका आदर करना जानता है, उसमें रुदन नहीं है और हो भी नहीं सकता है। उसमें कृतज्ञता है, कृतज्ञता है परम शक्ति के प्रति। कृतज्ञता है प्रकृति के प्रति एवं कृतज्ञता है जीवन के प्रति।

अत: जब से शिशु गर्भ में भ्रूण रूप में प्रवेश करता है, तभी से संस्कारों के माध्यम से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की यात्रा आरम्भ हो जाती है, शिशु जन्म लेता है, तो उसके स्वागत के लिए संस्कार है, शिशु प्रथम बार अन्न ग्रहण करता है तो उसके लिए संस्कार है, शिशु की शिक्षा के लिए संस्कार है, उपनयन संस्कार हैं, ऐसे ही तमाम संस्कारों से होते हुए लोक जब स्त्रियों की ओर देखता है तो पाता है कि वह तो एक विशेष ही अवस्था से होकर गुजरती है। वह एक विशेष शारीरिक एवं उसके चलते मानसिक पीड़ा या कहें असमंजस की स्थितियों से होकर गुजरती है। ऐसे में लोक ने उसके स्त्रीत्व के आरम्भ होने की अवस्था को सहज बनाने के लिए एवं वह किसे टैबू से होकर न गुजरे, वह किसी असंतुलित विमर्श या पीड़ा या वेदना के विकृत विमर्श का हिस्सा न बन जाए, यह संभवतया संज्ञान में लेते हुए कई ऐसे विमर्श आरम्भ कर दिए गए, जो सहज उल्लास से परिपूर्ण थे एवं जिनमें इस प्रक्रिया को भी सहजता से स्वीकार करने का विमर्श था।

स्त्रीत्व के आरम्भ का उत्सव
यह अवस्था है, स्त्रीत्व के आरम्भ की अवस्था अर्थात मासिक चक्र का आरम्भ। यह 12 वर्ष की आयु से लेकर 14 वर्ष की आयु में बच्चियों के जीवन में दस्तक दे देता है। जब यह दस्तक देता है तो पहले तो बच्चियों को समझ में भी नहीं आता है कि उनके साथ यह क्या हुआ?
क्या कोई शारीरिक विकृति तो नहीं आरम्भ हो गयी? क्या किसी आपदा ने तो दस्तक नहीं दे दी? क्या उनसे कुछ गलत कृत्य तो नहीं हो गया? ऐसे तमाम प्रश्न उनके दिल में उत्पन्न होने लगते हैं, उनके हृदय में तमाम आशंकाएं जन्म लेती हैं। ऐसे में किसी भी जागृत समाज का क्या उत्तरदायित्व है? ऐसे में उस समाज का क्या उत्तरदायित्व हो सकता है जो चिकित्सा से लेकर दर्शन तक में इतना समृद्ध है कि प्रेरणा लेने के लिए समूचा विश्व कतार लगाकर आता रहता है। ऐसे में क्या उस लोक का यह दायित्व नहीं था कि वह अपनी बेटियों को सम्हालता एवं उन्हें उनके स्त्री होने की इस घटना के प्रति सहज रहना सिखाता। वह उन्हें बताता कि यह तो दरअसल प्रभु द्वारा दिए गए जन्म का सबसे सौन्दर्यपरक आयाम है। यह एक ऐसी घटना है, जिसके बाद वह स्वयं ही सृष्टि के समकक्ष जाकर खड़ी हो गयी है।

हाँ, सृजन के आनंद के साथ प्रकृतिस्थ होने में कुछ समायोजन में समस्या हो सकती है, वह जो भीतर रक्त है और जब वह बाहर आ रहा है, तो उसके परिणामस्वरूप होने वाला जो शारीरिक परिवर्तन है, वह भीतर ही भीतर असहज कर सकता है, अत: उसे इतनी गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है, बस सहज रहना है एवं स्वयं में सजग रहना है। यहाँ तक कि यह इसी लोक में सम्भव था कि भूमि को भी रजस्वला मानकर उन्हें भी चार दिनों तक आराम करने की बात की जाए। जब भूमि के स्त्रीत्व का उत्सव मनाया जाए। कई राज्यों में रज-पर्व मनाया जाता है, जिसमें स्त्रियाँ अपनी धरती माँ की इस पवित्र अवस्था का उत्सव मनाती हैं। दरअसल वह स्त्रीत्व का उत्सव मनाती हैं, उन्हें यह भान है कि माँ भी स्त्री हैं एवं वर्षा के आरम्भ अर्थात सृष्टि के सृजन के आरम्भ में उसे भी उसी प्रक्रिया से होकर गुजरना है, जिस प्रक्रिया से हर स्त्री गुजरती है। लोक अपनी माँ के रजस्वला होने का भी उत्सव मनाता है।

