'हम जिएंगे आजाद, मरेंगे आजाद': चंद्रशेखर आजाद के बलिदान की अमर गाथा
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‘हम जिएंगे आजाद, मरेंगे आजाद’: चंद्रशेखर आजाद के बलिदान की अमर गाथा

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद ने अंतिम गोली खुद पर दागी। उनका जीवन साहस, त्याग और स्वाभिमान की मिसाल है। जानिए बचपन से शहादत तक की पूरी कहानी जो हर भारतीय को प्रेरित करती है।

Written byश्वेता गोयलश्वेता गोयल — edited by कुलदीप सिंह
Feb 27, 2026, 10:13 am IST
inविश्लेषण

भारतीय इतिहास के आकाश में 27 फरवरी का दिन उस नक्षत्र की याद दिलाता है, जिसकी चमक से ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आंखें चौंधिया गई थीं। यह दिन उस महामानव के बलिदान का साक्षी है, जिसने अपनी प्रतिज्ञा को अपने प्राणों से भी ऊंचा स्थान दिया। चंद्रशेखर आजाद, एक ऐसा नाम, जिसके स्मरण मात्र से धमनियों में रक्त का संचार तीव्र हो जाता है और हृदय में राष्ट्रभक्ति का ज्वार उमड़ पड़ता है। आजाद केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार थे, एक ऐसी जलती हुई मशाल थे, जिसने गुलामी के घोर अंधकार में करोड़ों भारतीयों को स्वतंत्रता का मार्ग दिखाया। उनका संपूर्ण जीवन एक ऐसी महागाथा है, जिसका प्रत्येक अध्याय साहस, त्याग और स्वाभिमान की स्याही से लिखा गया है।

शैशव की दहलीज पर क्रांति का अंकुर

मध्य प्रदेश के भाबरा गांव की मिट्टी में 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर सीताराम तिवारी का बचपन अभावों की गोद में बीता। उनके पिता एक साधारण किसान थे, जो कड़ी मेहनत से परिवार का भरण-पोषण करते थे लेकिन उस बालक की आंखों में नियति ने कुछ और ही स्वप्न सजों रखे थे। वे बचपन से ही निडर और साहसी थे, अन्याय को सहना उनके स्वभाव में नहीं था। जब 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की पुकार काशी की गलियों में गूंजी तो 14 वर्ष का यह बालक अपनी पढ़ाई छोड़कर राष्ट्र की वेदी पर आ खड़ा हुआ।

काशी की तंग गलियों में हाथ में तिरंगा लिए जब वह बालक अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध गर्जना कर रहा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह छोटा सा किशोर आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला देगा। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। उस कचहरी का दृश्य आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। मजिस्ट्रेट ने जब रौब से नाम पूछा तो बालक ने निर्भय होकर उत्तर दिया, ‘आजाद’। पिता का नाम पूछने पर कहा, ‘स्वतंत्रता’ और निवास का पता बताया, ‘जेलखाना’। मजिस्ट्रेट इस धृष्टता पर तिलमिला उठा और उसने 14 साल के उस कोमल शरीर को 15 कोड़ों की सजा सुनाई।

रक्त से लिखा स्वाभिमान का इतिहास

सरेआम उस बच्चे को निर्वस्त्र कर टिकटी से बांध दिया गया। भारी और मोटे बेंत का हर प्रहार उसकी खाल उधेड़ रहा था, पीठ से खून के फव्वारे छूट रहे थे लेकिन उस बालक की आंखों में दर्द नहीं बल्कि एक अलौकिक गर्व था। हर कोड़े की मार पर वह पूरी ताकत से चिल्लाता था, ‘वंदे मातरम!’, ‘भारत माता की जय!’ 15 कोड़े पूरे होने तक उसका शरीर मांस का एक लोथड़ा बन चुका था, हड्डियां दिखाई देने लगी थी लेकिन उस वीर ने एक भी आंसू नहीं गिराया। जेल के डॉक्टर जब घावों पर दवा लगाते तो वह बच्चा दर्द से तड़पता जरूर था पर उसके होंठों पर मुस्कान और हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला थी। इसी दिन से वह दुनिया के लिए ‘आजाद’ बन गए और उन्होंने संकल्प लिया कि वे कभी जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे।

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काकोरी और क्रांतिकारी संगठन का पुनर्गठन

असहयोग आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से आजाद का मोहभंग हुआ और वे सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़ गए। उनकी क्रांतिकारी यात्रा का एक स्वर्णिम पड़ाव ‘काकोरी कांड’ था। 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास सरकारी खजाने से भरी ट्रेन को लूटकर क्रांतिकारियों ने फिरंगियों को सीधी चुनौती दी। इस कांड के बाद कई साथी पकड़े गए, लेकिन अपनी चतुराई और वेश बदलने की कला में माहिर आजाद पुलिस की आंखों में धूल झोंककर बच निकले। संगठन बिखर चुका था पर आजाद का हौसला नहीं। 1928 में उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे युवा मेधावियों के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की नींव रखी। आजाद इस संगठन के सेनापति थे। वे अनुशासन और निष्ठा के प्रति इतने कठोर थे कि संगठन के भीतर किसी को नियम तोड़ने की अनुमति नहीं थी। भगत सिंह जैसे प्रखर बुद्धिजीवी भी उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते थे।

