एक नगर में एक होटल था, जिसका मालिक बड़ा दयालु और सज्जन व्यक्ति था। होटल से अच्छी आमदनी होती थी। उस सेठ का जीवन बहुत सुखमय था। परिवार में उसके अतिरिक्त कोई नहीं था। माता-पिता का देहांत काफी समय पहले हो चुका था। उसका विवाह अभी नहीं हुआ था।
सेठ की एक विशेषता थी कि वह अपने होटल में आने वाले प्रत्येक विकलांग को मुफ्त भोजन कराता था। वर्षों तक यह कार्य निरंतर चलता रहा। वह प्रतिदिन सुबह पक्षियों को दाना भी दिया करता था। इससे भी उसे बहुत शांति मिलती थी। यह बात वह अक्सर अपने दोस्तों से कहा करता था।

एक दिन एक व्यक्ति ने सेठ से पूछा, ’आप ऐसा करते हैं तो आपको हानि नहीं होती। तब सेठ ने कहा, ’मैं प्रतिदिन पक्षियों को दाना देता हूं। मैंने गौर किया कि किसी अपाहिज पक्षी का दाना कोई अन्य पक्षी नहीं लेता है। वे पक्षी हैं, उनमें भी इतना स्नेह एवं सद्भाव है तो मैं तो मनुष्य हूं।
मुझे लगा कि मुझे भी प्रत्येक विकलांग व्यक्ति को भोजन करवाना चाहिये। तभी से मैं ऐसा कर रहा हूँ। ऐसा करने पर मुझे आत्मिक शान्ति व सुख मिलता है।’ अपनी दिनचर्या तो सभी लोग पूर्ण करते हैं लेकिन भावनात्मक व स्नेहपूर्ण व्यवहार कुछ ही लोगों का होता है। दूसरों का दुःख दूर करने व उन्हें सहयोग देने से हम अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं।











