बिहार में डॉक्टर नुसरत प्रवीण को नियुक्ति पत्र देने से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा हिजाब हटवाने के मामले ने पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दिया। इसी बहस के बीच झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी भी इसमें कूद पड़े। उन्होंने 19 दिसंबर को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करते हुए लिखा कि झारखंड की महागठबंधन सरकार डॉ. नुसरत प्रवीण को सीधी नियुक्ति दे सकती है, जिसमें 3 लाख का वेतन, सरकारी फ्लैट और सुरक्षा जैसी सुविधाएं शामिल होंगी।
स्वास्थ्य मंत्री के इस बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भानु प्रताप शाही ने डॉ. इरफान अंसारी से सवाल किया कि आखिर किस नियोजन नीति के तहत बिहार की किसी युवती को झारखंड में सीधी नियुक्ति दी जा सकती है। यदि ऐसा संभव है, तो फिर झारखंड के युवाओं और बेरोजगार चिकित्सकों को सीधी नियुक्ति क्यों नहीं दी जा रही? उन्होंने इस पूरे मामले को तुष्टिकरण की राजनीति बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।
लेकिन इसी घटना के अगले दिन, यानी 20 दिसंबर को, झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उजागर करने वाली एक तस्वीर सामने आई। चाईबासा जिले के नोवामुंडी प्रखंड अंतर्गत बड़ा बालजोड़ी गांव निवासी डिंबा चितोम्बा ने 18 दिसंबर को अपने चार माह के गंभीर रूप से बीमार बेटे को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया था। इलाज के दौरान 19 दिसंबर को बच्चे की मौत हो गई। इसके बाद डिंबा ने शव वाहन या एंबुलेंस की व्यवस्था के लिए इंतजार किया, लेकिन उसे कोई सुविधा नहीं मिली। अंततः वह अपने बच्चे के शव को एक थैली में रखकर गांव पहुंचा, जहां उसका अंतिम संस्कार किया गया।
यह खबर जैसे ही मीडिया में प्रकाशित हुई, लोगों ने स्वास्थ्य विभाग और सरकार से सवाल पूछने शुरू कर दिए। इस पर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी नाराज हो गए। उन्होंने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोगों के बीच चिकित्सकों और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी लिखा कि इसी तरह की घटनाओं और माहौल के कारण डॉक्टर चाईबासा, पलामू और चतरा जैसे क्षेत्रों में पदस्थापना से कतराते हैं। साथ ही, उन्होंने सवाल उठाने वाले मीडिया संस्थानों पर भी भ्रम फैलाने का आरोप लगाया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड में वर्ष 2019 से ही महागठबंधन की सरकार सत्ता में है। इसके बावजूद राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत इतनी बदतर क्यों है? दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों को आज भी अपने मरीजों को खटिया पर ढोकर अस्पताल क्यों ले जाना पड़ता है? एक चार माह के नवजात को एंबुलेंस की सुविधा क्यों नहीं मिल पाई? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि खुद स्वास्थ्य मंत्री ने स्वीकार किया है कि चाईबासा, पलामू और चतरा जैसे जिलों में डॉक्टर जाना नहीं चाहते। आखिर पिछले छह वर्षों में सरकार चिकित्सकों के लिए बेहतर माहौल क्यों नहीं तैयार कर सकी?
यदि झारखंड की वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था की बात करें तो राज्य भर के अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या, डॉक्टरों की कमी और सीमित बेड की वजह से जनता पहले से ही परेशान हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार हजारीबाग में हाइपोथर्मिया के लगभग 150 मरीज सामने आए हैं, जबकि बोकारो में 65 मरीजों में ठंड के कारण शरीर का तापमान खतरनाक स्तर तक गिरा पाया गया। इनमें अधिकांश मरीज गरीब, बुजुर्ग, दिहाड़ी मजदूर और खुले में काम करने वाले लोग हैं, जिन्हें न तो पर्याप्त गर्म कपड़े मिल पाते हैं और न ही सुरक्षित आश्रय।
स्थिति यह है कि इमरजेंसी, मेडिसिन और शिशु वार्ड तक में बेड उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण कई मरीजों को बरामदे और गलियारों में इलाज कराने को मजबूर होना पड़ रहा है। दूसरी ओर, रिपोर्टों से यह भी सामने आया है कि कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के स्वीकृत पद वर्षों से खाली पड़े हैं।
ऐसी परिस्थितियों में झारखंड के बेरोजगार चिकित्सकों को नियुक्ति देने के बजाय केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए दूसरे राज्य के लोगों को सीधी नियुक्ति की पेशकश करना, कहीं न कहीं राज्य की जनता और स्थानीय बेरोजगार युवाओं के साथ अन्याय और विश्वासघात नही तो और क्या है?

















