भारत सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) और ब्रिटिश कंपनी BP से केजी-डी6 ब्लॉक के गैस उत्पादन को लेकर 30 अरब डॉलर से ज्यादा का मुआवजा मांग लिया है। यह मामला काफी पुराना है और अभी एक अरबिट्रेशन ट्रिब्यूनल में चल रहा है।
मामला क्या है?
केजी-डी6 ब्लॉक बंगाल की खाड़ी में आंध्र प्रदेश के तट से दूर स्थित है, जो कृष्णा-गोदावरी बेसिन का हिस्सा है। यह भारत का पहला बड़ा डीपवॉटर गैस प्रोजेक्ट था। साल 2000 में सरकार ने इसे रिलायंस को प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) के तहत दिया था। रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी वाली कंपनी इसका ऑपरेटर है।
2011 में रिलायंस ने BP को 7.2 अरब डॉलर में इस ब्लॉक समेत 21 PSC में 30% हिस्सेदारी बेच दी। शुरू में D1 और D3 फील्ड्स से करीब 10.3 ट्रिलियन क्यूबिक फीट (tcf) गैस निकालने का अनुमान था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 3.1 tcf कर दिया गया। प्रोडक्शन शुरू होने के बाद कई दिक्कतें आईं – रिजर्वॉयर में पानी घुसना, प्रेशर कम होना, और सरकार के साथ कॉस्ट रिकवरी को लेकर झगड़े। आउटपुट उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।
फरवरी 2020 में रिलायंस ने घोषणा की कि D1 और D3 फील्ड्स से प्रोडक्शन बंद हो गया है। कुल मिलाकर केजी-डी6 ब्लॉक से अब तक करीब 3 tcf गैस निकली है। कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक, कंपनी पहले अपनी लागत निकालती है, उसके बाद प्रॉफिट में सरकार को हिस्सा मिलता है – पहले साल 10% से शुरू होकर बाद में बढ़ सकता है।
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मुआवजे की मांग क्यों?
सरकार का कहना है कि रिलायंस और BP ने गलत तरीके से प्रोडक्शन किया, जिससे ज्यादातर रिजर्व्स बर्बाद हो गए। शुरू में 10 tcf का अनुमान था, लेकिन सिर्फ 20% के करीब ही निकाला जा सका। सरकार के मुताबिक, कॉन्ट्रैक्ट में जो भी गैस मिलती है, वो उसकी है। इसलिए शॉर्टफॉल की वैल्यू कंपनियों को भरनी चाहिए।
सरकार ने ट्रिब्यूनल में कहा कि कंपनियों ने “अनड्यूली एग्रेसिव” तरीके अपनाए। प्लान के मुताबिक 31 वेल्स ड्रिल करने थे, लेकिन सिर्फ 18 ही ड्रिल की गईं और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी ठीक से नहीं बनाया। इससे रिजर्वॉयर को नुकसान पहुंचा। सरकार का दावा है कि इस वजह से बाकी गैस निकाली नहीं जा सकी।
केस की स्थिति
यह विवाद 2016 से चल रहा है। तीन सदस्यों वाली अरबिट्रेशन ट्रिब्यूनल भारत में सुन रही है। नवंबर 2025 में 7 तारीख को अंतिम बहस खत्म हुई। फैसला 2026 के मिड में आने की उम्मीद है।
कंपनियों का पक्ष
रिलायंस ने इस 30 अरब डॉलर वाली रिपोर्ट को “फैक्टुअली इनकरेक्ट, इनएप्रोप्रिएट और इरिस्पॉन्सिबल” बताया है। कंपनी का कहना है कि सरकार का असली क्लेम सिर्फ 247 मिलियन डॉलर का है, जो उसके एनुअल ऑडिटेड फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स में पहले से डिस्क्लोज है। BP की तरफ से कोई कमेंट नहीं आया।