छद्मवेश और निशानेबाजी की अद्भुत कला

आजाद केवल एक योद्धा नहीं बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी थे। वे अक्सर साइकिल से मीलों की यात्रा करते थे, जो उनकी सादगी और संकल्प को दर्शाता है। ब्रिटिश पुलिस से बचने के लिए उन्होंने कई बार ऐसे भेष धरे कि पास खड़ा जासूस भी उन्हें पहचान नहीं पाता था। कभी वे अपनी मूंछें मुंडवाकर साधु बन जाते, तो कभी बनारस के घाटों पर नाविक बनकर अंग्रेजों के बीच से सुरक्षित निकल जाते थे। एक बार तो वे एक मंदिर में साधु बनकर रुके और अंग्रेज पुलिसकर्मी उन्हें पहचान तक नहीं सके। वे एक अद्वितीय निशानेबाज थे, जंगल के भीतर पेड़ों पर घंटों अभ्यास करना उनकी दिनचर्या थी। उनकी पिस्तौल ‘बमतुल बुखारा’ सदैव उनके पास रहती थी और उनकी अचूक निशानेबाजी का खौफ अंग्रेज अफसरों में ऐसा था कि वे आजाद का नाम सुनते ही कांपने लगते थे।

लाहौर से दिल्ली तक प्रतिशोध की गूंज

1928 में जब लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में हुई मृत्यु का बदला लेने की बात आई तो आजाद ने ही योजना बनाई। जे.पी. सांडर्स की हत्या के बाद उन्होंने अपने साथियों को सुरक्षित निकालने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। 8 अप्रैल 1929 को जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेंबली में बम फैंका तो उसके पीछे भी आजाद की संगठनात्मक शक्ति काम कर रही थी। उन्होंने अपने साथियों को बचाने की हरसंभव कोशिश की लेकिन जब वे असफल रहे तो उन्होंने अकेले ही संगठन की कमान संभाली।

अंतिम संघर्ष: अल्फ्रेड पार्क की अमर गाथा

27 फरवरी 1931 की वह दुपहरी इतिहास के पन्नों में सदा के लिए दर्ज हो गई। इलाहाबाद (प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में आजाद अपने एक साथी के साथ किसी भावी रणनीति पर विचार कर रहे थे, तभी गद्दारी की सूचना पर पुलिस ने पार्क को चारों ओर से घेर लिया। भारी मात्रा में पुलिस बल और अत्याधुनिक हथियारों के सामने आजाद अकेले थे, हाथ में वही विश्वसनीय पिस्तौल और जेब में सीमित गोलियां। मुठभेड़ शुरू हुई। आजाद ने अपने साथी को सुरक्षित निकाल दिया और स्वयं पुलिस का सामना करने लगे। उन्होंने अपनी चतुराई और निशानेबाजी से अंग्रेज अफसरों को पेड़ के पीछे दुबकने पर मजबूर कर दिया। गोलियां खत्म हो रही थी। अंततः जब पिस्तौल में केवल एक गोली बची तो उन्हें अपनी वह प्रतिज्ञा याद आई, ‘मैं कभी जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आऊंगा’। उन्होंने तनिक भी संकोच नहीं किया और वह अंतिम गोली अपनी कनपटी पर दाग ली। इस प्रकार वह शेर अपनी ही मांद में शान से सो गया। उनकी मृत्यु के बाद भी पुलिस उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, डर था कि कहीं यह भी ‘आजाद’ की कोई चाल न हो।

आजाद के जीवन का संदेश और प्रासंगिकता

चंद्रशेखर आजाद का बलिदान केवल एक क्रांतिकारी का अंत नहीं था बल्कि वह एक जलती हुई मशाल थी, जिसने आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति का अर्थ सिखाया। 24 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो कीर्तिमान स्थापित किए, वे आज के युवाओं के लिए एक महाकाव्य के समान हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देशभक्ति केवल नारों या सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि वह हमारे आचरण, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा में दिखनी चाहिए। आजाद का नारा, ‘हम जिएंगे आजाद, मरेंगे आजाद!’ आज भी भारतीय हवाओं में गूंजता है और हमें प्रेरणा देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विकट क्यों न हों, यदि संकल्प दृढ़ है तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको गुलाम नहीं बना सकती।

आजाद का जीवन त्याग और अनुशासन की पराकाष्ठा था। उन्होंने कभी अपने निजी सुख के बारे में नहीं सोचा। उनकी वह प्रतिमा, जिसमें वे अपनी मूंछों पर ताव देते हुए दिखते हैं, केवल वीरता का प्रदर्शन नहीं है बल्कि वह भारतीय स्वाभिमान की वह चुनौती है, जो हर युग के अत्याचारी शासक को दी जाती रहेगी। भारत की आत्मा में चंद्रशेखर आजाद सदा जीवित रहेंगे क्योंकि जो राष्ट्र के लिए मरते हैं, वे कभी नहीं मरते; अमर हो जाते हैं।

(लेखिका डेढ़ दशक से अधिक समय से शिक्षण क्षेत्र में सक्रिय शिक्षाविद हैं)

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