वंदे मातरम के छह छंद अनिवार्य : जिसने जलाई स्वतंत्रता की ज्वाला, अब उसे मिला औपचारिक सम्मान
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वंदे मातरम के छह छंद अनिवार्य : जिसने जलाई स्वतंत्रता की ज्वाला, अब उसे मिला औपचारिक सम्मान

भारत की आत्मा में यदि कोई सबसे पवित्र भाव प्रवाहित होता है, तो वह है, मातृभूमि का भाव। यह भाव आज की राजनीति से नहीं, सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक चेतना से जन्मा है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Mahak Singh
Feb 12, 2026, 12:44 pm IST
in भारत
VANDE MATRAM

VANDE MATRAM

भारत की आत्मा में यदि कोई सबसे पवित्र भाव प्रवाहित होता है, तो वह है, मातृभूमि का भाव। यह भाव आज की राजनीति से नहीं, सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक चेतना से जन्मा है। सिंधु घाटी सभ्यता में मातृदेवी की मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वज धरती को उर्वरता और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में पूजते थे। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त (12.1.12) में उद्घोष है , माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। अर्थात—धरती मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। यह केवल मंत्र नहीं, भारतीय अस्मिता का मूल स्वर है। यस्यां वेदाः प्रतिष्ठिताः- जिस भूमि पर ज्ञान और संस्कृति प्रतिष्ठित हुई, वह केवल मिट्टी नहीं, चेतना है।

भारत की हर परंपरा इस भाव की साक्षी है ,निर्माण से पहले भूमि-पूजन, किसान का बोआई से पहले मिट्टी को प्रणाम, गृहप्रवेश से पूर्व भूमि स्पर्श। यह सब बताता है कि जो हमें अन्न, जल और वायु देती है, वह पूज्य है। इसी मातृभाव को शब्द दिए बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में। वंदे मातरम् कोई कविता नहीं थी, यह राष्ट्रीय पुनर्जागरण का बिगुल था। 1905 के बंग-भंग आंदोलन में यह स्वदेशी क्रांति का घोष बना। क्रांतिकारी फाँसी के फंदे पर झूलते हुए यही कहते थे , वंदे मातरम्! अरविंद घोष से लेकर भगत सिंह तक, इस गीत ने अनगिनत हृदयों में ज्वाला जलाई। यह जन-जन के कंठ की आवाज बन गया।

औपनिवेशिक काल में सांप्रदायिक संवेदनशीलता और राजनीतिक संतुलन के कारण गीत के कुछ अंशों को सीमित किया गया। परंतु प्रश्न आज भी वही है- क्या मातृभूमि की वंदना किसी एक पंथ का विषय है? अनेक देशों के राष्ट्रगानों में भूमि और राष्ट्र की स्तुति है। यदि जन्मदात्री माँ का सम्मान स्वाभाविक है, तो धात्री माँ- जो हमें जीवन देती है- उसका।

सम्मान विवाद क्यों बने?

दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था यदि ‘भारत माता’ में से ‘माता’ निकाल दें, तो ‘भारत’ का अर्थ ही नहीं रह जाता। यह कथन आज और भी प्रासंगिक प्रतीत होता है।

ऐतिहासिक घोषणा

केंद्र सरकार ने 28 जनवरी 2026 को वंदे मातरम् के संबंध में स्पष्ट और औपचारिक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान, एकरूपता और गरिमा सुनिश्चित करना बताया गया।

नए दिशा-निर्देश : क्या-क्या अनिवार्य है?

जब भी राष्ट्रीय गीत के आधिकारिक संस्करण का गायन या वादन होगा, सभी उपस्थित व्यक्तियों को सावधान मुद्रा में खड़ा होना होगा। यदि फिल्म, समाचार-फीचर या वृत्तचित्र के हिस्से के रूप में बजाया जाए, तो खड़े होना अनिवार्य नहीं है।

