बुर्का पर डेनमार्क का नया कदम: शिक्षा संस्थानों में चेहरा ढकने पर रोक, भारत में बहस से डर क्यों?
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बुर्का पर डेनमार्क का नया कदम: शिक्षा संस्थानों में चेहरा ढकने पर रोक, भारत में बहस से डर क्यों?

डेनमार्क स्कूलों व यूनिवर्सिटी में बुर्का-नकाब बैन करने जा रहा है। भारत में तीन तलाक जैसे मुद्दों से उपजी बहस और पश्चिम में एकीकरण की चिंता के संदर्भ में जानिए पूरा विवाद और मूल सवाल।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Dec 19, 2025, 02:39 pm IST
inविश्व, विश्लेषण

भारत में इन दिनों बुर्के को लेकर यह विवाद चल रहा है और भारत में फेमिनिज़्म के झंडाबरदार एकदम से ही बुर्के के समर्थन में यह कहते हुए सामने आ गए हैं कि यह महिला का अधिकार है कि वह चेहरा छुपाकर रखे या नहीं! इतना ही नहीं बुर्के को मुस्लिम महिलाओं की पहचान के रूप में बताते हुए घूँघट को शोषण का प्रतीक बताया जाने लगा है।

यह एक ऐसी बहस है, जिसका अंत हाल फिलहाल संभव नहीं लगता है क्योंकि यदि मुस्लिम समुदाय के लिए कोई बाहरी समुदाय कुछ ऐसा करना चाहता है, जो उस समुदाय की लड़कियों के लिए भला करता है तो उस समुदाय के कट्टरपंथी अपनी महिलाओं की मानसिक कन्डीशनिंग इस प्रकार करते हैं कि ये महिलाएं खुद ही बुर्के को अपना मसीहा मान बैठती हैं और यह तर्क कई लोग देते हैं कि भारत में जिस प्रकार से तीन तलाक जैसे मामलों पर न्यायपालिका और सरकार ने स्टैंड लिया है, उससे कुछ मुस्लिम महिलाओं को ऐसा लगा कि उनके मजहब के मामलों में दखल दिया जा रहा है और इसके कारण उन्होनें बुर्के का विरोध करना बंद कर दिया और बुर्के को अपनी पहचान बना लिया।

भारत में ही नहीं अपितु पश्चिम मे भी कमोबेश यही धारणा है। परंतु पश्चिम में एक बहस और चल रही है, जिसमें इसका विरोध करने वाले यह कह रहे हैं कि बुर्का मुस्लिम लड़कियों को आइसोलेट कर देता है और वह उन लोगों में घुलने मिलने में असहजता अनुभव करती है, जिस देश में वे शरण लेने आई हैं। मगर वहीं दूसरी ओर इसके समर्थक लोगों का यह कहना है कि बुर्का उनकी मजहबी पहचान है और यह उनका अधिकार है। इसी बीच कई पश्चिमी देश स्कूल्स और कॉलेजेस में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध की बात कर रहे हैं।

बुर्के पर प्रतिबंध लगाएगा डेनमार्क

इसी क्रम मे डेनमार्क ने भी 17 दिसंबर को यह घोषणा की कि वह स्कूल्स और यूनिवर्सिटीज में उन परिधानों पर प्रतिबंध लगाएगा, जो लड़कियों का चेहरा ढककर रखते हैं। एक वक्तव्य में इममिग्रेशन एवं इन्टीग्रेशन मंत्री रासमस स्टॉकलंड ने कहा कि “बुर्का, नकाब या ऐसे अन्य परिदान, जो लोगों का चेहरा छिपाते हैं, उनका स्थान डैनिश कक्षाओं में बिल्कुल भी नहीं है!” उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने पर वैसे ही प्रतिबंध है और अब यह प्रतिबंध शैक्षणिक संस्थानों में भी लागू होगा।

वर्ष 2028 में डेनमार्क में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्के पर प्रतिबंध लगा था

डेनमार्क में वर्ष 2018 में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्के और नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। और साथ ही इस पर जुर्माना भी लगाया गया था। हालांकि हर देश की तरह डेनमार्क में भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मजहबी समूहों ने इस प्रतिबंध को भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे मजहब का और महिलाओं के वस्त्र पहनने की आजादी का उल्लंघन बताया था।

जिन छात्राओं का चेहरा नहीं दिख रहा, उन्हें पढ़ाएं कैसे?

जो कानून अभी आने वाला है, उसके समर्थन मे तर्क देते हुए लिबरल पार्टी (venstre) के प्रवक्ता हैन्स एंडर्सन ने कहा कि लड़कियों और महिलाओं के लिए पूरी तरह से अपने आप को ढककर बैठना डैनिश मूल्यों के खिलाफ है, जहां पर उन्हें पढ़ाने वाले टीचर को उनका चेहरा न देख पाए या फिर यह न पता चल पाये कि आखिर वे किसे पढ़ा रहे हैं।“

सोशल मीडिया पर समर्थन

डेनमार्क सरकार के इस प्रस्तावित कानून को सोशल मीडिया पर लोगों का समर्थन मिल रहा है। लोग कह रहे हैं कि आखिर किसी कपड़े के पीछे छिपना ही क्यों है? स्तंभकार कोरी मॉर्गन ने एक्स पर लिखा कि यह विरोधाभास है कि अधिकतर देश, जहां से ये लड़कियां आती हैं, वहाँ पर उन्हें उच्च शिक्षा पाने का अधिकार ही नहीं होता है।

एक यूजर ने लिखा कि “यह बढ़िया है। पहले मुझे लगता था कि यह मुसलमानों के साथ भेदभाव है, लेकिन अब 1) मुझे एहसास हुआ कि इससे जिहादियों की ताकत कम होती है और पश्चिमी समाज ज़्यादा सुरक्षित होता है। 2) कई महिलाएं इन कपड़ों को उत्पीड़न और बाल यौन शोषण का प्रतीक मानती हैं और यह हमारे मूल्यों के साथ मेल नहीं खाता।“

अभी भी मूल समस्या पर बात नहीं हो रही है:

भारत सहित कई लोकतान्त्रिक देशों में अभी भी बुर्के पर बात करने से लोग डरते हैं। लोग इसे लड़कियों की वस्त्र पहनने की आजादी से जोड़ते हैं, परंतु यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि आखिर क्यों कोई महिला अपने आप अपना चेहरा छुपाकर रखना चाहेगी? क्यों उसे बंधनों में आजादी अनुभव होती है? क्या उसकी कन्डीशनिंग इस प्रकार की जाती है कि वह इसी में अपनी आजादी खोजती है या फिर वह लोकतान्त्रिक देशों में अपनी मजहबी पहचान के प्रति इस सीमा तक असहज हो जाती है कि उसे लोकतंत्र के मुकाबले अपनी मजहबी पहचान अधिक महत्वपूर्ण लगने लगती है?

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