ओड़िशा में रज पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
असम में माँ कामाख्या देवी के रजस्वला होने पर भी उत्सव मनाया जाता है। देवी की 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ कामाख्या देवी में पांच दिवसीय अंबूवाची मेले का आयोजन मात्र इसीलिए किया जाता है क्योंकि माँ रजस्वला हैं। कोई कल्पना कर सकता है लोक के मध्य स्त्रियों के स्त्रीत्व की इतनी महान सोच की? क्या कोई भी सभ्यता इस स्तर तक उच्चता प्राप्त कर सकती है कि वह अपने आराध्यों की शारीरिक अवस्था का उत्सव मनाए एवं वह भी ऐसा कि उसमें समस्त प्रकृति ही लयबद्ध हो जाए, समस्त जन ही आनंदित हो जाए। ऐसा उत्साह बहुत ही कम देखने को मिलता है। यह किसी भी जागृत सभ्यता की महानता की सर्वोच्च स्थिति है कि जहां पर वह स्त्रियों के प्रति इतनी कृतज्ञता एवं आदर से भरी है। यही कारण है कि लोक अपनी बेटियों को भी इस अवस्था के प्रति सहज करता है। और उसमें भी वह इसी प्रकार सहज करता है, वह अपनी बेटियों को यह आश्वस्त करता है कि जो उसकी अभी अवस्था है, वह सृजन का प्रथम पायदान है। वह स्वयं में बन रही प्रकृति का प्रथम चरण है। यह कोई विकृति नहीं है, अपितु यह सहज होना है। यह देह के साथ सहज होना है, देखो भूमि भी तो रजस्वला होती है और देखो हमारी आराध्य भी रजस्वला होती हैं।

तमिलनाडु में भी ऐसी ही एक परम्परा है
भारत में तमिलनाडु में एक ऐसी ही परम्परा है, जिसमें बेटियों को इस अवस्था के प्रति सहज किया जाता है। यह एक आश्वासन है कि वह अब प्रकृति को समझने के योग्य हो गयी है एवं अब वह स्वयं में हो रहे निरंतर परिवर्तनों को अनुभव कर सकती है, उसी भांति जैसे पृथ्वी करती है। तमिलनाडु में रजस्वला होने वाली लड़की को विशेष अनुभव कराया जाता है। समाज में उसका स्वागत किया जाता है तथा विशेष पूजा आदि की जाती है। इसे मंजल निरातु विजा कहा जाता है। इसमें लड़कियों को इस बात से अवगत कराया जाता है कि अब वह बड़ी हो रही हैं। अब उनके भीतर धारण करने की क्षमता आ रही है। परिवार के लोगों को कार्ड आदि से आमंत्रित किया जाता है। लड़की के चाचा नारियल, आम और नीम के पत्तों से झोपडी बनाते हैं और फिर उसमें लड़की रहती है। लड़की के लिए अच्छे अछे पकवान रखे जाते हैं। इस पूरे समारोह को इतने भव्य तरीके से मनाया जाता है कि उसकी फोटोग्राफी भी की जाती है एवं लड़की को रेशमी साड़ी पहनाकर दुल्हन की तरह सजाकर नए जीवन के लिए तैयार कर दिया जाता है। जब पहली बार लड़की रजस्वला होती है तो लड़की का विशेष ध्यान रखा जाता है, जो भी पकवान बनते हैं वह इसी प्रकार बनते हैं कि लड़की को वह पोषण प्राप्त हो कि उसकी देह में जो कमी हो गयी है, उसकी पूर्ती हो सके।

इसमें लड़की को हल्दी से स्नान कराया जाता है। हल्दी के औषधीय गुण आज विज्ञान भी मानता है। हल्दी से स्नान करने से तमाम कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, ऐसा अब हर कोई मानता है तो इस समारोह में लड़की के भोजन से लेकर लड़की की व्यक्तिगत साफ़ स्वच्छता एवं कीटाणु से रक्षा तक का प्रबंध किया जाता है। अर्थात एक लड़की के लिए यह ऐसा अवसर होता है जब उसे शारीरिक एवं मानसिक तथा आध्यात्मिक रूप से उस कर्तव्य के लिए तैयार किया जाता है, जो आने वाले जीवन में उसकी प्रतीक्षा में है। यह लड़की को सहज बनाने का अवसर होता है और यह मात्र तमिलनाडु में होता है ऐसा भी नहीं है! कई राज्यों में लड़की को आने वाले जीवन के अवसरों के प्रति सहज बनाने के लिए ऐसी परम्पराएं हैं। कर्नाटक, असम में भी ऐसी परम्पराएं हैं। जहां पर परम्पराएं नहीं भी हैं, वहां पर भी लड़की को प्रथम बार रजस्वला होने पर यह अनुभव कराया जाता है कि वह प्रकृति होने की ओर अग्रसर हो रही है। हाँ, जहाँ पर यह परम्पराएं हैं, वहां पर उन्हें धार्मिक रूप से स्वच्छता का भान कराते हुए सहज कर दिया जाता है।