अब वंदे मातरम् के सभी छह छंद का गायन/वादन होगा। जिसकी अवधि  3 मिनट 10 सेकंड (190 सेकंड) जो पहले प्रायः केवल पहले दो छंद (लगभग 65 सेकंड) उपयोग में आते थे। यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों हों, तो पहले वंदे मातरम्  उसके बाद जन गण मन होगा। वन्दे  मातरम का गायन   राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर, राष्ट्रपति/राज्यपाल के आगमन-प्रस्थान पर ,  नागरिक सम्मान समारोह (जैसे पद्म पुरस्कार) , औपचारिक सरकारी कार्यक्रम ,  विद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों में और  अन्य सार्वजनिक अवसर (सरकार के निर्देशानुसार) पर होगा।  विद्यालयों में शुरुआत सामूहिक राष्ट्रगीत से की जा सकती है। इस हेतु ध्वनि-प्रसारण की उचित व्यवस्था हो। गीत के शब्द प्रतिभागियों में वितरित किए जा सकते हैं। गायन सामूहिक और सम्मानपूर्ण हो।

वंदे मातरम के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी

वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह मूल रूप से संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण में लिखा गया था। बंकिम चंद्र ने यह गीत हुगली नदी के किनारे, चिनसुरा में लिखा था, जो वर्तमान पश्चिम बंगाल में स्थित है। यह माना जाता है कि वंदे मातरम् की कल्पना बंकिम चंद्र को लगभग 1876 के आसपास तब हुई, जब वे ब्रिटिश शासन में जिला अधिकारी (डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर) के पद पर कार्यरत थे। यह गीत बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंदमठ (प्रकाशित: 1882) से लिया गया है। गीत लिखे जाने के तुरंत बाद जदुनाथ भट्टाचार्य से इसे संगीतबद्ध (धुन तैयार करने) का अनुरोध किया गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे जन गण मन (राष्ट्रीय गान) के साथ समान सम्मान प्रदान करते हुए राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। 1896 में कलकत्ता (कोलकाता) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। यह प्रस्तुति रवीन्द्रनाथ टैगोर ने दी थी।इसका गद्य रूप में अंग्रेज़ी अनुवाद श्री अरविंद ने 20 नवंबर 1909 को अपनी पत्रिका कर्मयोगिन  में प्रकाशित किया।

  • 1896 – पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी गई 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम् को सार्वजनिक रूप से गाया।
  • 1937 – सीमित उपयोग का निर्णय लिया गया, 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति (कोलकाता/फैजपुर संदर्भ) ने निर्णय लिया कि आधिकारिक कार्यक्रमों में केवल पहले दो छंद गाए जाएँ।
  • प्रख्यात शास्त्रीय गायक ओंकारनाथ ठाकुर ने इस सीमित संस्करण का विरोध किया। उन्होंने कांग्रेस अधिवेशन में गाने से इंकार कर दिया, परंतु अपने निजी संगीत समारोहों में पूरा वंदे मातरम् गाना जारी रखा।
  • 15 अगस्त 1947 – ऐतिहासिक रेडियो प्रसारण इस दिन स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 1947) की सुबह आल इंडिया रेडियो से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण गाया।
  • प्रसिद्ध गायिका हीराबाई बड़ोदेकर ने इसे राग तिलक कामोद में प्रस्तुत किया (AIR दिल्ली) , दिलीपकुमार रॉय ने इसे ध्रुपद-धमार शैली में गाया। विष्णुपंत पागनीस ने ग्रामोफोन रिकॉर्ड में इसे राग सारंग में प्रस्तुत किया। केशवराव भोले ने इसे राग देशकार में रिकॉर्ड किया।
  • वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है। यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना का प्रवाह है। नए दिशा-निर्देश इसे संस्थागत सम्मान देने का प्रयास हैं। पर एक मूल प्रश्न भी उठता है क्या अपनी ही धरा-माता के सम्मान के लिए कानून बनाना पड़े? सच यह है कि मातृभूमि का सम्मान हमारा जन्मजात कर्तव्य है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तौलना उचित नहीं। स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं होता। माँ का सम्मान बहस का विषय नहीं, संस्कार का विषय है।
Topics: Vande Mataram All Verses CompulsoryBharat Mata and Vande MataramVande Mataram History and ImportanceVande Mataram Controversy and TruthRules of Singing Vande MataramVande Mataram New GuidelinesVande Mataram Government Order 2026National Song Vande Mataram Rules
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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