लिबरल या वर्जना तोड़ने वाले वर्ग को इन परम्पराओं से आपत्ति है
हमने यह देखा कि कैसे इतने बड़े विषय पर सहजता एवं उत्सव के विमर्श को भारतीय लोक लेकर चलता है। क्योंकि रजस्वला होने को उन्होंने धरा से जोड़ा है, और माँ शक्ति से जोड़ा है। लोक ने लड़की से कहा कि वह चूंकि प्रकृति है और प्रकृति भी तो रजस्वला होती है। और लड़की इस अवस्था के प्रति कर्तव्यों को लेकर सजग हो जाती है। फिर भी एक वर्ग है, जिसे हिन्दुओं के हर पर्व के साथ समस्या है। उसे यह समस्या है कि आखिर रक्षाबंधन पर बहन राखी क्यों बांधे? उसे यह समस्या है कि आखिर करवाचौथ पर महिला व्रत क्यों रखे? उसे यह समस्या है कि आखिर हर व्रत लड़कियां ही क्यों रखें? और उसके साथ यह भी समस्या है कि उस वर्ग को कोई परम्परा भी नहीं निभानी है परन्तु मंदिर में अवश्य जाना है और वह भी रजस्वला की अवधि में!

वह वर्ग, रजस्वला की इस अवस्था को, जिसमे महिला को कुछ विशेष आराम की आवश्यकता होती है, और जिसे लेकर लोक ने विशेष खानपान एवं आराम की व्यवस्था की उसे भी आम दिनों की ही भांति बना देना चाहता है। जिस अवस्था में लड़की को स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, उन दिनों में वह उसे जबरन बाहर जाने को लेकर आन्दोलन करने पर विवश करता है, ऐसा वह मात्र इसलिए करता है ताकि वह उस कर्तव्य बोध को समाप्त कर सके जो लोक ने लड़की के साथ इस विशेष अवसर पर जोड़ा है। वह उस विशेषता के बोध को समाप्त करना चाहता है, वह उस सम्मान को समाप्त करना चाहता है जो लोक ने कन्या से युवती बनने की गौरवपूर्ण यात्रा के सम्मान में लड़की को सौंपा है। वह वर्ग थोपी गयी छद्म संवेदना से परिपूर्ण कहानियां बनाता है। और जहां पहले यह कार्य कहानियों के माध्यम से होता था, इन दिनों पोर्टल्स पर आ रही भिन्न स्टोरीज के माध्यम से होता है।

कथित प्रगतिशील पोर्टल्स जो कहने के लिए प्रगतिशील होते हैं परन्तु जिनका कार्य लोक के ऐसे विमर्श को आघात पहुंचाना होता है जो दरअसल लड़कियों को सशक्त बनाने के लिए ही था। हर माह होने वाली शारीरिक असुविधा से बचने के लिए ही लोक ने यह विधान किया कि लड़की को रसोई में प्रवेश नहीं करने देना है, उससे कार्य नहीं करवाना है एवं एक अकेले स्थान पर रहना है। यह हो सकता है कि कालान्तर में इसके पालन में कुछ कुरीतियाँ आ गयी हों, परन्तु वृहद रूप में देखने पर यह लड़कियों के आराम का ही एक रूप था।
क्योंकि ऐसी ही मांग अभी हाल ही में की गयी कि लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान नौकरी पर अनिवार्य अवकाश प्रदान किया जाए। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी, परन्तु यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि मासिक धर्म में यदि लड़की को रसोई के कामकाज से अवकाश देने के लिए लोक ने यह नियम बनाया कि उसे रसोई में प्रवेश नहीं करना है या फिर उसे बाहर नहीं जाना है, उसे घाट आदि पर नहीं जाना है तो वह अन्याय हो गया, पक्षपात हो गया तो फिर अनिवार्य अवकाश क्या भेदभाव नहीं होगा?

क्या कालान्तर में जाकर यह विमर्श नहीं उभरेगा कि मासिक के दौरान लड़कियां काम पर क्यों नहीं जा सकतीं? उनके साथ यह अछूतों जैसा व्यवहार क्यों? क्योंकि हर रीति यदि अपने मूल रूप में पालन न की जाए तो वह कुरीति में परिवर्तित हो ही जाती है। फेमिनिज्म इन इंडिया हो या फिर thenewsminutes जैसे पोर्टल्स, इन्होंने एक सहज एवं लोक तथा प्रकृति के साथ आत्मसात हो जाने वाले विमर्श को तो पिछड़ा ठहरा दिया और उसे ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे वह शोषण का ही रूप हो, परन्तु वह लोग जो कथित प्रगतिशील विमर्श जा रहे हैं वह महिलाओं के लिए कितना अन्यायपूर्ण एवं घातक है, वह तो कल्पना से ही परे है।

यह महिलाओं के लिए इस लिए घातक है क्योंकि इसमें लड़कियां अपनी जड़ों से, अपने मूल से कटना आरम्भ कर देती हैं एवं वह उस रुई के फाहे को अपना शत्रु मान बैठती हैं जो उनके उस समय की शारीरिक पीड़ा को हरने के लिए संवेदना तथा विश्राम का मरहम लेकर खड़ा होता है, और वह उसे अपना मित्र मान बैठती हैं जो कथित आजादी के नाम पर वह झूठी संवेदना प्रस्तुत करता है और उन्हें लोक से काटकर बाजार के हवाले कर देता है। वह उन्हें उस उल्लास से दूर करता है, जो इस प्रकृति से जुड़ा हुआ है, जो लोक से जुड़ा हुआ है।

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